देश में रोहिंग्याओं का मुद्दा इस समय खूब गर्माया हुआ है. भारत सरकार उन्हें अवैध और देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बता रही है वहीं कांग्रेस और उनकी साथी पार्टियां भारत में उन्हें बसाकर वोट बैंक पकाने के लिए लार टपका रहीं हैं. बीच-बीच में रोहिंग्याओं का उग्रवाद और उनके आतंकवादी कनेक्शन भी मीडिया में एक खास कोना पकडे हुए हैं.

रोहिंग्याओं के मुद्दे पर जब भी कहीं चर्चा होती है तब बात जा पहुँचती है म्यांमार के रखाइन प्रान्त तक. 25 अगस्त को यहीं से हिंसा की शुरुआत हुई थी जब रोहिंग्या मुस्लिम चरमपंथियों ने वहां के पुलिस बल पर हमला किया और फिर पुलिस थानों में आग लगा दी, जिसमें कईं पुलिस कर्मियों की मृत्यु हो गई थी. इस घटना के बाद रोहिंग्या संगठनों और सेना बीच टकराव हुआ और करीब 7 लाख रोहिंग्या घुसपैठियों की माफिक बांग्लादेश और भारत जैसे देशो में आ घुसे.

रखाइन प्रान्त की बात करें तो यहाँ की आबादी करीब 3,188,807 है. म्यांमार के अधिकांश प्रांतो की तरह रखाइन में भी विविध जातीय आबादी है. इस आबादी में मोटे भाग की जनसँख्या क्रमशः बौद्धों और मुसलमानो की है. इसके अलावे थेट, कामिन, चिन, मरो, चकमा, खामी, डेनेट, बंगाली हिंदू और मरामागरी जैसे कई अन्य संजातीय अल्पसंख्यक मुख्य रूप से यहाँ के पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं.

इन संजातीय अल्पसंख्यको में भारत की दृष्टि से सबसे सुने हुए और ट्रेंडिंग समुदाय का नाम है ‘चकमा’.

पांच दशक पहले ‘चकमा’ पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत में आए थे और अभी पूर्वोत्तर के शिविरों में रह रहे हैं. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में केंद्र सरकार को चकमा और हाजोंग शरणार्थियों को नागरिकता देने का आदेश दिया था.

कौन हैं ये चकमा? क्या है इनका इतिहास?

‘चकमा’ यह नाम संस्कृत शब्द शक्तिमान या शक्ति के दर्शक से निकला है. बगान युग में एक बर्मी राजा ने इस समुदाय को यह नाम दिया था. इसके पहले ये लोग ‘सकमा’ के नाम से जाने जाते थे. यह समुदाय मूलत: बौद्ध धर्म से ताल्लुक रखता है. इनकी अपनी एक अलग भाषा है, अलग संस्कृति है साथ ही अलग खान-पान भी है.

चकमा तिब्बती-बर्मन हैं, और वे हिमालय की तलहटी-जनजातियों से निकट संबंध रखते हैं. माना जाता है कि उनका मूल ठिकाना अराकान पर्वतमाला है जिसे रखाइन पर्वतमाला भी कहते हैं. यह भारत व बर्मा की कई पर्वतमालाओं में से सबसे विशाल पर्वतमाला है, जिसमें से कुछ बांग्लादेश और भारत के असम, नागालैण्ड और मिज़ोरम राज्यों को भी जोड़ती हैं.

कहा जाता है कि 15 वीं सदी के आसपास अधिकांश चकमा वर्तमान बांग्लादेश के चटगांव की पहाड़ियों में आकर बसे, जिसे चटगांव हिल ट्रैक्ट्स(CHT) कहा जाता है. और कुछ भारत के अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और त्रिपुरा राज्यों में आकर बसे.

‘चटगांव हिल ट्रैक्ट्स’ यह चकमा समुदाय की मातृभूमि है. 16वीं सदी के एक पुर्तगाली नक़्शे में कर्णफूली नदी के क्षेत्र में चकमाओं का जिक्र मिलता है जो वर्तमान में बांग्लादेश के चटगांव का हिस्सा है.

Portuguese Map of CHT


ब्रिटिश काल के दौरान चटगांव हिल ट्रैक्ट्स

प्लासी की लड़ाई के बाद, मुर्शिदाबाद के नए नवाब मीर कासिम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को चटगांव, बर्धमान और मेदिनीपुर तोहफे में दे दिए. उस समय चटगांव हिल ट्रैक्ट्स से मुग़लों को जिमीकंद और कॉटन की आपूर्ति होती थी.

5 जनवरी 1761 के रोज ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि हेरी वेरेलस्ट ने सूबेदार मोहम्मद रेज़ा खान से चटगांव का प्रभार अपने हाथो में लिया. लेकिन तत्कालीन चकमाओं के राजा शेर दौलत खान को ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिपत्य मंजूर नहीं था. साथ ही उन्होंने कंपनी की बढ़ी हुई दर पर करों की मांग को भी स्वीकार नहीं किया. नतीजन कंपनी और चकमाओं के राजा शेर दौलत खान के बिच एक लम्बा युद्ध शुरू हुआ. जिसका अंत 1787 में शेर दौलत खान के बेटे जन बक्श खान और कंपनी के बीच हुई संधि से हुआ. जिसके तहत जन बक्श खान को ईस्ट इंडिया कंपनी की संप्रभुता को स्वीकार करना पड़ा, साथ ही सालाना 500 मन कॉटन देने का कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ.

ई.सन 1800 के पहले-पहले जन बक्श खान ने राजानगर को अपनी नई राजधानी घोषित की. आज यह बांग्लादेश के रांगुनिय़ा के आसपास स्थित है. 1860 तक चकमा राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सबकुछ ठीक चल रहा था ऐसा कहा जा सकता है लेकिन अंग्रेजो की कॉटन मीलों को सुचारु चलाने के लिए कॉटन की नित्य आपूर्ति जरुरी थी और इसकी खपत चटगांव हिल ट्रैक्ट्स के नियंत्रण से दूर की जा सकती थी.

इसलिए 18 अगस्त 1860 के रोज हिल ट्रैक्ट्स को चटगांव जिले से अलग कर चंद्रघोना में मुख्यालय स्थापित किया गया. इसके लिए एक अधीक्षक भी नियुक्त किया गया.

1869 में एक बार फिर हिल ट्रैक्ट्स के मुख्यालय को चंद्रघोना से रंगमती स्थानांतरित किया गया. साथ ही अधीक्षक के पद को बदल कर डिप्टी कमिश्नर कर दिया गया. अब डिप्टी कमिश्नर की ऑफिस को पहाड़ी इलाकों के राजस्व और न्याय के अधिकार निहित थे.

1881 के दौरान, अंग्रेजो ने चटगांव हिल ट्रैक्ट्स को तीन सर्किल, चकमा, बोहमोंग और मोंग में विभाजित कर दिया. प्रत्येक सर्किल के मुखिया को चीफ़ कहा गया. चकमा सर्किल के चीफ़ चकमा थे, बोहमोंग सर्किल के चीफ़ बोहमोंग थे और मोंग सर्किल के चीफ मोंग थे.

1930 के दौरान, जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन अपने चरम पर थे तब चटगांव हिल ट्रैक्ट्स की स्थानीय जनजातियों ने एक स्वतंत्र राज्य की मांग कि क्योंकि उनका मानना था कि उनकी जातीयता, धर्म और भाषा बंगालियों से बेहद भिन्न है. जनजातियों की इस मांग पर अंग्रेजो ने हामी भी भर दी थी.

बंटवारे के समय चकमाओं की स्थिति

‘टू नेशन थ्योरी’ के तहत भारत के राजे-रजवाड़ो को ये विशेषाधिकार मिले थे कि वे अपने राज्यों का हिंदुस्तान या पाकिस्तान दोनों में से किसी एक में विलय कर सकतें हैं. इस दौरान, चटगांव हिल ट्रैक्ट्स पर 98% गैर-मुस्लिम आबादी थी जिसमे चकमा प्रमुख थे. चकमा के साथ साथ शेष जनजातियां भी चटगांव हिल ट्रैक्ट्स का भारत में विलय चाहती थी लेकिन इसके बावजूद सिरिल जॉन रेडक्लिफ़ ने चटगांव हिल ट्रैक्ट्स को पाकिस्तान के ख़ैमे में डाल दिया.

चकमाओं का ‘ब्लैक डे’

जब चटगांव हिल ट्रैक्ट्स पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बना तब वहाँ 98% गैर-मुस्लिम आबादी थी. चकमाओंं के साथ-साथ इस आबादी में खुमी, लुशाई, हाजोंग, खेयांग्स, त्रिपुरास, मार्मा भी मुख्य थे. इस समस्त आबादी को जुम्मा कहा जाता था.

15 अगस्त 1947 के रोज चटगांव हिल ट्रैक्ट्स का जबरदस्ती पाकिस्तान में विलय कराए जाने के कारण जुम्माओ में उग्र रोष था. 14 अगस्त की शाम, जब समस्त भारतवासी आज़ादी का जश्न मना रहे थे तब तत्कालीन चकमा राजा त्रिदेव रॉय ने भी अपने शाही महल से भारत का झंडा फरया था. लेकिन 17 अगस्त 1947 के रोज, पाकिस्तान की बलोच रेजिमेंट ने भारत का झंडा गिराकर चटगांव हिल ट्रैक्ट्स पर कब्जा कर लिया.

इस वजह से चकमा समुदाय आज भी 17 अगस्त 1947 को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मानते हैं.

अब जब सत्ता मुस्लिम हुक्मरानो के हाथो में चली गई तो चकमाओं पर ज़ुल्म और अत्याचार के मामले बढ़ गए. पाकिस्तान ने इन पर्वतीय इलाकों में मुस्लिमो को बसाना शुरू किया. इस वजह से ‘बौद्ध चकमाओं’ में भय का माहौल बैठ गया.

चकमाओं का भारत में विस्थापन

1962 में अमेरिका के समर्थन से पाकिस्तान की सरकार ने कप्टाई डैम बनाया, जिससे चकमाओं की जमीन का बड़ा हिस्सा पानी में डूब गया. बौद्ध चकमाओं और मुसलमानो के बीच सबकुछ ठीक नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में चकमाओं के साथ साथ दूसरे समुदायों को भी अपनी जान बचाने के लिए भारत की ओर रुख करना पड़ा. अंतत: सैकड़ों चकमा, हाजोंग आदि भारत के पूर्वाेत्तर इलाकों में आ गए. जिसमे अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा मुख्य डेरा था.

बांग्लादेश बनने के बाद चकमा

पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बन जाने के बाद बांग्लादेश ने एक नए संविधान के प्रारूप को तैयार किया जिसमे गैर-बंगालीयो की खुल के अनदेखी की गई थी. संविधान के उस प्रारूप के अनुसार बांग्लादेश के सभी नागरिकों को केवल बंगाली संस्कृति, बंगाली भाषा और एक बंगाली के रूप में नामित किया गया था. चूँकि चटगांव हिल ट्रैक्ट्स की जनजातियों की संस्कृति, भाषा और धर्म बंगालियों से भिन्न थे, इस वजह से चकमाओं के प्रतिनिधि चारू बिकेश चकमा और मनबेन्द्र नारायण लर्मा जैसे नेताओ ने इस प्रारूप का जमकर विरोध किया.

इस मसले पर मनबेन्द्र नारायण लर्मा की अगुवाई में जब बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर्रहमान से बात की गई तो उन्होंने कुछ भी मानने से इनकार करते हुए बंगाली पहचान अपनाने की हिदायत दे दी. साथ ही उन्होंने बंगालियों को जबरन चटगांव हिल ट्रैक्ट्स पर बसाने की धमकी भी दी, जिससे कि वहां रह रहे बंगालियों को लघुमति से बहुमति में तब्दील किया जा सके.

मसलन हिल ट्रैक्ट्स की स्वदेशी जनजातियों की जातीय पहचान और अधिकारों की लड़ाई के लिए 1973 में पार्वत्य चट्टग्राम जन संघती समिति नामक राजनैतिक दल का गठन हुआ. साथ ही इसकी सैन्य शाखा शांति बाहिनी ने भी जमीनी स्तर पर आकार लिया. शांति बाहिनी का इस्तेमाल सरकारी बलों और हिल ट्रैक्ट्स में बसने वाले बंगालीओ से लड़ने के लिए किया जाता था.

80 के दशक में बांग्लादेश सरकार ने हजारों भूमिहीन बंगालीयों को आधिकारिक तौर पर चटगांव हिल ट्रैक्ट्स पर बसाना शुरू किया. इसके साथ ही बांग्लादेश की सरकार और शांति बाहिनी का घर्षण अपने चरम पर पहुँच गया.

1980 में, बांग्लादेशी सशस्त्र बलों ने हिल ट्रैक्ट्स के कच्छली गांव पर हमला किया जिसमे 300 लोगों की मौत हो गई. इसी साल 3 मार्च के रोज, बांग्लादेशी सशस्त्र बलों ने 4000 जुम्माओ को मौत के घाट उतार दिया.

इस नरसंहार के जवाब में, 23 जून 1981 के रोज शांति बाहिनी ने 13 बंगालियों और 24 बांग्लादेश राइफल के जवानो को मार गिराया.

एक रिपोर्ट के अनुसार, 1981 से 1994 के दौरान 2500 जुम्मा महिलाओं का बांग्लादेश की सेना द्वारा बलात्कार किया गया.

आखिर, 15 वर्षो के आर्मी-राज के बाद 1990 में बांग्लादेश में दुबारा लोकशाही बहाल हुई. 1991 में तत्कालीन बांग्लादेशी प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया की ओर से चटगांव हिल ट्रैक्ट्स के जनजातीय समूहों के साथ शांति वार्ता की शुरुआत हुई.

1996 में बांग्लादेश की नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा चकमाओं के साथ-साथ जुम्माओ को जनजाति का दर्जा दिया गया. साथ ही इन समुदायों को विशेषाधिकार भी दिए गए. इसके साथ ही जुम्माओ और बांग्लादेश की सरकार के बीच चल रहे गृह युद्ध का 2 दिसंबर 1997 के रोज अंत हुआ जिसमे बांग्लादेशी सरकार और पार्वत्य चट्टग्राम जन संघती समिति के बीच शांति संधि पर हस्ताक्षर किए गए.

भारत में चकमाओं की स्थिति

1997 की संधि के बावजूद विस्थापित चकमा बांग्लादेश में उत्पीड़न के डर से भारत में ही बने रहना चाहते हैं. वे आज भी भारत में एक शरणार्थी के तौर पर रह रहें हैं. भारत की नागरिकता के मसले पर स्थानीय लोग इसका विरोध भी कर रहें हैं.

2005 में चुनाव आयोग ने चकमा और हजोंग शरणार्थियों को अरुणाचल प्रदेश की मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया था.

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने चकमा और हाजोंग शरणार्थियों की नागरिकता के मामले में सुनवाई करते हुए सरकार से कहा था कि तीन महीने के भीतर चकमा और हाजोंग शरणार्थियों को नागरिकता दे दी जाए लेकिन सरकार ने इसके खिलाफ अपील की थी. राज्य सरकार की दलील थी कि इससे प्रदेश की जनसांख्यिकी बिगड़ जाएंगी. कई मूल आदिवासी जनजातियां अपने ही यहां अल्पसंख्यक बन जाएंगी. इससे उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की एक न सुनी.

अंत में राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा यह तय किया गया है कि चकमा और हाजोंग शरणार्थियों को नागरिकता तो दे दी जाएगी लेकिन उनके अधिकार सीमित होंगे. उन्हें अरुणाचल की मूल जनजातियों के बराबर अधिकार नहीं मिलेंगे. उन्हें जमीन पर मालिकाना हक भी नहीं मिलेगा. इनर लाइन परमिट मिल सकता है. जिससे उन्हें नौकरी और यात्रा में सुविधा मिलेगी.

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