आस्था का फैसला अदालत में क्यों?


Image Credit : -Sabarimalaiayyappan/ blogspot

केरल के सबरिमलैइ स्थित अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय पीठ ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देते हुए कहा है कि भक्ति में लिंग आधारित भेदभाव नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत के इशारे से सवाल उठता है कि क्या सचमुच मठ-मंदिरों में प्रवेश या दूसरी धार्मिक विधियों में लिंग आधारित भेदभाव है? सुप्रीम कोर्ट जिसे भेदभाव बता रहा है, वह असमानता है या धार्मिक व्यवस्था? क्या ‘मातृदेवो भव’ के उद्घोषक वैदिक धर्म में नारी दूसरे पायदान पर है? इन सवालों के जवाब से तय होगा कि सनातन परंपरा में स्त्री के धार्मिक तथा सामाजिक अधिकार कितने मजबूत हैं। 

 
ज्ञान और विज्ञान के पुरातन स्रोत वेद हैं। वेद मानव सभ्यता की साहित्यिक विरासत में सबसे पुराने लिखित जीवित दस्तावेज के रूप में आज भी मौजूद हैं। इनकी सुदीर्घ परंपरा है, इतिहास है एवं मान्यता है। प्राय: वेदों को पुरुषों द्वारा और पुरुषों के लिए लिखा गया साहित्य माना जाता है। जबकि वहां संघर्ष करती तथा पुरुष वर्चस्व के आगे न झुकने वाली स्त्रियों की अनेक छवियां और साक्ष्य हैं। ऋग्वेद समेत दूसरे ग्रंथों में स्त्रियों का ऋषिका के रूप में उल्लेख है। ऋषि मतलब साधना के बल से मंत्रों का साक्षात्कार कर लेने वाला। वेदों में लोपामुद्रा, अपाला, घोषा, मांधात्री, शाश्वती, विश्ववारा आदि अनेक महिला ऋषिकाएं हैं। इन महिला ऋषिकाओं ने वैदिक सूक्त रचे। 
 
मंत्रों का साक्षात्कार करना और काव्य रचना स्वाधीनता की चरम स्थिति को प्रकट करता है। जब स्त्री ऋषिका के रूप में मंत्रद्रष्टा है तो उसे वेद पढऩे का अधिकार भी जन्म से है। फिर भी यह भ्रांति वर्षों से फैलाई जा रही है कि स्त्रियों को वेद-पुराण पढऩे का अधिकार नहीं है। जबकि वेद पाठ में निष्णात स्त्रियों को ‘पथ्यस्वस्ति वाक्’ की उपाधि तक दी जाती थी। यहां तक कि सीतायज्ञ तथा रुद्रयज्ञ, दो वैदिक यज्ञ ऐसे हैं, जिनका अनुष्ठान केवल स्त्रियां ही कर सकती हैं। स्त्री अपनी पुरोहित भी खुद है और यज्ञ में कर्मकांड भी वह स्वयं करती है। 
 
इन संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है कि आखिर क्यों सबरिमलैइ मंदिर में बारह साल से पचास साल की उम्र के बीच की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकती थीं? ‘सबरिमलैइ’ शब्द मलयालम भाषा का है, जिसमें दो शब्द हैं- सबरि और मलैइ। ‘सबरि’ रामायण की एक स्त्री पात्र शबरी हैं। ‘मलैइ’ का तात्पर्य पर्वत है। किंवदंतीपरक मान्यता है कि महर्षि मतंग की शिष्या माता शबरी ने इस पर्वत पर कठोर साधना की थी। ऐसे में इस पर्वत पर स्त्री की उपस्थिति का इतिहास रामायण काल से है, जो नाम आज भी चल रहा है। फिर वह धार्मिक व्यवस्था क्या है, जिसके चलते 12 साल से ऊपर की स्त्रियों का प्रवेश यहां निषेध कर दिया गया।
 
एक तथ्य अल्पज्ञात है कि सबरिमलैइ पर बने जिस मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर जंग छिड़ी, उस मंदिर में प्रतिष्ठापित देवता भगवान अयप्पा हैं। अयप्पा लोकदेवता हैं, जिनके जन्म लेने की कथा अचरजभरी है। विष्णुपुराण के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत को असुरों से बचाकर देवताओं को बांटने के लिए भगवान विष्णु ने ‘मोहिनी’ के रूप में नारी स्वरूप धारण किया। उनके अप्रतिम सौंदर्य पर महादेव शिव मोहित हो गए। इनके संयोग से भगवान अयप्पा का प्राकट्य हुआ। अयप्पा ऐसे देवता हैं, जिनके जन्म में किसी स्त्री की कोई भूमिका नहीं है। वे किसी नारी के गर्भ में आए बिना जन्में। इस नाते अयप्पा का जन्म से ही स्त्री जाति से कोई संबंध नहीं है। ऊपर से भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी देवता हैं। आज तक इसी स्वरूप में उनका पूजन-अर्चन होता है। 
 
भगवान अयप्पा के मंदिर की पदयात्रा करना श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का विषय है। यहां की यात्रा करने वाले श्रद्धालु 41 दिनों की संयम और उपवास से युक्त कठिन व्रत-साधना करते हैं। वे एक समय भोजन करते हैं एवं जूता-चप्पल त्याग देते हैं। इस नियमबद्ध लंबी साधना के बाद श्रद्धालु मंदिर तक पहुंचते हैं। मंदिर में प्रवेश से पहले जो व्रत किया जाता है, उसका पवित्रता से गहरा संबंध है। मान्यता है कि स्त्रियां 41 दिनों तक लगातार पवित्र नहीं रह सकती। उनका मासिक चक्र इसमें व्यवधान है। धर्मशास्त्र की मान्यतानुसार रजस्वला स्त्रियों को पूजा तथा धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपवित्र माना जाता है। इस नाते स्त्रियां मंदिर पहुंचने के लिए अनिवार्य 41 दिनों का व्रत पूरा नहीं कर पाती हैं। इस व्रत के अभाव में उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता। 
 
पराशरस्मृति में एक श्लोक है- 
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी।
दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला।।
इसके अनुसार आठ साल की लड़की ‘गौरी’, नौ साल की ‘रोहिणी’ एवं दस साल की ‘कन्या’ कहलाती है। दस वर्ष की उम्र पार करने के बाद वह रजस्वला होती है। मनुस्मृति सरीखे प्राचीन ग्रंथों में स्त्री के लिए ऋतुकाल में कोई धार्मिक कार्य करना प्रशस्त नहीं है। धर्मशास्त्र में व्यवस्था है कि रजस्वला होने पर स्त्री गृह कार्य के अलावा धर्म कार्य न करे। धर्मशास्त्र के टीकाकारों के साथ आधुनिक विद्वानों का कहना है कि रजोदर्शन के काल में स्त्री को आराम देने के लिए यह शास्त्रीय व्यवस्था बनाई गई थी। शारीरिक पीड़ा के दौर से गुजर रही स्त्री को और कष्ट सहन न करना पड़े इसलिए उसे सभी प्रकार के कर्मों से मुक्त कर दिया गया। दूसरी ओर, धर्मशास्त्र ने धार्मिक कृत्य के संपादन में विवाहिता स्त्री की उपस्थिति को अनिवार्य किया है। धर्मशास्त्र के अनुसार किसी पुरुष द्वारा किए गए तीर्थ, व्रत, उद्यापन तथा यज्ञ कार्य तभी पूर्ण होते हैं, जब उसमें पत्नी की उपस्थिति अनिवार्य रूप से हो। इस नाते पत्नी के साथ ‘धर्म’ शब्द जुड़ गया और उसकी संज्ञा ही ‘धर्मपत्नी’ हो गई। इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण महाकवि भवभूति का ‘उत्तररामचरितम्’ का वह प्रसिद्ध कथानक है जब श्रीराम अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान में माता सीता के साक्षात उपस्थित न रहने पर उनकी स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करके अनुष्ठान संपन्न करते हैं। 
 
उपनिषदों में बुद्धिजीवी महिलाएं खुली बहस में शिरकत करती हैं, शास्त्र रचती हैं एवं धर्मोपदेश करती हैं। वैदिक काल में घोषा और इला इसी तरह की महिलाएं थीं। काशकृत्स्ना मीमांसा दर्शन की आचार्या थी। गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी और सुवर्चला अपनी जीवनशैली खुद चुनती हैं। गार्गी ब्रह्मवादिनी नारी है। वह अकेली ही ऋषि याज्ञवल्क्य से बहस करती है। वहीं, मैत्रेयी घर-बार और अटूट संपदा का त्याग कर याज्ञवल्क्य के साथ जाने का निर्णय लेती हैं। छठी शताब्दी के आचार्य वराहमिहिर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बृहत्संहिता’ में स्त्रियों के पक्ष का ओजस्वी समर्थन किया है। वे लिखते हैं, ‘धर्म और अर्थ, दोनों स्त्रियों पर आधारित हैं। स्त्रियों से ही पुरुष काम-सुख तथा संतान सुख प्राप्त करते हैं। इस नाते स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा अति उच्च हैं।’
वैदिक एवं पौराणिक मान्यताओं से स्पष्ट है कि पुरातन भारत में स्त्रियां दूसरे पायदान पर कभी नहीं रही। वे मुख्य धारा में रहकर समाज की संचालिका हैं। धर्मशास्त्र के जिन पुराने नियमों ने भारत को स्त्रीपूजक देश बनाया, धर्म की उन्हीं मान्यताओं ने स्त्री की शारीरिक बनावट का हवाला देकर उसे कष्टकर यात्राओं से बचाया। जन्म सत्ता की व्यक्ति सत्ता को महत्व दिया। उसकी शारीरिक बनावट को ध्यान में रखकर उस परिस्थिति को धर्मानुकूल बनाकर उसे उस दौरान सुख देने का प्रयास किया। इस प्रयास को लैंगिक असमानता के तौर पर देखना कहां तक जायज है? इसलिए मंदिर प्रवेश का विषय केवल स्त्री और पुरुष तक सीमित नहीं है बल्कि इसके निहितार्थ धर्म के आचरण की मान्यताओं से जुड़े हैं। यह मसला स्त्रियों के समानता के अधिकार के साथ धर्म की प्राचीन विधान से भी जुड़ा है, जिसका निर्णय धर्मशास्त्र के धरातल पर ही होना चाहिए। संत मीरा के देश में सिर्फ मंदिर प्रवेश से स्त्री स्वाधीनता का दावा करना उनके साथ छलावा है, साथ ही उसके नैसर्गिक गुणों को दबाकर उसकी महिमा को इस रूप में बढ़ाना है कि स्त्री खुद जान ले कि वह सिर्फ एक औरत है!

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि दआर्टिकल.इन उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए आप हमें लिख सकते हैं या लेखक से जुड़ सकते हैं.@Kosalendradas

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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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