आज साबित हो जाएगा कि स्ट्रिंगर मीडिया में तो हैं लेकिन मीडिया के नहीं!


स्टिंग करे कोई और पैसा बनाये कोई

नीचे की पूरी कहानी पढ़ने के बाद आप यदि चाहें तो अब न्यूज़ चैनल देखते वक्त अपने टीवी की स्क्रीन काली कर सकते हैं क्योंकि ये अँधेरा ही आज के मीडिया की तस्वीर है. और इससे कोई भी न्यूज़ चैनल अछूता नहीं है.

#MeToo को नजदीक से परखें तो हमें पता चलेगा कि पूरा का पूरा कैंपेन पत्रकारिता जगत के इर्द-गिर्द घूम रहा है. या तो आरोप लगाने वाले पत्रकार हैं, या जिन पर आरोप लगा है वे पत्रकार हैं. कहीं कहीं तो दोनों छोर से पत्रकार ही हैं.

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर निष्ठा जैन ने यौन और मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया.

कई अख़बारों के संपादक रह चुके एमजे अकबर पर 20 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए.

बॉलीवुड एक्टर और लेखक पीयूष मिश्रा पर पत्रकार केतकी जोशी ने भी इसी तरह के यौन शोषण की बात कही.

खैर, यह पहली दफ़े भी नहीं है कि इस तरह के शोषण की ख़बरें हेडलाइंस बनी हों. कुछ वर्ष पूर्व, न्यूज मैगजीन तहलका के संस्थापक और संपादक तरुण तेजपाल ने अपनी ही संस्था में काम करने वाली एक महिला पत्रकार के साथ यौन उत्पीड़न की बात स्वीकार की थी.

इस तरह के शोषण की ख़बरें समय-समय पर ट्रिगर होते रहने के कारण पत्रकारिता जगत से जुडी काली-करतूती-चर्चाओं ने एक बार फिर से जोर पकड़ा है.

ऐसे में ज़रुरी है कि आप सभी पत्रकारिता जगत के उस प्राणी से भी मुखातिब होवें जिस पर दलाल स्ट्रीट ऑफ़ मीडिया ने एवरग्रीन शोषित, पीड़ित और वंचित रहने का ठप्पा लगाया हुआ है. मैं बात कर रहा हूँ स्ट्रिंगर्स जमात की जिनके लिए कहा जाता है कि “पत्रकारिता में सर्वाधिक शोषण स्ट्रिंगरों का ही होता है.”

खबरिया चैनलों की 24*7 वाली टैग लाइन को हाई-लाइट करने का पूरा दबाव इन स्ट्रिंगर्स पर होता है. वे दिन-रात चौबीसों घंटे न्यूज़ चैनल के लिये काम करते हैं लेकिन इसके सामने उनको इतने पैसे भी नहीं मिलते की वे अच्छी तरह से अपना जीवन जी पाएँ.

ना तो उनका काम करने का कोई समय फ़िक्स होता है और ना ही घर जाकर आराम करने का. तपती धूप, कड़ाके की ठण्ड और भारी बारिश में भी उनपर टाइम टू टाइम खबर भेजने का प्रेशर रहता है. इसके बदले में उनका वेतन तो सबसे बड़ा मुद्दा है ही लेकिन सूट-बूट पहने हुए एंकरों की स्क्रिप्ट में उनके नाम तक का जिक्र नहीं होता.

समझा जाये तो स्ट्रिंगर पत्रकारिता जगत का वो शक्ति-मान है जिसे ज़बरदस्ती तमराज किल्विष बना कर अंधेरे में कैद किया हुआ है.

इतना सब कुछ होते हुए भी स्ट्रिंगर किसी से कोई शिकायत नही करता क्योंकि वह जानता है कि मीडिया में काम करने के बावजूद उसकी सुनने वाला यहां कोई नहीं है. वे इस बात को अच्छे से समझते हैं कि देश के सिस्टम का सुधार करने का नारा गाने वाले ये टुच्चे मीडिया संस्थान खुद का ही सिस्टम नहीं सुधार सकते तो उनसे क्या उम्मीद रखी जाये.

लेकिन कभी-कभी सौ में एक स्ट्रिंगर ऐसा भी होता है जो इन सब से अपना आपा खो बैठता है और अपनी आवाज़ उठाने लगता है. ऐसी स्थिति में मीडिया संस्थान उसे चुपचाप ऊँगली पकड़ के बहार का रास्ता दिखा देते हैं.

स्ट्रिंगर मोहम्मद आसिफ का केस

इसी साल जुलाई महीने में, एक ऑडियो ‘भड़ास 4 मीडिया’ की ओर से सुना गया जिसमे में एक स्ट्रिंगर और चैनल के वरिष्ठ सहयोगी के बीच बातचीत थी.

कुछ दिन बाद बताया गया कि इसी ऑडियो को अपने प्रबंधन को भेजते हुए स्ट्रिंगर मोहम्मद आसिफ ने इस्तीफा दे दिया.

आसिफ ने अपने इस्तीफे में आरोप लगाया था कि एफएम न्यूज को पत्रकार नहीं बल्कि चाटुकार और दलाल चाहिए जो जिले से अच्छी रकम दे सके. साथ ही यह भी आरोप लगाया था कि यह चैनल तीस-तीस हजार रुपये में आई-डी बेच रहा है.

ऑडियो में यह साफ सुना जा रहा था कि सारे चैनल स्ट्रिंगर्स को ख़बरों का पैसा देते हैं लेकिन एफएम न्यूज चैनल अपने स्ट्रिंगर को चवन्नी भी नहीं देता.

साथ ही किसी के ख़िलाफ़ ख़बर दिखा-दिखा कर कैसे दबाव बनाना है और फिरक्या कर के कर उससे रुपयों की उगाही करनी है, इसका गुरुमंत्र भी उस ऑडियो में दिया जा रहा था.

गुमनामी के आलम में जी रहे हैं स्ट्रिंगर्स

ब्रेकिंगस की रफ़्तार में किसी भी खबरिया चैनल में सबसे महत्वपूर्ण बात होती है कि कैसे और कितनी तेज़ वह चैनल खबरों के तार को खुद से जोड़ सकता है. इसकी पूरी जिम्मेदारी स्ट्रिंगर पर ही होती है लेकिन फिर भी ऐंकर्स, रिपोर्टर्स और दूसरे संवादाताओं की तरह सुविधाएँ तो ठीक है लेकिन पत्रकारीय पहचान भी उन्हें नसीब नहीं होती. किसी चैनल के लिए काम करते वक्त उन्हें आई-कार्ड और चैनल आई-डी दिया जाना चाहिए या नहीं इसका भी कोई तय मापदंड या निर्धारित नीति नहीं है.

अक्सर ये चैनल्स ख़ुफ़िया कामों के लिए स्ट्रिंगर्स का इस्तेमाल करते हैं और यदि उसके साथ कोई अनहोनी होती है तो चैनल उसे अपना पत्रकार मानने से भी हिचकिचाता है.

2013, मुजफ्फरनगर दंगो के दौरान आईबीएन-7 के स्ट्रिंगर राजेश वर्मा की अबूपुरा इलाके में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी जिसके बाद इस खबर को दूसरे चैनल चला रहे थे लेकिन आईबीएन-7 पर यह खबर फ्लैश तक नहीं हुई.

आज देश में करीब 40,000 के आसपास स्ट्रिंगर्स है. इसका मतलब है कि प्रत्येक मीडिया संस्थान को स्ट्रिंगर्स की जरुरत तो है ही लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों उन्हें पहचान नहीं दी जाती!

स्ट्रिंगर को पत्रकारिता का सेल्समैन बना दिया गया है

जैसा की हमने बताया, स्ट्रिंगर्स खबरिया चैनल्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है लेकिन फिर भी उन्हें अधिकृत नहीं किया जाता. वे मीडिया में हैं लेकिन मीडिया के नहीं.

कोई उन्हें स्ट्रिंगर कहता है, कोई न्यूज़ प्रोवाइडर और ‘आज तक’ तो उन्हें ‘न्यूज सर्विस एजेंट’ NSA कहता है.

मीडिया जगत में स्ट्रिंगर्स को स्टोरी के हिसाब से भुगतान करने का चलन है. इसमें कईं बार टारगेट भी दिए जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे कॉर्पोरेट्स में सेल्समैन को दिए जाते हैं.

स्ट्रिंगर मोहम्मद आसिफ सेएफएम न्यूज चैनल के वरिष्ठ सहयोगी जिस तरह से ‘ख़बरों का वसूली भाई’ बनाने का गुरुमन्त्र दे रहे थे, ये मन्त्र फॉलो करने के लिए आज ज्यादातर स्ट्रिंगर्स मजबूर हैं.

मीडिया संस्थानों के करता-धरता अपने चैनल की बैलेंस शीट मेन्टेन करने के लिए स्ट्रिंगर्स पर दबाव बनाते हैं और इस दबाव को पूरा करने के चक्कर में स्ट्रिंगर भी कारोबारी मानसिकता में आ जाता है और मीडिया के नाम पर गोरख-धंधे शुरू करता है.

अगस्त 2015 में खबर आई थी कि ‘न्यूज़ नेशन’ का रीजनल चैनल ‘न्यूज़ स्टेट यूपी’ अपने स्ट्रिंगरों से अवैध वसूली करवा रहा है. नहीं करने पर स्ट्रिंगरों को उत्पीड़ित किया जा रहा था. पढ़ने में आया था कि चैनल से कुछ ऊपरी कुर्सी पर बैठ लोग विज्ञापन के नाम पर स्ट्रिंगरों से उगाही करवा रहे थे. जिन स्ट्रिंगरों को वे महीने का पैसा भी ठीक से उनकी मेहनत अनुसार नहीं देते थे, उन स्ट्रिंगरों को 25 -25 लाख के विज्ञापन लाने का टारगेट दिया गया था और जिसने ना कहा, उसको निकाल देने की धमकी दी जाती थी.

टारगेट पूरा करने हेतु कईं बार स्ट्रिंगर्स को मौत के मुँह में भी कूदना पड़ता है. उस वक्त वह सोच रहा होता है कि मुश्किल वक्त पर उनका मीडिया चैनल उनके साथ खड़ा होगा लेकिन ऐसा कुछ होते ही मीडिया उसे चाय में मक्खी की तरह बहार निकाल कर फ़ेंक देता है.

2015 में आईबीएन-7 और ईटीवी के स्ट्रिंगरों ने आरोप लगाया था कि रिलायंस वाले खूब विचार विमर्श करने के बाद स्ट्रिंगरों को वेंडर में तब्दील कर रहे हैं. मतलब परकारिता के पेशे में यहाँ भी कॉर्पोरेट वाला तड़का लगा दिया गया है. दोनों चैनल्स के नाम पर एक फॉर्म भी वायरल हुआ था.

स्ट्रिंगरों को वेंडर में तब्दील करते IBN-7 & ETV के फॉर्म की झलक

समय पर पैसा नहीं मिलना सबसे बड़ी समस्या है

स्ट्रिंगर अपना पेट पालने के लिए मान-सम्मान-पहचान से तो समझौता कर लेता है लेकिन समुद्र में एक बून्द समान वेतन भी समय पर नहीं मिल पाना उनकी सबसे बड़ी समस्या है.

जून 2017 में खबर आई थी कि ‘न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया’ चैनल ने एक साल से स्ट्रिंगरों को पैसे नहीं दिए. पैसे नहीं मिलने के कारण ईमानदार स्टिंगरों के सामने भुखमरी की नौबत आ गई थी.

आज भी ज्यादातर चैनल्स 100 से 200 रुपया ही एक स्टोरी के पीछे स्ट्रिंगर्स को देते हैं. ऐसे में उनके लिए प्रति माह 5000 रुपए कमा पाना भी मुश्किल हो जाता है.

2016 में प्रभु चावला ने एक नया न्यूज़ चैनल ‘नेशनल वॉयस उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड’ शुरू किया था. स्ट्रिंगरों को माइक और आई-डी देकर खूब काम भी वसूला जा रहा था लेकिन कुछ समय बाद खबर आई कि 6 महीने से ज्यादा समय तक किसी को पेमेंट नहीं दिया गया.

2015 में ‘इंडिया टीवी’ के स्ट्रिंगरों ने आरोप लगाया था कि “खबर के नाम पर स्ट्रिंगर्स पर जम के दबाव बनाया जाता है, लेकिन जब पैसे देने का समय आता है तो ठेंगा दिखा दिया जाता है. चैनल की ओर से शुरुआत में स्ट्रिंगर्स को खबर के बदले 1000 रुपये देने की बात कही जाती है मगर जब बिल बनाये जाते हैं तब इनकी ख़बरों की सूची काट-छांट कर इतनी छोटी कर दी जाती है कि इतना पैसा भी नहीं मिल पाता कि इंटरनेट का बिल भी पूरा भरा जा सके.”

2013 में ‘न्यूज नेशन’ के लॉन्चिंग के बाद, इस चैनल ने स्ट्रिंगरों के दम पर लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ीं लेकिन जब एहसान चुकाने का समय आया तो चैनल ने स्ट्रिंगरों की लगभग साल-साल भर की कमाई पर डाका डाल दिया. वहां स्ट्रिंगरों को पहले भी हर तीन-चार महीने बाद थोड़े से पैसे दिए जाते थे जबकि बकाया बाद में देने की बात कही जाती थी.

स्टिंग ऑपरेशन्स में कमी

मीडिया संस्थान हर समय इस बात की फ़िराक में रहते हैं कि एक्सक्लूसिव स्टिंग ऑपरेशन्स के जरिये दूसरे चैनलों की टी.आर.पी में सेंध मारी जाये. खासकर चुनावों के वक्त. इससे उनके चैनल का नाम होता है, उस चैनल के प्रति दर्शकों का आकर्षण भी बढ़ता है. लेकिन दिल्ली में बैठे मीडिया आकाओं के लिए ये काम उतना भी आसान नहीं है क्योंकि आज टीवी पर दिखने वाले पत्रकारों का ज़मीन से लगभग नाता टूट ही चूका है और देश के किसी छोटे कस्बे में इस तरह के स्टिंग ऑपरेशन को यदि अंजाम देना है तो उसके लिए कोई लोकल बंदा चाहिए. और वो स्ट्रिंगर ही होता है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षो में मीडिया को परखा जाये तो समझ आएगा कि स्टिंग ऑपरेशन्स में बहुत बड़ी गिरावट आई है. इसका बहुत बड़ा कारण हो सकता है कि स्टिंग ऑपरेशन के बाद मीडिया और सामने वाली पार्टी के बीच सांठ-गांठ करके मामले को दबा दिया जाता है लेकिन फंस जाता है हमारा स्ट्रिंगर.

स्टिंग ऑपरेशन में स्ट्रिंगर के फंस जाने के बाद मीडिया संस्थान की ओर से जिस तरह की क़ानूनी मदद उन्हें मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पाती और गरीब स्ट्रिंगर अदालतों और सरकारी कचहरियों की दलदल में फंस जाता है.

ऑगस्ट 2013 में पी-7 न्यूज़ के बनारस के स्ट्रिंगर अभ्युदय द्विवेदी बीएचयू के मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. मधुकर राय का स्टिंग करने पहुंचे थे. उस समय डॉ. राय ओपीडी विभाग में अपनी सेवा दे रहे थे. मरीज़ों की लाइन के बीच अभ्युदय द्विवेदी वीडियो और फोटोग्राफी करने लगे. कुछ समय बाद डॉ. राय की नज़र अभ्युदय द्विवेदी पर पड़ी तो उन्होंने वीडियो ग्राफी पर ऐतराज जताया और उनसे अपना परिचय पूछा. इसपर अभ्युदय ने खुद को न्यूज़ चैनल पी-7 का स्थानीय प्रतिनिधि बताया. लेकिन डॉ. साहब ने अभ्युदय की एक ना सुनी और उन्हें सुरक्षा कर्मियों के हवाले कर दिया. बाद में पी-7 चैनल के उत्तर प्रदेश प्रमुख ज्ञानेंद्र शुक्ल ने डॉ. साहब से बात की तो कन्फर्म हुआ कि अभ्युदय द्विवेदी पी-7 के स्थानीय स्ट्रिंगर है.

लेकिन बातचीत के दौरान जब डॉ. राय ने ज्ञानेन्‍द्र शुक्‍ल को इस स्टिंग ऑपरेशन के बारे में पूछा तो ज्ञानेन्‍द्र शुक्‍ल ने इस बात से कन्नी काट ली और बताया कि उन्होंने अभ्‍युदय को इस प्रकार के किसी भी स्टिंग आपरेशन के लिए अधिकृत नहीं किया था. साथ ही स्ट्रिंगर अभ्‍युदय द्विवेदी को अगले आदेश तक चैनल के लिए कार्य करने से रोक दिया गया.


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