एक लेखक जो संत-साहित्य का मजबूत सबूत भी है


परशुराम चतुर्वेदी

संत-साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की 125वीं जयंती

आचार्य परशुराम चतुर्वेदी को जिस काम के लिए सदा याद रखा जाएगा, वह है उनका ग्रंथ – उत्तरी भारत की संत-परंपरा. यह ग्रंथ 1951 में प्रकाशित हुआ. इसमें आचार्य ने सनातन संप्रदाय के संतों के साथ ही सूफियों, सगुण एवं निर्गुण भक्ति धारा के उपासकों, नाथ पंथियों तथा जंगम-जोगड़ों के संप्रदाय वाले संतों को भी स्थान दिया. संत साधना के प्रारंभिक विकास, महात्मा कबीर के जमाने के साथ ही उनसे पूर्ववर्ती संतों तथा अनेक साधु पंथ-उपपंथों के निर्माण पर गहनता से लिखा. ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’ में आचार्य चतुर्वेदी ने आखिरी संत महात्मा गांधी को माना था.

आज ही के दिन 125 बरस पहले जन्मे एक व्यक्ति ने मनुष्य की चिंतन परंपरा की खोज में संत साहित्य का गहन अध्ययन किया. संत साहित्य संबंधी विचार में जिसकी रुचि है उसे एक पुस्तक पढऩी पड़ती है. इस पुस्तक से संतों की अमर परंपरा पर सही विचार विकसित करने में भरपूर मदद मिलती है. संत साधना की धारा के संबंध जो भ्रम हो सकते हैं, उन्हें इस पुस्तक से ही दूर किया जा सकता है. पुस्तक का नाम है- उत्तरी भारत की संत परंपरा.

पुस्तक में संत साहित्य के प्रमुख तत्वों की चर्चा है। संतों की वैचारिक विविधिता में ईश्वर के अद्वैत तत्त्व होने के सूत्र हैं. पुस्तक संतों के सर्वभौमीकरण की राह खोलती है, जिसमें गजब की सकारात्मकता है. कहीं-कहीं सुझाव भी दिए गए हैं. वे कितने उपयोगी हैं, इसका निर्णय पाठकों पर छोड़ा गया है. जैसे सकाम व्यक्ति में तृष्णा होती है. निष्काम में तृप्ति का सुख होता है. अपने अस्तित्व से जुडऩे का एक मार्ग साधना है. जिस तरह एक वृक्ष पृथ्वी से अपनी बहुत सी जड़ों से जुड़ा होता है उसी तरह मनुष्य के लिए भी अस्तित्व से जुडऩे के लिए कई माध्यम हैं. ये माध्यम संतों की नाना भांति की परंपराएं हैं.

Acharya Parshuram Chaturvedi
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी

‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’ के लेखक परशुराम चतुर्वेदी 25 जुलाई, 1894 को बलिया के जवहीं गांव में जन्में और वहीं पले-बढ़े. वे संत-परंपरा और संत-मत के सबसे अधिकृत और स्वीकृत विद्वान हैं. वे हिंदी साहित्य की आचार्य परंपरा में गिने जाने वाले मूर्धन्य साहित्यकारों में हैं. निर्गुण और सगुण, दोनों धाराओं में उन्हें उत्कट रुचि थी. फिर भी कबीर का सधुक्कड़ी साहित्य उनके अध्ययन का खास हिस्सा बना. स्वामी रामानंद के 12 शिष्यों में एक कबीर की खोज ने उन्हें कबीर के समकालीन तथा पूर्ववर्ती संतों द्वारा रचित साहित्य के विशद अध्ययन हेतु प्रेरित किया. उस समय की प्रसिद्ध पत्रिका ‘हिंदुस्तानी’ के अक्टूबर, 1931 के अंक में उन्होंने ‘संत-साहित्य’ शीर्षक से एक निबंध लिखा. यही लेख कालांतर में संत-परंपरा के उनके अध्ययन का आधार बना. तीन वर्ष बाद यानी 1934 में इसी पत्रिका में मलिक मुहम्मद जायसी के प्रेमाख्यानों पर उनका एक और लेख ‘जायसी और प्रेमतत्त्व’ छपा.

वर्ष 1941 में आचार्य चतुर्वेदी ने मीरां के पदों का एक संकलन तैयार किया, जिसे हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने ‘मीरांबाई की पदावली’ शीर्षक से छापा. इस संकलन में चतुर्वेदीजी ने न सिर्फ मीरां की प्रामाणिक जीवनी लिखी, बल्कि मीरां की साहित्यिक साधना के महत्त्व को बखूबी रेखांकित किया. 1950 में चतुर्वेदी ने ‘सूफी-काव्य-संग्रह’ संपादित किया, जो हिंदी साहित्य सम्मेलन से छपा. इसके संपादन में आचार्य ने सूफियों का इतिहास और स्वरूप तो लिखा ही भारत में सूफीमत के फैलाव के साथ ही उनका साहित्य, प्रेमगाथा काव्य और उसमें निहित रहस्यवाद की विस्तार से लंबी चर्चा की.

आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का इतना विस्तृत काम होते हुए भी उन्हें जिस के लिए सदा याद रखा जाएगा, वह है उनका ग्रंथ-उत्तरी भारत की संत-परंपरा. यह ग्रंथ 1951 में प्रकाशित हुआ. इस अनुसंधानात्मक ग्रंथ में आचार्य ने सनातन संप्रदाय के संतों के साथ ही सूफियों, सगुण एवं निर्गुण भक्ति धारा के उपासकों, नाथ पंथियों तथा जंगम-जोगड़ों के संप्रदाय वाले संतों को भी स्थान दिया. संत साधना के प्रारंभिक विकास, महात्मा कबीर के जमाने के साथ ही उनसे पूर्ववर्ती संतों तथा अनेक साधु पंथ-उपपंथों के निर्माण पर गहनता से लिखा. ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’ में आचार्य चतुर्वेदी ने आखिरी संत महात्मा गांधी को माना था.

परशुराम चतुर्वेदी के लेखों का एक संग्रह 1951 में बनारस से छपा, जिसका शीर्षक था ‘नव-निबंध’ यानी नई खोज से लिखे गए निबंध. ये लेख वे थे, जो आचार्य ने कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखे थे. इन लेखों के विषयों में विविधता थी, जो उनके शोध पर आधारित थे. मिथिला के कवि विद्यापति, सूफी शेख और आलम, जयपुर के महाकवि बिहारी के अलावा देव, घनानंद, बोधा, ठाकुर, भारतेंदु काल की हिंदी कविता में जातीयता जैसे विभिन्न विषयों के लेख इस संग्रह में शामिल थे.

आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने ‘संत काव्य-धारा’ नाम से एक पुस्तक छापी, जो 1952 में आई. यह संतों की रचनाओं का संकलन था, जिसमें संत-कवि जयदेव से लेकर स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक संत-कवियों की रचनाएं संकलित की गई थी. संग्रह की शुरूआत में आचार्य लिखते हैं कि ये संत कवि आत्मचिंतन एवं स्वानुभूति के आधार पर अपनी रचनाएं निर्मित करते गए. संत साहित्य के विद्वान सुखदेव सिंह के हिसाब से आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का काम पीढिय़ों के लिए वरदान है, जो उसे सदा प्रकाश देता रहेगा.

1969 में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की बौद्ध मत के सिद्धों द्वारा की गई रचनाओं पर लिखी एक पुस्तक आई-बौद्ध सिद्धों के चर्यापद. इस पुस्तक में चर्यापद के रचनाकारों, उनके दार्शनिक चिंतन और इन रचनाओं पर समाज-संस्कृति के प्रभाव पर गहरा शोध किया. वर्ष 1979 में इस अप्रतिम विद्वान का निधन हो गया.

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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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