“वीरता जब भागती है तो उसके पैंरो से राजनीति के छलछंद की धूलि उड़ती है!” ये दार्शनिक विचार मेरे नहीं हैं. ऐसा कहना है उत्तर–प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का. उन्होंने अपने वेबसाइट पर लिखे एक लेख जिसका शीर्षक है, ‘सावधान! – यह इस्लामी आतंकवाद है’ की शुरुआत इसी दार्शनिक वाक्य से की है. लेखनी को बौद्धिक चमक देने के लिए अलंकृत भाषा का उपयोग होता रहा है, अतः इसमें किसी प्रकार की कोई बुराई नहीं है. इसे बुराई तब कही जायेगी जब आप अपनी बौद्धिकता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से किसी अन्य रचनाकार के उक्तियों को अपनी लेखनी में बिना वास्तविक सन्दर्भ दिए प्रस्तुत करें, वह भी इस प्रकार से मानो वो उक्ति आपकी हो.
जी हाँ! योगी आदित्यनाथ ने तो अपने इस लेख में कहीं भी यह नहीं बताया है कि यह दार्शनिक वाक्य उनका अपना है अथवा किसी अन्य रचनाकार का, परन्तु मैं अवश्य बताऊंगा. यद्यपि जब आप यह लेख पढेंगे तो उपरोक्त उक्ति के प्रस्तुति के अंदाज़ से आपको बहुत आसानी से यह प्रतीत हो जाएगा कि यह उक्ति योगी जी की स्वयं की अभिव्यक्ति है. हालांकि, वास्तविकता यह नहीं है.
यह उक्ति महान रचनाकार जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक का अंश है. इसी नाटक में मंदाकिनी नामक पात्र का यह कथन है कि, ‘भयानक समस्या है. मूर्खों ने स्वार्थ के लिए साम्राज्य के गौरव का सर्वनाश करने का निश्चय कर लिया है. सच है, वीरता जब भागती है, तब उसके पैरों से राजनीतिक छलछन्द की धूल उड़ती है.’ कितना अच्छा होता यदि योगी जी यह लेख पहले के बजाये आज लिख रहे होते, और इसकी शुरुआत एक वाक्य के बजाये मंदाकिनी के सम्पूर्ण कथन से किये होते. कितना प्रासंगिक होता यह, जरा सोचिये. उन्नाव की अबला को कुछ तो संतोष होता मुख्यमंत्री के द्वारा अपनी असहाय दशा एवं सत्य के स्वीकारोक्ति पर?
इसी लेख की अगली पंक्तियों में योगी जी लिखते हैं, ‘क्या यह सच नहीं है कि इस राष्ट्र का कायर नेतृत्व एवं समाज अपने ही राष्ट्रपरिवार की लाशों की अनदेखी कर रहा है?’ उनके लिखने का सन्दर्भ भले ही भिन्न रहा हो पर बावजूद इसके यदि इस स्वलिखित पंक्ति को योगी जी आज दोबारा पढ़ लिए होते, तो उनके मन–मष्तिष्क–ह्रदय पर कलुषित राजनीतिक स्वार्थ की मलीन मगर मोटी परत का थोड़े देर के लिये हटने की संभावना पैदा हो सकती थी. इतना ही नहीं आगे की पंक्तियों में योगी जी लिखते हैं, ‘रोज–रोज के हिन्दू हत्याकांड पर निर्दोष हिन्दुओं के आंसू हमें विचलित नहीं करते, एक–एक उजड़ते घर, एक–एक सिंदूर पोंछती मांग, सूनी होती माँ की गोद हम देखते हैं और चुप रहते हैं, यह कैसी कायरता है?’ मैं पूछना चाहता हूँ योगी जी से कि दूसरों से पूछने के बजाये अब वह बताएं कि वह किस कायरता के दौर से गुजर रहे हैं? क्या उन्नाव बलात्कार पीड़िता के पिता हिन्दू नहीं थे? क्या उनकी पत्नी की मांग सूनी नहीं हो गयी? क्या उनके बच्चे अनाथ नहीं हुए? क्या इनके आंसू योगी जी को बिलकुल भी विचलित नही करते? क्या योगी जी मात्र तभी विचलित होते हैं जब कोई हिन्दू किसी मुसलमान के हाथों मारा जाए? क्या योगी जी अपने तथाकथित वीरत्व को सिर्फ ऐसे ही घटनाओं पर राजनीति करने के लिए सुरक्षित रखे रहते हैं? यह कैसी विडम्बना है? क्या यह अव्वल दर्जे की कायरता और राजनीतिक अवसरवादिता नहीं है जिसके पीठ पर चढ़कर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं?
मैं सोच रहा था कि क्या मुख्यमंत्री अपने इन स्वलिखित पंक्तियों को आज के सन्दर्भ में दोबारा पढने का नैतिक साहस जुटा पायेंगे? यदि वह ऐसा कर भी पाते तो क्या उन्हें घृणा नहीं होगी स्वयं के कलम एवं कायरत्व पर? अपने अतीत की लेखनी के दर्पण में क्या वह अपने वर्तमान चेहरे का प्रतिबिम्ब देख पायेंगे? मुझे संशय है. दुसरे रचनाकारों से चुराई गयी अलंकृत भाषा में प्रवचन देना एक बात है, और उसपर अमल करने का ह्रदय में नैतिक साहस संजोये रखना बिलकुल दूसरी बात.
अब आइये थोड़ी संक्षिप्त चर्चा करते हैं ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक के कथानक के ऊपर जिसके पंक्ति को योगी जी ने बिना किसी सन्दर्भ के अपने लेख में उद्धृत किया है. यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि योगी जी जिस नाटक के पंक्ति को हिन्दू–मुसलमान समस्या सुलझाने के लिए उद्धृत करते हैं, उसकी पृष्ठभूमि समाज में नारियों की दयनीय स्थिति एवं उनके दासता की बेड़ियों से मुक्ति के प्रश्न को सुलझाने का गहरा प्रयास करता है. यदि योगी जी इस पंक्ति को इस नाटक की मूल आत्मा को समझने के पश्चात उद्धृत करते, तो अबतक उन्नाव की बलात्कार पीड़िता को न्याय मिल चुका होता.
‘ध्रुवस्वामिनी’ गुप्तवंश काल पर आधारित एक तथ्यपरक ऐतिहासिक नाटक है, यद्दपि नाटककार जयशंकर प्रसाद ने इसमें अपनी कल्पना का सहारा भी लिया है. इसकी कथावस्तु यह है कि सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने ज्येष्ठ पुत्र रामगुप्त को राज्याधिकार नहीं सौंपा क्योंकि वह अयोग्य एवं चारित्रिक रूप से दुर्बल था. उन्होंने अपने पराक्रमी एवं कनिष्ठ पुत्र चन्द्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया. परन्तु समुद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात प्रपंची अमात्य शिखर स्वामी ने इस सिद्धांत की आड़ में कि ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का प्रथम उत्तराधिकारी होता है, रामगुप्त को सिंहासन पर बैठा दिया. राजा बनने के पश्चात धूर्त रामगुप्त ने चन्द्रगुप्त की वाग्दत्ता ध्रुवस्वामिनी अथवा ध्रुवदेवी का अपहरण करके बलपूर्वक उसके साथ शादी कर लिया. चन्द्रगुप्त शीलता की प्रतिमूर्ति थे, अतः उन्हें राज्य और वाग्दत्ता पत्नी दोनों से हाथ धोना पड़ा. ध्रुवस्वामिनी के साथ बलपूर्वक विवाह के पश्चात भी रामगुप्त ने उसे सिर्फ और सिर्फ अपमान ही दिया. इस शादी के पश्चात भी वह अपने चारित्रिक दुर्बलता से ऊपर नही उठ पाया. इस नाटक के कथानक का मूल–बिंदु यही है. विस्तार में जानने के लिए आप पूरा नाटक पढ़ सकते हैं.
मैंने इस नाटक का संक्षिप्त परिचय यहाँ इसलिए दिया क्योंकि यह योगी जी के लिए आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है, जिसकी पंक्तियों को उन्होंने हिन्दू–मुस्लिम समस्या सुलझाने के लिए उद्धृत किया है, बिलकुल नाटक की मूलभावना से अलग हटकर. उन्हें आज इसकी मूलभावना को समझने की नितांत आवश्यकता है. आइये मैं इस नाटक से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करता हूँ, जो योगी जी के लिए आज के समय में बेहद ही प्रासंगिक हो चला है. बेहतर रहता, ‘वीरता जब भागती है..’ वाली पंक्ति के बजाये वह ध्रुवस्वामिनी नाटक के निम्न दो उक्तियों को अपने लेख में उद्धृत किये होते:
- नाटक की मुख्य पात्र ध्रुवस्वामिनी एक अन्य पात्र पुरोहित से (क्रोध में): संसार मिथ्या है या नहीं, यह तो मैं नहीं जानती, परन्तु आप, आपका कर्मकांड आपके शास्त्र क्या सत्य हैं, जो सदैव रक्षणीया स्त्री की यह दुर्दशा हो रही है?
- नाटक की एक पात्र मन्दाकिनी के मुख से: आप बोलते क्यों नही? आप धर्म के नियामक हैं. जिन स्त्रियों को धर्म–बंधन में बांधकर, उनकी समत्ति के बिना आप उनका सब अधिकार छीन लेते हैं, तब क्या धर्म के पास कोई प्रतीकार, कोई संरक्षण नही रख छोड़ते, जिससे वे स्त्रियाँ अपनी आपत्ति में अवलम्ब मांग सकें?
मंदाकिनी के मुख से निकली यह पंक्ति कितनी प्रासंगिक है न? ऐसा लग रहा है जैसे उन्नाव की बलात्कार पीड़िता स्वयं योगी जी से सीधे प्रश्न कर रही हो, क्योंकि धर्म के नियामक तो वही हैं.
यह कटु सत्य है कि योगी जी की वीरता भाग रही है और उसके पैरों से राजनीतिक छलछंद की धूल उड़ रही है. वह चाहें तो इस भागती हुई वीरता को अभी भी कैद कर सकते हैं. देर अवश्य हो चुकी है, पर संभावना है, समय है अपनी भागती हुई वीरता को वापस लौटाने का, वीरता और विश्वास को बहाल करने का. निर्णय उन्हें ही करना है कि इतिहास के पन्नों में योगी आदित्यनाथ किस रंग में दर्ज होना चाहते हैं?
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