जब अख़बारों को लगने लगे कि वे कहानी से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, तो पत्रकारिता को नुकसान होता है


राफेल को बोफोर्स साबित करने के लिए द हिंदू’  के एन.राम की ज़िद.

बोफोर्स घोटाले की जांच करने वाले स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम ने 2012 में ‘द हूट’ मैगज़ीन को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि:

जब अख़बारों को लगने लगे कि वे कहानी से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, तो पत्रकारिता को नुकसान होता है. जब संपादक अपनी सीमा पार करने लगे, तो यह खतरनाक हो सकता है.

स्टेन लिंडस्ट्रोम ने अपनी वर्षों की इन्वेस्टीगेशन के ज़रिये बोफोर्स घोटाले से सम्बंधित 300 पन्‍नों के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ इकट्ठे किये थे और उस समय ‘द हिंदू’ की स्ट्रिंगर चित्रा सुब्रमण्‍यम को सौंपे थे.

उन्ही दस्तावेज़ों के आधार पर 23 अप्रैल 1988 की रोज़ चित्रा और तत्कालीन ‘द हिंदू’ के संपादक और मैनेजिंग डायरेक्टर एन.राम ने बोफोर्स सौदे में कथित दलाली की खबर भारत में ब्रेक की थी.

आज बोफोर्स की कहानी के 32 वर्षों बाद एक बार फिर ‘द हिंदू’ और एन.राम चर्चा में हैं.

एन.राम अब ‘द हिन्दू पब्लिशिंग ग्रुप’ के चेयरमैन है और कुछ ही दिनों पहले राफेल मुद्दे पर एक पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के आरोप लगाए हैं. ‘द हिन्‍दू’ की रिपोर्ट में पीएमओ की ओर से समानांतर बातचीत चलाने का आरोप है.

सबूत के तौर पर उन्होंने एक लेटर छापा जिसमे में तत्कालीन रक्षा सचिव की आपत्ति का जिक्र है कि राफेल सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय, फ्रांस सरकार से संपर्क में है.

राफेल डील को लेकर ‘द हिन्‍दू’ द्वारा जारी किया गया लेटर

लेकिन उस लेटर में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की ओर से लिखी गई उस टिप्पणी को गायब कर दिया गया जिसमे लिखा था कि “प्रधानमंत्री कार्यालय और फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय सौदे पर बातचीत नहीं कर रहे, बल्कि उसकी प्रगति की निगरानी कर रहे हैं.”

पूरा लेटर इसको आधा ही दिखाया था ‘द हिन्दू’ ने

राफेल डील को लेकर एक के बाद एक सिलसिलेवार तरीके से ‘द हिन्दू’ में कई रिपोर्ट्स छपे जिसमे ख़ुफ़िया दस्तावेज़ भी शामिल हैं. इसमें सबसे ताज़ा दावा ‘द हिन्दू’ की उस रिपोर्ट का है जिसमें अख़बार ने डील के पेमेंट्स की शर्तों में ‘बैंक गारण्टी’ ना होने की वजह से डील कीमत लगभग 250 मिलियन यूरो से बढ़ गयी और मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय की ओर से सौदे में मोलभाव करने के लिए गठित ‘इंडियन नेगोशिएटिंग टीम’ के होमवर्क को ताक पर रख सीधे डील को अंजाम दिया है. अखबार ने कीमतों के तुलनात्मक विवरण पेश कर ‘इंडियन नेगोशिएटिंग टीम’ के अतिसंवेदनशील नोट छाप दिया जिस पर खासा बवाल मच गया है.

सुप्रीम कोर्ट में राफेल विमानों की सुनवाई के दौरान इन्ही रिपोर्ट्स को आधार बनाकर प्रशांत भूषण ने जब एक नोट पढ़ना शुरू किया तो अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने आपत्ति जताई. वेणुगोपाल ने कोर्ट में कहा है कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किये गए दस्तावेज़ रक्षा मंत्रालय से चुराए गए हैं और विपक्ष द्वारा दी जा रहीं दलीलें इन्ही चोरी किए गए दस्तावेज़ों पर आधारित हैं. वेणुगोपाल ने भी यह भी कहा कि ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करना आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम का उल्लंघन है तथा यह एक दंडनीय अपराध है. ऐसा करके याचिकाकर्ता ने कोर्ट की भी अवमानना की है.

आगे उन्होंने कहा कि ‘द हिन्दू’ अख़बार के ख़िलाफ़ गोपनीयता के क़ानून के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है.

इसपर एन.राम ने कहा कि उन्होंने जनहित में ये रिपोर्टें प्रकाशित की हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि ‘‘आप इसे चोरी हो गए दस्तावेज़ कह सकते हैं. हम इसको लेकर चिंतित नहीं हैं. हमें यह गुप्त सूत्रों से मिला था और हम इन सूत्रों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. कोई भी इन सूत्रों के बारे में हमसे कोई सूचना नहीं पा सकता है.”

‘द हिन्दू’ के राफेल डील
को लेकर प्राइसिंग और बैंक गारण्टी पर कवरेज – 6 मार्च 2019

उन्होंने बड़ा बयान दिया कि –

राफेल के दस्तावेज़ कहां से मिले, दुनिया की कोई ताक़त मुझसे नहीं जान सकती.

एन.राम की इस बयान में सच की लड़ाई से ज्यादा अहंभाव की गंध आती है. ‘द हिन्दू’ और एन.राम के सन्दर्भ में स्टेन लिंडस्ट्रोम ने पत्रकारिता के नुकसान वाली जिस फ्रेम की बात कही थी आज वहां ‘द हिन्दू’ और एन.राम की तस्वीरें और बिलकुल फिट बैठती हैं.

बोफोर्स घोटाला और एन.राम

बहरहाल, बोफोर्स घोटाले का जिक्र करते हुए चित्रा सुब्रमण्‍यम ने एक ट्वीट किया जिसमे एन.राम द्वारा सूत्र को लेकर कही गई बात पर सीधे सवाल खड़े होते हैं.

चित्रा ने कहा कि “बोफोर्स पर हमने 10 साल खोजी पत्रकारिता की थी, एन.राम और मैंने इसपर करीब 20 महीने काम किया था, स्वीडन में मेरे एक सूत्र का नाम ‘स्टेन लिंडस्टॉर्म’ था. एन.राम ने मुझसे बिना पूछे दिल्ली में उनका नाम सार्वजनिक कर दिया था.”

#Bofors #India was a ten year investigation. N. Ram and I worked on it together only for some 20 months. My principle source in Sweden was Sten Lindstrom. N. Ram shared his name in Delhi without telling me. 1/n #journalism #InternationalWomensDay2019— Chitra Subramaniam (@chitraSD) March 6, 2019


चित्रा ने अपने दूसरे ट्वीट में कहा “एन.राम द्वारा मेरी और लिंडस्टॉर्म की सुरक्षा को लेकर खिलवाड़ किया गया. जब मैंने इस सन्दर्भ में लिंडस्टॉर्म से बात करने की कोशिश की तो मुझे उनसे बात करने तक से रोका गया.”

#Bofors My security and that of Sten Lindstrom was severely compromised by N. Ram. I was not allowed to call Sten Lindstrom while he figured out who was responsible for outing his name. 2/n #journalism #InternationalWomensDay2019— Chitra Subramaniam (@chitraSD) March 6, 2019


इसी वजह से करीब ढाई दशकों तक स्टेन लिंडस्ट्रोम को अपनी पहचान छिपा कर रखनी पड़ी.

चित्रा सुब्रमण्‍यम के अनुसार एन.राम ने अपने हित और सुविधा के अनुसार बोफोर्स घोटाले से जुड़े तथ्यों का इस्तेमाल किया.

एन.राम अपने कॉलेज के दिनों में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के उपाध्यक्ष थे, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से राजनीतिक रूप से जुड़ा हुआ है. उन्ही दिनों उन्होंने कांग्रेस के आला नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदंबरम और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पूर्व महासचिव प्रकाश करात के साथ ‘रैडिकल रिव्यु’ नाम से जर्नल भी शुरू किया था.

मधु त्रेहन को दिए एक इंटरव्यू में चित्रा ने कहा था कि बोफोर्स डील के अंतिम दस्तावेजों में राजीव गाँधी के नाम का जिक्र होने की वजह से एन.राम ने एकाएक बोफोर्स घोटाले पर लिखना बंद कर दिया. जब चित्रा ने इसका विरोध किया तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

चित्रा के अनुसार उस समय बेशक बोफोर्स की कहानी को लेकर एन.राम पर राजीव गाँधी सरकार का दबाव था लेकिन उस दबाव की वजह से कहानी को वापस ले लेना जर्नलिज्म नहीं है.

इसके बाद चित्रा सुब्रमण्‍यम को ‘द हिंदू’ छोड़ना पड़ा. कारण पूछने पर एन.राम ने कहा कि “आप इसके(बोफोर्स रिपोर्ट्स के) राजनीतिक पैरामीटर नहीं समझती हैं.”

साथ ही चित्रा सुब्रमण्‍यम के सूत्र लिंडस्ट्रोम का नाम भी सार्वजनिक कर दिया गया.

तो समझा जा सकता है कि आज राफेल की कहानी को लेकर एन.राम जिन पत्रकारिता उसूलों के डींगे हाँक रहे हैं उसकी होली वे बहुत पहले ही जला चुके हैं.

चित्रा सुब्रमण्‍यम के मुताबिक यूरोप में एन.राम का कभी कोई प्रत्यक्ष सूत्र था ही नहीं. बोफोर्स खुलासा उनकी और लिंडस्ट्रोम की मेहनत थी. बावजूद, एन.राम ने हर वो हथकंडा अपनाया जिससे की बोफोर्स की कहानी का श्रेय चित्रा को न मिले.

बोफोर्स की कहानी को एन.राम ने ‘कोलंबिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म’ ले लिए लिखा लेकिन चित्रा के नाम का बाय-लाइन तक नहीं दिया गया.

आपको बता दूँ कि 1990 में एन.राम को पद्म-भूषण से भी नवाज़ा गया था.

पत्रकारिता में सूत्र तभी कोई जानकारी देते हैं जब पत्रकारों और उनके बीच खास भरोसा हो और इस बात का विश्वास हो कि उनका नाम कभी बाहर नहीं आएगा!

लेकिन ‘द हूट’ से बात करते हुए लिंडस्ट्रोम ने कहा कि “बोफोर्स के पुरे प्रकरण में ‘द हिन्दू’ की भूमिका मात्र संचार माध्यम की थी. मैं एन.राम से मिला क्योंकि उन्होंने आग्रह किया था. लेकिन मैं निराश हुआ.”

उन्होंने आगे कहा कि “बोफोर्स के राजनीतिक भुगतान में शामिल सबसे विस्फोटक दस्तावेज़ मार्टिन अर्बदो(बोफोर्स के तत्कालीन प्रमुख) के नोट्स और उनकी डायरी थी. ‘द हिन्दू’ ने उन्हें भी प्रकाशित किया जिसके बाद एक गंभीर दौर से मुझे गुजरना पड़ा. मुझे एक संदेश मिला कि मेरा नाम मुखबिर के तौर पर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में घूम रहा है. इसने मेरे लिए बहुत तनाव और कठिनाई पैदा की. लेकिन ‘द हिंदू’ इसपर बेपरवाह रहा.”

एन.राम और मनमोहन सिंह सरकार

कही सुनी से कुछ ज्यादा है कि यूपीए के दौर में एन.राम की खूब हां-जी-हुजूरी होती थी लेकिन मोदी सरकार ने उनको तवज्जो देना बंद कर दिया. नतीज़न इस बात की भारी संभावनाएं हैं कि एन.राम ने अपने अहम् को सिद्ध करने के लिए बोफोर्स जैसा राफेल के साथ भी करने की सोची.

संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह’ के मुताबिक भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील (123 समझौते) को लेकर वामपंथियों का पहले से ही सरकार से विरोध था.

3 अगस्त 2007 की रोज़ मनमोहन सिंह ने इस समझौते को लोगो के समक्ष रखा जिसे पढ़ने के बाद एन.राम ने ‘A Sound an Honourable 123′ शीर्षक के तहत अपने सम्पादकीय में मनमोहन सिंह की तारीफ में कसीदे पढ़े.

चूँकि एन.राम भी खुलकर वामपंथी विचारधारा का समर्थन करते हैं और विद्यार्थी जीवन से कम्युनिस्ट पार्टी से उनके तार जुड़े हुए हैं इसलिए ड़ॉ मनमोहन सिंह ने वामपंथियों से मध्यस्थता हेतु एन.राम को नाश्ते के लिए दिल्ली बुलाया. उस मुलाकात में एन.राम ने ‘123 समझौते’ को लेकर खूब अच्छा-अच्छा कहा जिसने मनमोहन सिंह को कुछ समय के लिए आश्वस्त कर दिया.

लेकिन उस मुलाकात के करीब एकाद घंटे बाद एन.राम का संजय बारू पर कॉल आया जिसमे उन्होंने कहा कि “वामपंथी 123 समझौते का समर्थन नहीं करेंगे.”

इसके कुछ दिन बाद एन.राम ने ‘123 समझौते’ की तारीफ में लिखे अपने पुराने सम्पादकीय दरकिनार कर नए सम्पादकीय में सरकार से वह समझौता स्थगित करने के विषय में लिखा.

वैसे मनमोहन सिंह के लिए वह पहला मौका नहीं था जब एन.राम ने अपनी सुविधा के हिसाब से पाला बदला हो.

संजय बारू की किताब के अनुसार जुलाई 2005 में मनमोहन सिंह ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में ‘भारत के पश्चिम से रिश्तों’ के विषय पर भाषण दिया था. अपने भाषण के दौरान मनमोहन सिंह ने रविंद्रनाथ टैगौर के वैश्विक नजरिये का हवाला दिया. जिसके बाद दर्शक दीर्घा से एन.राम उनसे मिलने आये और ‘दूरदर्शी भाषण’ के लिए अभिनंदन दिया.

इसी भाषण को दूसरे पत्रकारों ने गलत समझते हुए मनमोहन सिंह के खिलाफ बड़े-बड़े आर्टिकल्स छापे. जिसे पढ़ने के बाद भाजपाइयों और वामपंथियों ने मनमोहन सिंह सरकार को घेरा.

चूँकि एन.राम ने उस भाषण की तारीफ की थी इसलिए संजय बारू ने उनसे एक सम्पादकीय लिखने हेतु दरख्वास्त की जिसमे समझाया जाए कि एन.राम को मनमोहन सिंह का भाषण क्यों ‘दूरदर्शी’ लगा था. और इसपर एन.राम ने हामी भी भरी.

लेकिन दूसरे दिन एन.राम अपनी बात से पलट गए और बारू को कॉल कर कहा कि “मार्क्सवादी इतिहासकार इरफ़ान हबीब और मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने प्रधानमंत्री के लिखाफ तगड़ा लेख लिखा है जिसके सामने प्रधानमंत्री के बचाव में सम्पादकीय लिखना उनके लिए मुश्किल है.”


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