योग शारीरिक लाभ के लिए शरीर को हिलाने-ढुलाने की प्रक्रिया नहीं है. यह वैदिक परंपरा से उपजा अनूठा ज्ञान है, जिसका परिणाम मोक्ष है. अब योग के बहाने ‘दुकानें’ खुल रही हैं. ऐसे में लोग कैसे विश्वास करें कि योग से मोक्ष भी मिल सकता है? योग आसन और प्राणायाम तक सीमित हो गया है. इससे भी बढ़कर योग दिवस पर बाजार का विज्ञापनवाद हावी है.

योग दिवस जब भी आता है, एक अजीब-सा वातावरण बन जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री योग के नाम पर ‘व्यायाम’ करते देखे जाते हैं. पार्कों और मैदानों में हाथ-पैरों को मोडऩा-झुकाना और तन-बदन को हिलाना शुरू हो जाता है. जगह-जगह योगाचार्य ऊंचे आसन पर बैठकर लोगों को योग करना सिखाते हैं. ॐ का उच्चारण करते हुए लोग व्यायाम कर रहे हैं, जो उनके हिसाब से योग है. पर हकीकत में यह योग नहीं बल्कि योग के नाम पर कुछ और है, जिसे व्यायाम या शारीरिक अभ्यास कहा जा सकता है. जबकि योग शारीरिक या मानसिक लाभ के लिए शरीर को हिलाने-ढुलाने की प्रक्रिया भर नहीं है. यह वैदिक परंपरा से उपजा अनूठा ज्ञान है. जिसका परिणाम मोक्ष है. यह ‘स्व-शासन’ का विज्ञान है. अद्भुत कला है जो स्वयं को जगाने का रास्ता दिखाती है. योग का अभ्यास मनुष्य के व्यक्तित्व को सुंदरता प्रदान करता है, उसे उन्नत बनाता है तथा आध्यात्मिक आभा फैलाता है. योग बाहर से भीतर की यात्रा है. पर यह भी विडंबना है कि आज जो योग प्रचारक के रूप में प्रचलित हैं, उनके लक्ष्य के केंद्र में मोक्ष की बजाय धन और प्रतिष्ठा है. अधिकतर योगाचार्यों के लिए पूंजी ‘ब्रह्म’ और मुनाफा ही ‘मोक्ष’ है. योग के बहाने आश्रमों के रूप में दुकानें खुल रही हैं. ऐसे में लोग कैसे विश्वास करें कि योग शास्त्र से मोक्ष भी प्राप्त हो सकता है? योग आसन और प्राणायाम तक सीमित हो गया है. इसका यह दुष्परिणाम सामने आया है कि जिसे देखो, वही ‘योग’ कर रहा है और उसकी अपने हिसाब से व्याख्या कर रहा है. यह कष्टप्रद आश्चर्य है कि योग केवल रोग निवारण का साधन बना दिया गया है. योग का उपयोग भोग करने की क्षमता को बढ़ाने के लिए हो रहा है. यह योग शास्त्र का अत्यंत गौण फल है. केवल रोग निवारण के लिए प्रयासरत होने से योग से सच्चा सुख नहीं मिल सकता. यह संभव हो सकता है कि योगासनों से रोग निवारण हो जाए, पर यह योग का अंतिम परिणाम नहीं है. उसका पूरा सत्य नहीं है. श्रीकृष्ण की अर्जुन को सुनाई गीता भी योग शास्त्र कहलाती है. गीता कहती है, ‘अयमेव परो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्’ अर्थात् योग की सहायता से आत्मदर्शन कर लेना परम धर्म है. केवल कमर और घुटने का दर्द कम करने की विधि को योग कहना उसकी निरर्थक तथा अशास्त्रीय व्याख्या है. ऐसे में जरूरत है महर्षि पतंजलि के योग विज्ञान का पूरा लाभ समाज को मिले.

जब कभी यह सवाल उठता है कि भारत ने आधुनिक संसार को क्या दिया तो लोग तपाक से जवाब देते हैं-योग. योग भारत की पुरातन संस्कृति की देन है. योग संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है-जुडऩा. भीतर की शक्ति से जुडऩा. मन और बुद्धि के बहाने आत्मा को चिन्मय-सत्ता से जोडऩा. शक्ति और संसाधनों को जोडऩे से ही जीवन में उत्कर्ष की प्राप्ति होती है. हर किसी का प्रयास है कि वह श्रेष्ठ परिणाम से जुड़े. श्रेष्ठ लोगों से जुड़े. श्रेष्ठ समाज से जुड़े. श्रेष्ठ कर्म-ज्ञान से जुड़े तथा श्रेष्ठ साधनों से जुड़े. जुडऩे से ही सार्थक स्वरूप की प्राप्ति होती है. जुड़ाव का सबसे बड़ा योग शास्त्र ऋषियों से प्रवर्तित अनादि परंपरा है. इसका इतिहास किसी से पूछने की जरूरत नहीं है. योग सनातन है, उसी तरह जैसे सनातन धर्म है. भला कौन जानता है कि सनातन धर्म कब से है! योग किसी अपरिपक्व तथा अज्ञानी दिमाग की उपज नहीं है. ऋषियों ने इसका अपने जीवन में प्रयोग कर बाद में विश्व कल्याण की व्यापक भावना से संसार में उतारा. पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे योग शास्त्र को महर्षि पतंजलि ने अपने व्यापक चिंतन से निकाला. उन्होंने चार भागों में बंटे ‘योग सूत्र’ ग्रंथ में उसे सूत्रात्मक रूप से पहले-पहल परिभाषित किया. योग शास्त्र आस्तिक दर्शन की छह विधाओं में दूसरे स्थान पर है. महर्षि कपिल के सांख्य दर्शन को इससे भी पुरातन माना जाता है. न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत दर्शन इसके बाद के हैं.

दर्शन शास्त्र के इतिहासकार पतंजलि को तीन हजार साल पुराना मानते हैं. पतंजलि के बाद भी अनेक विद्वानों ने योग शास्त्र पर अपनी कलम चलाई. पतंजलि के योगसूत्र पर व्यास मुनि ने ‘व्यास भाष्य’ लिखा. ‘हठप्रदीपिका’ और ‘घेरंड संहिता’ योग दर्शन के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं. योग परंपरा के विद्वान बताते हैं कि मानव इतिहास में ‘ऋग्वेद’ सबसे पुरातन ग्रंथ है. इसमें योग का भरपूर जिक्र है. अत: योग भी उतना ही पुराना है, जितना वैदिक साहित्य. इस मत के हिसाब से योग कई सहस्राब्दियों पुराना बैठता है. रामानंद संप्रदाय के प्रधान स्वामी रामनरेशाचार्य के अनुसार हरेक व्यक्ति चाहता है कि वह खुद को अधिक से अधिक फैला सके. अपनी सीमा, वैभव और प्रभाव का विस्तार कर सके. पर यह विस्तार वस्तुत: अज्ञान का है. ऐसा विचार जितना बढ़ेगा, संसार में उतनी ही अशांति बढ़ेगी. इसलिए यदि व्यक्ति को जीवन की पूर्णता प्राप्त करनी है तो उसे महर्षि पतंजलि के योग दर्शन से जुडऩा होगा.

योग व्यक्ति के लिए प्राणवायु की तरह जरूरी है. योग भारत या सनातन धर्म के लोगों के लिए ही नहीं बना है बल्कि यह ऐसी व्यवस्था एवं चिंतन प्रक्रिया है, जो सभी जाति, प्रांत, भाषा और धर्म के लोगों के लिए समान रूप से है. संसार की अनेक कठिनाइयों के मूल में मन की चंचलता है. चित्त का निग्रह कठिन है. मन सारे संकल्प-विकल्पों का केंद्र है. सारी इच्छाओं की जड़ मन ही है. जब इच्छाएं पूरी नहीं होती तो अवसाद होता है. चंचल चित्त के भटकाव का निरोध सिर्फ योग से संभव है. योग से चित्त-वृत्तियां निरुद्ध होगी तो समस्याएं समाप्त होगी. संपूर्ण जीवन जीने का आनंद मिलेगा. मन के भटकाव को रोकने के लिए पतंजलि ने योग शास्त्र में आठ साधन सुझाए हैं. ये यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं. वास्तव में इन अंगों से मिलकर योग बनता है. यह ‘अष्टांग योग’ कहलाता है. इस नाते योग समाधि है, आसन नहीं. योग मात्र व्यायाम नहीं बल्कि ‘स्व’ यानी आत्मा की स्वतंत्रता को जानने का जरिया है. मात्र आसन कर लेने भर से हमारी चित्त-वृत्तियां रुक नहीं सकती. महर्षि पतंजलि ने ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ सूत्र में योग की परिभाषा की है. जिसका अर्थ है, ‘चित्त की वृत्तियों को रोक लेना योग है.’ इस योग मेंं आसन करने से पहले यम और नियम को अपनाना होगा. आज के दौर में जिस योग का प्रचार है, वहां यह भूल है कि योग की प्रारंभिक जरूरतों, यम और नियम की उपेक्षा करके लोग सीधे ही आसन कर रहे हैं. हकीकत में यह योग-जिज्ञासुओं के साथ बड़ा धोखा है. योग की दार्शनिक शिक्षा के साथ छलावा है. समाज के साथ घातक प्रयोग है. जबकि यह जरूरी है कि समाज में योग के क्रमिक स्वरूप की स्थापना होनी चाहिए, विकृत स्वरूप की नहीं.

योग के पांच भाग हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य. योग साधना इन पांचों के साथ पूरी होती है. यदि इनमें से कोई एक भी छूट रहा है तो योग की संपूर्ण सिद्धि प्राप्त होने में दिक्कत होती है. अत: हमें इन पांचों को अपने जीवन में उतारना पड़ेगा तभी योग हमारे लिए संपूर्ण वरदायी होगा. जिस व्यक्ति को अपने जीवन को सही रीति से जीना है, उसे पतंजलि के योग का मार्ग का अनुसरण करना होगा. योग से भ्रम टूटेंगे और संसार में शांति स्थापित होगी.

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लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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