एक जमाना था जब नेताओं के उपनाम महात्मा, लोकमान्य, गुरुदेव, आजाद या नेताजी जैसे होते थे। राजनीति करने वाले सामान्य व्यक्ति में भी चरित्र शुचिता और वाणी की पवित्रता पहली जरूरत थी। कोई अपने पक्ष या सामने खड़े विपक्षी को हल्के शब्दों से संबोधित कर ही नहीं सकता था। अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार तक यह परंपरा लगभग चलती रही। हालांकि इससे पहले छुटपुट घटनाएं हुई पर वे राजनैतिक शुद्धता की रस्म को बिगाड़ने का साहस नहीं जुटा पाई। यह अप्रिय सत्य है कि डॉ. मनमोहन सिंह के जमाने से विपक्षी हमलों ने माहौल खराब किया।

एक शताब्दी पहले हिंदी नवजागरण के अग्रदूत विद्वान महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने सितंबर, 1917 में लिखे एक आलेख ’आदरपात्रों के नाम का निरादर’ में लिखा था कि किसी व्यक्ति के नाम का निरादर करना भारतीय परंपरा का विरोध करना है। आज के राजनैतिक माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी समेत तमाम राजनेताओं के नाम सरेआम बनाए, बिगाड़े और बदले जा रहे हैं ताकि लोग उन नामों से उनका मजाक और उनकी पार्टी का मखौल उड़ा सके। सोशल मीडिया पर ये नाम सार्वजनिक हैं। अब तो प्रिंट मीडिया ने भी प्रकारांतर से ये नाम छापने शुरू कर दिए हैं। राष्ट्रीय नेताओं के साथ ही क्षेत्रीय नेताओं के नाम तक बड़े घृणास्पद एवं मजाकिया हैं। जबकि संस्कृत भाषा में लिखे पुरातन पुराणों तथा स्मृतियों में लिखा है कि जो लोग आदरणीय जनों के नाम का निरादर करते हैं, समाज की दृष्टि में वे स्वयं ही निरादर पात्र हो जाते हैं। ऐसों की संगति से दूर रहने तथा उनके पास न बैठने तक की आज्ञा है।

सभ्यता और सुशिक्षा का यह भी एक लक्षण है कि सभ्य और शिक्षित जन औरों की तो बात ही नहीं, अपने विपक्षियों का भी अकारण निरादर नहीं करते बल्कि उनका नाम भी सम्मानपूर्वक लेते हैं। खेद की बात है, राजनीतिक मूल्यों के क्षरण के दौर में अनेक नेता और पार्टी कार्यकर्ता इस प्रकार के उच्च आदर्शों वाले शास्त्राचार और लोकाचार, दोनों का जमकर उल्लंघन कर रहे हैं। इनमें अनेक राजनैतिक लोग तो ऐसे हैं जो भारत की पुरानी शिक्षा, सभ्यता और विद्या के प्रबल पक्षपाती ही नहीं बल्कि उनमें अंधविश्वास रखने वाले हैं। जिन ग्रंथों में दूसरों का आदर करने की आज्ञा है, उन शास्त्रों के वचनों का ये सदा पिष्टपेषण सार्वजनिक रूप से करते रहते हैं। संस्कृति और संस्कारों की बातें उनके हर भाषण में होती है। पर स्थिति एकदम उलट है। ऐसे लोग नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का नाम सुनते ही अपने सारे संस्कृति प्रेम को भूल जाते हैं। उनमें कोई मोदी को ’फेंकू’ कह रहा है तो कोई राहुल गांधी को ’पप्पू’ या ’छोटा भीम’। ठीक ऐसे ही, पिछले दिनों सोशल मीडिया पर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को कोई कुछ कह रहा था तो कोई कुछ। हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि गुजरात चुनाव के दौरान केंद्रीय चुनाव आयोग को भाजपा को यह हिदायत देनी पड़ी कि वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए ‘पप्पू’ या अन्य किसी भी मजाकिया शब्द का इस्तेमाल न करे।

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वह भी एक जमाना था जब नेताओं के उपनाम महात्मा, लोकमान्य, गुरुदेव, आजाद या नेताजी जैसे होते थे। राजनीति करने वाले सामान्य व्यक्ति में भी चरित्र शुचिता और वाणी की पवित्रता पहली जरूरत थी। कोई अपने पक्ष या सामने खड़े विपक्षी को हल्के शब्दों से संबोधित कर ही नहीं सकता था। अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार तक यह परंपरा लगभग चलती रही। हालांकि इससे पहले छुटपुट घटनाएं हुई पर वे राजनैतिक शुद्धता की रस्म को बिगाड़ने का साहस नहीं जुटा पाई। यह अप्रिय सत्य है कि डॉ. मनमोहन सिंह के जमाने से विपक्षी हमलों ने माहौल खराब किया। प्रधानमंत्री का नाम मनमोहन सिंह से बिगाड़कर ’मौनमोहन सिंह’ हुआ। यह राजनीति में भाषाई विद्रूपता की शुरूआत का काल था। यह आक्रामक प्रतिरोध के परिणाम का शब्द था। हिमाचल प्रदेश में अक्टूबर, 2012 में एक चुनावी रैली में नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल किया। तब से यह परंपरा चली, जिसके दुष्परिणाम अब हमारे सामने हैं। जवाब में कांग्रेस ने भी मोदी के लिए ऐसे शब्द खोजे और उनका सार्वजनिक उपयोग किया। दुर्भावनाओं की इस राजनीति के बदलते परिप्रेक्ष्य में संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान की तारीफ की जानी चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की बात का समर्थन नहीं करता। पक्ष और विपक्ष हमारी मजबूत इकाईयां हैं, जो हमेशा बनी रहनी चाहिए।’

राजनीतिज्ञों तथा आम लोगों द्वारा प्रयुक्त ऐसे हल्के नामों से घृणा का भाव टपकता है। जबकि मोदी और राहुल ने घृणा का कोई काम नहीं किया है। यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो देश की अदालतें उन पर कार्यवाही कर रही होती। मान लीजिए, यदि उन्होंने किसी की दृष्टि में वैसा काम किया है तो भी जो लोग उनके लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं वे अपनी अंतरात्मा से पूछें कि क्या उन्होंने कभी कोई नासमझी भरा ’असत्य’ बोला ही नहीं? यदि बोला है तो फिर क्या वैसे ही शब्दों का प्रयोग उनके विषय में किए जाने पर उनके मन में क्षोभ उत्पन्न होगा या नहीं? क्षण भर के लिए मान लीजिए कि मोदी और राहुल के मुंह से कोई गलत तथ्य निकल भी गया तो क्या उन्होंने कितनी ही समुचित बातें नहीं कही? क्या वे देश को आगे ले जाने में खास भूमिका नहीं निभा रहे हैं? क्या उन्होंने देशवासियों के हित की कामना से अनेक शारीरिक, मानसिक और सांपत्तिक कष्ट नहीं उठाए हैं या अभी भी नहीं उठा रहे हैं? ऐसे लोगों के लिए हल्के शब्दों का प्रयोग क्या देश के लोकतंत्र को वाग्शुचिता की ओर ले जा रहा है? यदि हम माननीय और आदरणीय जैसे सम्मानित शब्दों का प्रयोग उनके लिए नहीं कर सकते हैं तो भी हम कम से कम उनके सही नाम का प्रयोग करके धर्म और न्याय निष्ठा को तो अक्षुण्ण रख ही सकते हैं। संसार का कोई भी देश शायद ऐसा न होगा जहां के अनेकानेक विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षक, धनिक तथा प्रभुतासंपन्न लोग प्रमुख राजनेताओं के आगे मस्तक न झुकाते हों। ऐसी स्थिति में देश के प्रधानमंत्री और प्रमुख विपक्षी नेता का नाम बिगाड़ना स्वयं को घृणास्पद बनाना है। सदाचार के नियमों को इस प्रकार नष्ट करना श्रेष्ठ मानव का काम नहीं है।

कुछ लोग कांग्रेस को ’मुसलमानी पार्टी’ और भाजपा को ’हिंदू पार्टी’ का प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। फेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सएप जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर यह आम बात है। अब तो लोग इन्हें गंभीरता से भी नहीं लेते कि कोई किसी देशव्यापी राजनैतिक पार्टी पर ऐसे सांप्रदायिक आरोप कैसे लगा रहा है। सोशल मीडिया पर पार्टियां धर्मों और जातियों में बंटी है। सोशल मीडिया पर लोग कांगेस को ’खांग्रेस’ कहते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ’खुजलीवाल’। उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को ’मुल्लायम’। ऐसे नाम रखने और इन नामों को चलाने वाले ये नहीं सोचते कि ऐसा करके वे भले ही मानसिक संतोष का लाभ उठा लें पर इससे देश की राजनीति को वे किधर बढ़ा रहे हैं? वे यह क्यों नहीं सोचते कि इस प्रकार की राजनीति में पूरे देश का समावेश है। क्या देश की विपक्षी पार्टी कांग्रेस में कोई सम्मान पात्र नहीं बचा है? क्या भारत के उद्धार की चर्चा बिना कांग्रेस के कोई कर सकता है? आज यदि भाजपा सरकार में और कांग्रेस विपक्ष में है तो क्या यह लोकतंत्र की मजबूती का उत्कृष्ट उदाहरण नहीं है? जो लोग कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तुच्छ शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए उनका देश में भरपूर आदर है। प्रधानमंत्री मोदी का कोई भाषण राहुल गांधी के बिना पूरा नहीं होता। ठीक ऐसे ही, राहुल गांधी की भी कोई सभा मोदी के बिना नाम पूरी नहीं होती। यह लोकतंत्र का चमत्कार है। हमें इससे अपनी मान-मर्यादा का हिसाब लगाना चाहिए। हमारा व्यवहार मर्यादित होना चाहिए। जिन्हें लोग अपना नेता तथा राष्ट्रचिंतक मानते हैं, उनका आदर होना चाहिए। तभी राजनीति में जनता का भी आदर बढ़ेगा। वरना राष्ट्रीय नेताओं के लिए हल्के शब्द बोलने से हम आदरणीय तो नहीं, उपहास के पात्र जरूर बनते रहेंगे।

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लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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