क्या मनुस्मृति में सवर्णों को वैसे ही ‘विशेषाधिकार’ हैं, जैसे आज दलितों के पास हैं?


ब्राह्मण - शूद्र - राजनीति

प्राचीन काल की तरह विशेषाधिकार मनुष्य के ‘कर्म और गुण’ पर आधारित न होकर उसके ‘जन्म’ पर आधारित हैं।  इस नाते ‘व्यक्ति सत्ता’ को नकारकर ‘जन्म सत्ता’ से अधिकार पाने के नियम मनुस्मृति और मौजूदा भारतीय संविधान में एकजैसे हैं। ‘विशेषाधिकार’ के साथ वर्गीकरण व्यवस्था बदस्तूर जारी है। सुंदर-कुरूप, अमीर-गरीब, विद्वान-मूर्ख का वर्गीकरण है। वर्गीकरण के आधार पर मनु ने जीवन व्यवस्था बनाई थी।

पिछले दिनों जयपुर स्थित राजस्थान उच्च न्यायालय में लगी मनु की प्रतिमा पर औरंगाबाद से आई दो महिलाओं ने कालिख पोत दी। इसके बाद हाईकोर्ट परिसर में लगी मनु की प्रतिमा के यहां होने या न होने पर तीखी बहस शुरू हो गई। यह बहस मनु और उनकी लिखी ‘मनुस्मृति’ को स्वीकारने या नकारने पर छिड़ी है।

सनातन सवाल है कि सृष्टि कैसी होनी चाहिए? यह कैसे चलनी चाहिए? इस सवाल के जवाब में मनु ने विधान के रूप में एक ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ का निर्माण किया। इसका इतिहास महाभारत से पुराना है। दूसरे विद्वानों का मानना है कि मनुस्मृति ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से अधिक पुरानी नहीं है। उनका यह भी दावा है कि मनुस्मृति बदलती और बिगड़ती रही है। अभी जो मनुस्मृति है, उससे छेड़छाड़ हुई है। मनुस्मृति के समय को लेकर भले उठापटक हो पर इसके लेखक को लेकर कोई झगड़ा नहीं है। समाज, राष्ट्र और संपूर्ण विश्व को संचालित करने के लिए मनु ने इसकी रचना की। इस बात पर विवाद है कि मनुस्मृति ऊंच—नीच और वर्णभेद—लिंगभेद का आधार ग्रंथ है। जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि मनुस्मृति विश्व का पुरातन संवैधानिक दस्तावेज है। यह संविधान के साथ धर्मग्रंथ है। जीवन कैसे जीना है, इसकी नियंत्रक धार्मिक पुस्तक है। आचार—विचार का पुराना धर्मशास्त्र है। कानूनी व्यवस्था की शुरूआती किताब है।


मनुस्मृति आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ है। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जाता है।

– लुई जैकोलिऑट

शास्त्र परंपरा में स्मृतियों की मान्यता है। इनका स्थान वेद और उपनिषदों के बाद है। वेद मंत्रों में निहित अभिप्राय का स्मरण स्मृतियां करवाती हैं। ये आम आदमी तक वेदों के जटिल ज्ञान को पहुंचाने का आसान तरीका है। इसलिए एक नियम बना कि जो वेद नहीं पढ़ते, वे स्मृतियां पढ़ें, पुराण पढ़ें एवं रामायण—महाभारत पढ़ें। मानव के भीतर संस्कार, उद्देश्य और क्षमता को बढ़ाने के लिए स्मृतियों का लिखा जाना शुरू हुआ। वेदों की वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या का क्रम शुरू हुआ, जिसके परिणाम में स्मृतियां आईं। ये अनेक हैं—शंख स्मृति, लिखित स्मृति, हारीत स्मृति इत्यादि। इनमें मनुस्मृति सबसे पुरानी तथा प्रभावी है।

मनु ने वैदिक सिद्धांतों को समाज के लिए सरल किया। विद्वानों का मानना है मनुस्मृति दुनिया का पहला संवैधानिक ग्रंथ है। इन विद्वानों में भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी नाम भी शामिल हैं। ‘बाइबल इन इण्डिया’ में लुई जैकोलिऑट का मानना है,मनुस्मृति आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ है। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जाता है।

भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘धर्मशास्त्र का इतिहास‘ में मनु के प्रभाव का विवेचन किया है। फिलीपींस की राजधानी मनीला के नेशनल असेंबली हॉल में मनु की तस्वीर लगी है। जिस पर लिखा है,’मानव जाति के प्रथम महान और बुद्धिमान कानूनविद्।’ थाईलैंड में अनेक लीगल टैक्स्ट के नाम मनुस्मृति से उठाकर ज्यों के त्यों रखे गए हैं।

जब किसी भी धर्म, जाति, राष्ट्र, भाषा, पंथ और परंपरा में चिंतन का जरा भी प्रवाह नहीं था, तब मनु ने पहला संविधान ग्रंथ बनाया। इस संविधान के हिसाब से ईश्वर सबके हैं। उनमें कोई पक्षपात नहीं है। अपने—अपने कर्म में निष्ठ होने के साथ मनुष्य के लिए चारित्रिक शुचिता जरूरी है। रामानंद संप्रदाय के प्रधान स्वामी रामनरेशाचार्य कहते हैं, ‘मनु की संतान ‘मानव’ कहलाती है’। इस नाते मनु ने मानवों को उत्तम जीवन का उपदेश किया। धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध नहीं करने को ‘धर्म’ बताकर चरित्र निर्माण का दृढ़ प्रयास किया।’

एक वर्ग है, जिसके हिसाब से मनुस्मृति में सब ठीक है। वहीं, दूसरे लोगों का कहना है कि मनुस्मृति वर्णभेद, लिंगभेद और जातिभेद का समर्थन करती है। उसका बचे रहना आजाद भारत के लिए ठीक नहीं है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेड़कर ने यही सोच—समझकर मनुस्मृति जलाई थी। उनका मानना था कि मनुस्मृति मानवता की बात नहीं करती। इसमें वर्गीकरण, छुआछूत और ब्राह्मणवाद की स्थापना है। कई मायनों में आंबेड़कर की बात तथ्यों पर आधारित है। पर इस संदर्भ में यह जानना चाहिए कि मनुस्मृति का प्रबल विरोध करने वाले आंबेड़कर ने वेद और उपनिषदों का विरोध नहीं किया। न ही भाषाई आधार पर ब्राह्मणों की तथाकथित भाषा संस्कृत को कमतर दिखाया। याद कीजिए, उन्होंने आजाद भारत की भाषा संस्कृत को बनाने के लिए जमकर पैरवी की। यह 10 सितंबर, 1949 की बात है।

दोनों धड़ों के बीच मनुस्मृति पर लंबे समय से चल रही बहस के बीच कई सवाल हैं। जिनके उत्तर जरूरी है। पहला प्रश्न वर्गीकरण से जुड़ा है। क्या कोई बता सकता है कि आज संसार वर्गीकरण के बिना चल रहा है? यदि हां तो हर जगह श्रेणियां क्यों हैं? इस श्रेणी के हिसाब से व्यक्ति का सम्मान है। वेतन हैं, भत्ते हैं, बंगले हैं और दूसरी सुविधाएं हैं। किसी चपरासी को अगर आईएएस के समान सुविधाएं मिले तो क्या कोई आईएएस बनने के लिए मेहनत करेगा? साफ है कि ब्राह्मण हो या दलित, जिसके पास पद, प्रतिष्ठा और पैसे हैं, वही सम्मान प्राप्त कर रहा है। आजादी के 70 साल बाद भी सम्मान का दायरा क्या वही नहीं है, जो सदा से चला आ रहा है? आंबेड़कर इस दायरे को तोड़ना चाहते थे। इस नाते उन्होंने जातिभेद और वर्गभेद का तार्किक विरोध किया। वे जानते थे कि भारत परिष्कार की परंपरा का देश है। भारत में धार्मिक और सामाजिक विचार कहने और लिखने की छूट है। वेदों को नहीं मानने वाले चार्वाक, जैन और बौद्ध भी हैं। अनेक परस्पर विरोधी ग्रंथ हैं। मत और चिंतन की लहराती हुई धाराएं हैं। इस नाते उन्होंने मनुस्मृति के निहितार्थ के परिष्कार को जरूरी मानकर उसका विरोध किया, जिससे समानतामूलक देश का निर्माण हो सके।


मनु का बनाया संविधान मौजूदा संविधान से  मेल नहीं खाता। लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि प्राचीनतम सभ्यता को सुचारु रूप से विकसित करने के लिए संविधानग्रंथ का निर्माण मनु द्वारा किया गया, जो सहस्राब्दियों तक चलता रहा। उसमें से अनपेक्षित अंश को ध्यान में रखते हुए संविधान की अवधारणा को देने वाले मनु की प्रासंगिकता बरकरार है।

– संस्कृत विद्वान् डॉ. उमेश नेपाल

मनुस्मृति के निहितार्थ को लेकर बड़ी समस्या है, जिसे हल करने का काम अग्रणी विद्वानों का है। स्पष्ट है कि संस्कृत विद्वान जिस अंश को ‘अनपेक्षित’ मान रहे हैं, वही अंश भारतीय राजनीति के लिए अपेक्षित होकर ‘वरदान’ बन गया है। इस वरदान में वोट हैं, कुर्सी है और सरकारें हैं। यह अंश पुराने जमाने में सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों को वैसे ही ‘विशेषाधिकार’ देता था, जैसा आज दलितों के पाले में है। प्राचीन काल की तरह यह विशेषाधिकार मनुष्य के ‘कर्म और गुण’ पर आधारित न होकर उसके ‘जन्म’ पर आधारित है। इस नाते ‘व्यक्ति सत्ता’ को नकारकर ‘जन्म सत्ता’ से अधिकार पाने के नियम मनुस्मृति और मौजूदा भारतीय संविधान में लगभग एकजैसे हैं। हालांकि इस ‘विशेषाधिकार’ के बाद भी वर्गीकरण व्यवस्था बदस्तूर जारी है। सुंदर-कुरूप, अमीर—गरीब, विद्वान—मूर्ख का वर्गीकरण सर्वत्र है। इसी वर्गीकरण के आधार पर मनु ने कभी प्राचीन जीवन व्यवस्था बनाई थी।

मनुस्मृति में सिर्फ जात—पांत और छोटा—बड़ा नहीं है बल्कि वहां ऐसे अनेक जवाब हैं, जो सभी को स्वीकार हैं। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’, स्त्री के सम्मान में सर्वाधिक प्रसिद्ध यह घोषणा मनु ने की, जिसका अर्थ है, ‘जहां स्त्रियों का आदर किया जाता है, वहां देवता रमण करते हैं।’ मनु से पूछा गया, ‘धर्म को कहां खोजें?’ उत्तर मिला,’वेद धर्म का मूल है, उसमें खोजो।’ माता-पिता की सेवा करना कौन सिखाएगा? क्या किसी ने सोचा कि माता देवी क्यों है? पिता देवता क्यों है? माता—पिता का ऋण कैसे उतारना है? ऐसे ढेर सारे सवालों को मनु ने सुलझाया। हकीकत में जरूरत है पूर्वाग्रहों को छोड़कर भारत की अमर शास्त्र परंपरा के खुले मन से पुन:पाठ की, जिससे आपसी समझ और अच्छाई का सार निकल सके।


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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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