सियासत की सारी ताक़त तो कश्मीर में अलगाव के मुद्दे को ज़िंदा रखने में लग जाती है यहां के नागरिकों को रोजगार और घाटी के विकास के बारे में चिंतन करने को किसको फुर्सत है

चिनार जब आपको आमंत्रित करता है तो वह आपको ईरान नहीं बुलाएगा, क्योंकि उसका वंश ईरान से समाप्त हो चुका है। वह आपको कश्मीर की वादियों में आमंत्रित करेगा। सदियों पहले कश्मीर आए चिनार ने अब यहीं की आबो-हवा में अपना डेरा जमा लिया है। यूं मूल रूप से चिनार ईरान का वाशिंदा था। अपने अस्तित्व की हिफाजत के लिए जिस तरह अन्य सभ्यताओं से लोगों ने हिंदुस्तान में पनाह ली, फले, फूले और यहां का हिस्सा बने, उसी तरह सैकड़ो मीलों दूर ईरान से आकर चिनार कश्मीर की वादियों का सरताज, साक्षी और शोभा बन गया। उसकी कई पीढियां इन घाटियों की जड़ों में रच-बस गई हैं। वह भी कश्मीरीयत की पहचान बन गया है। प्राकृतिक रूप से देखें तो, वादियों की पहचान अब उसी से है। उसकी विशाल देह। कद काठी। उसके खूबसूरत झरते पत्ते। उसकी लंबी उम्र। उसके झरते पके पत्ते जब घाटी की धरती पर बिछ जाते हैं तो लगता है मानों घाटी अग्नि सिंदूर से नहा ली हो। हमने भी हवाओं में चिनार के संदेशों को महसूसा और एक ढलती शाम को वादी के आकाश का इस्तकबाल किया।

सैकड़ों सालों की उम्र लिए चिनार महसूसते हैं घाटी की सांसों को। उसकी कई पीढ़ियों ने कश्मीरियत को महसूस किया है। पंडितों, डोगरों, सिखों, सूफियों, अब्दुल्लाओं, मुफ्तियों, गिलानियों की सैकड़ों पीढ़ियों के बचपन से लेकर बुढ़ापे का वह गवाह रहा है। दहशत के साये में भी चिनार हवाओं के जरिए दूर-दूर बैठे सैलानियों को संदेश भेजता है ‘इस दहशतगर्दी से खौफ खाने की जरूरत नहीं है, बंदूकों की गोलियां कभी इतनी ताकतवर नहीं होती कि वह इंसानों के जज्बे को छील भर सके। आइए, इन वादियों के साक्षी बनिये, जिनमें तुम्हारे आदि पुरुषों और महादेव ने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को निखारा है। और इनमें एक शांति कायम की है। दहशतगर्दी वादी की नियत नहीं है। इसकी नियत शांति और अमन है। इसका शिव है। यहां का शैव है। यहां का सूफी मत है। विश्वास कीजिए, यह शिव फिर स्थापित होगा। और धीरे धीरे हो रहा है।’

तेरहवीं सदी में कश्मीर में शैव परंपरा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली गुरू लल्लेश्वरी या लाल देद की वाखें अभी भी वादियों में गूंजती हैं- हम ही थे, हम ही होंगे/हम ही ने चिरकाल से दौर किये/सूर्योदय और अस्त का कभी अन्त नहीं होगा/ शिव की उपासना कभी समाप्त नहीं होगी

यह सच है कि कश्मीर में शिव की उपासना सदियों से हैं। घाटी शिव की तपस्या स्थली महाभारत के काल से भी पहले की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राजतरंगिणी, आईए-ए-अकबरी, नीलमत पुराण समेत कई ऐतिहासिक स्रोत इसकी पुष्टि करते हैं। मगर शिव की खोज में पंथनिरपेक्षता का तत्व डालने के मकसद से कुछ अलंबरदार इतिहासकारों ने रच दिया, अमरनाथ की गुफा की खोज कुछ भेड़ चराने वाले गुज्जर बकरवालों ने की। तब से यही इतिहास बार बार पढ़ाया जा रहा है। मानो, असल इतिहास बता दिया, तो कोई मजहबी तनाव हो जाएगा। यूं इतिहास कभी छिपा नहीं रह सकता। वक्त और पुर्वाग्रहों की खुरचन हटाते ही वह खुद ब खुद प्रकट हो जाता है।

छठी सदी में मीलों दूर समंदर किनारे केरल से आद्यगुरू शंकराचार्य भी यहां शिव की खोज में ही आए होंगे। शंकराचार्य ने यहां आकर धूनी रमाई थी। इसी विशाल देह को समेटे डल के किनारे। डल के किनारे से सैकड़ों फीट ऊपर एक रमणीय पहाड़ी पर उनकी वह छोटी सी गुफा अभी भी मौजूद है, जहां वे शिवमय हुए थे। उसके पास ही मौजूद है भव्य और ऐतिहासिक शिवलिंग मंदिर। नीचे से ऊपर तक पूरा परिसर सुरक्षा बलों के आत्मबल से सुरक्षित है। पहाड़ी पर चढ़कर गाड़ी रुकने के बाद लगभग डेढ़-दो सौ सीढ़ियां चढ़कर मंदिर पहुंचते हैं। मंदिर के घंट निनाद की ध्वनी तरंगे सैलानियों के साथ साथ डल के जिस्म को तरंगित करती हैं। यहां से पूरे श्रीनगर और वादी को महसूस कर सकते हैं, जिसे कुछ शायरों ने जन्नत का दर्जा दिया है। घंट निनाद को महसूस कर चिनार के पत्ते शिवोअहं बुदबुदाते हुए मुस्कराते हैं। उसे याद आता है अपना पैतृक घर ईरान यानी ऐतिहासिक पारस। पारस पर अरब, सिकंदर का आक्रमण। अरब आक्रमण के बाद तो जैसे ईरान की संस्कृति ही खत्म हो गई। उस संस्कृति के बचे खुचे अंश ईरान की इस्लामिक क्रांति ने समाप्त कर दिए अपने प्राचीन मंदिर, स्मारक और मूर्तियों को तोड़कर। चिनार को अफसोस होता है, कोई अपनी संस्कृति को खुद अपने ही हाथों कैसे खुरच खुरच कर खत्म कर सकता है। उसे हंसी आती है, देखिए, फिर भी अरब जगत उन्हें इस्लाम में शामिल करने के लिए तैयार नहीं है। और हर वक्त लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। इससे तो अच्छा था, अपनी बची खुची संस्कृति को फिर से जिंदा करते। उस पर गर्व करते। जैसे इजराइलियों ने किया। चिनार हिंदुस्तान का ऐहसानमंद है, जिन्होंने उस वक्त जान बचाकर भागकर आए पारसियों को अपने पश्चिमी समंदर किनारे आसरा दिया। पाला-पोसा-बड़ा किया। अब तो चिनार की पीढ़ियों का भी ईरान में कोई अस्तित्व नहीं रहा। अपनी धरती छूटने का दुख तो है, मगर वादियों की आवो-हवा उसे रास आ गई है।

वह आमंत्रित करता है हर साल श्रद्धालुओं को। महादेव की इस पवित्र तपस्थली में। हजारों फीट ऊंचे पर्वतों पर। महादेव ने भी इसी धरा को अपनी तपस्थली के लिए चुना। कोई तो उद्देश्य रहा होगा महादेव का। सैकड़ों हजारों वर्षों से देश के हर हिस्से से श्रद्धालु महादेव की तपस्थली का पवित्र दर्शन करने आते रहे हैं। और चिनार की शाखाएं, पत्ता-पत्ता उनका इस्तकबाल करता रहा है, सदियों से। चाहे वह बालटाल का रास्ता हो या फिर पहलगाम का। कितनी खुशकिस्मत है चिनार की पीढ़ियां। सैकड़ों सालों से श्रद्धालुओं को अपने साये में सुस्ताने का सौभाग्य उन्हें मिलता रहा है।

इस बार यह सौभाग्य हमें भी मिला। श्रीनगर पहुंचने के बाद मित्र श्री सुनील कौल के सानिध्य से आकाशवाणी परिसर में मौजूद संन्यासी से विशाल चिनार के पेड़ तले कुछ पल रहने का सुख मिला। इससे पहले चिनार को सिर्फ फिल्मों से पहचाना करते थे। वह भी उनके झरते लाल पत्तों में घुले कथित इश्क से, जो फिल्म वालों ने घोल रखा है, फिल्म स्क्रीन को खूबसूरत दिखाने के लिए। खैर, खयाल आता है, इस चिनार ने भी वे भयानक, डरावनी, अलगावग्रस्त और रूह कांपने वाली आवाजें सुनीं होंगी। अब्दुल्ला और वीपी सिंह सरकार के नाक तले। घाटी से कश्मीरीयत तब ही पलायन कर चुकी थी। तब इबादत के पवित्र स्थलों से निकली उन भयानक आवाजों ने कश्मीरीयत का गला घोंट डाला था। कश्मीरीयत ने उन्हीं दिनों वहां से रुखसत करना शुरू कर दिया। अब कुछेक टुकड़ों में कश्मीरीयत को घाटी में महसूस किया जा सकता है। मगर इसकी असल तस्वीर देशभर में बिखरी पड़ी है। कश्मीरीयत सियासत के नारों से ज्यादा कुछ नहीं बची है घाटी में। राष्ट्रवाद से प्रेरित सियासत भी कश्मीरीयत के घाव को भरने में नाकाबिल साबित हुई है, अगर स्थानीय अल्पसंख्यकों (कश्मीरी पंडित) की मानें तो दिखावा ज्यादा हुआ, काम बहुत कम। काम के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।

महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र वसु ने पेड़ों की जीवंतता मापने के लिए अगर चिनारों पर प्रयोग किए होते तो यकीनन, उन्हें अलग तरह के नतीजे प्राप्त होते। अगर उन्होंने चिनारों की धड़कनों पर अपना क्रेस्कोग्राफ लगाया होता, तो उन्हें घाटी के इतिहास की ऊंची-नीची-पथरीली-रपटीली घाटियों के ग्राफ बने नजर आते। घाटियां दिखने में खूबसूरत हैं। इतनी कि किसी भी सैलानी का दिल इन पर आ जाए। अखरोट, बादाम, केसर, धान की खेती किसी भी सैलानी को लुभा सकती है। चिनाब, सिंधु, लीथर जैसी नदियां, जीरो प्वाइंट पर बर्फ में बर्फ के खेलों का आनंद, ऊंची-ऊंची पहाडियां, सड़कों के दोनों ओर घने हरे भरे पेड़, धान के खेत, झरने और नदियां घाटी को प्राकृतिक सौंदर्य से संवारती हैं। मगर, इन वादियों में उतना ही दर्द भी पसरा है। चिनार की टहनियों के पास जुबान होती तो, वे बताती।

जून महीने के आखिर में घाटी में पर्यटन उतार पर होता है। इसलिए होटल, रेस्तरां, शिकारा की बहुत मारा मारी नहीं होती। आप इत्मीनान से श्रीनगर में इनका लुत्फ ले सकते हैं। 23 जून की शाम को लाल चौक पार करते हुए अपने पूर्व नियोजित रहवास में पहुंचे। डल हमें अपने नजदीक पाकर मचल रही थी, या हम उसे अपने करीब पाकर खुश थे। ये या तो वह जानती है या हम। हां, लाल चौक एकदम सफेद था उस दिन। किसी जिलानी ने कोई कॉल नहीं किया था उस दिन। लोगों का जीवन बड़ी शांति और अमन से गुजर रहा था। देर रात तक दुकानें खुली थी। सड़क पर ट्रैफिक किसी आम महानगर की तरह सरक सरक कर रेंग रहा था। झेलम श्रीनगर के बीचों बीच से गुजरती है। उसके ऊपर बने पुल पर सैंकड़ों वाहन अक्सर निकलने की जद्दोजहद में एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। खैर, इस पुल से कई बार गुजरने का मौका मिला और हर बार जाम में अटकना पड़ा।

पहले दिन मुगलई बगीचों निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मेशाही बगीचे से रूबरू हुए। तीनों में एक बात जो कॉमन थी वह वे झरने जो घाटियों से निकलते हुए, बाग को गुलज़ार करते हुए डल में अपना अस्तित्व खो देते हैं।  मुगलई अंदाज में बने ये बगीचे मुगलकाल में दिल्ली की तपती मुगालफत और सुलगते आक्रोश से छुटकारा पाने के लिए मुगल बादशाहों की ऐशगाह हुआ करते थे। हालांकि दूसरी किस्म के कई पेड़, पौधे और घास यहां लगी है, मगर इन बगीचों की खूबसूरती चिनार से है, जैसे घर में बुजुर्ग के होने से। अगर चिनार इन बगीचों से हटा दिए जाएं, तो बगीचे विधवा हो जाएंगे। मुग़लो ने भले अपनी अय्याशियों को आरामदेह बनाने के लिए इन बगीचों का निर्माण करवाया हो, मगर फिलहाल बच्चों के लिए ये किसी खुशनुमा पार्क से कम नहीं है। बच्चे इनमें बहने वाले झरनों में अपना बचपन जीते हैं।

जितना रोजगार सरकारों ने यहां के लोगों को नहीं दिया, उससे कई गुना रोजगार श्रीनगर में शांत भाव से पसरी खूबसूरत डल झील ने लोगों को दिया है।  शांत झील कितना रोजगार पैदा करती है, और दहाड़ते समंदर दो  वक्त की रोटी भी नहीं दे सकते। कितने वर्षों से ये खोखले समंदर वादियों में महज खोखले चिंघाड़ रहे हैं। जिनमें अक्सर सरहद पार के खारे समंदर भी मिल जाते हैं। कभी कभी इनकी आवाज़े दिल्ली दरबार और हैदराबाद हाउस तक सुनाई देती थी। और उनके इस्तक़बाल में सियासत बिछ जाती थी। अब हालात बदल रहे हैं। महादेव करें ये और तेजी से बदले।

हमारे शिकारा के केवट मंजूर अहमद भी इससे सहमत दिखे। उनके मुताबिक डल उनकी ज़िंदगी है। पांच साल का बच्चा भी सबसे पहले दोस्ती चप्पुओं से करता है। क्योंकि उनकी ज़िंदगी के ताउम्र दोस्त ये चप्पू ही होते हैं। मंजूर अहमद बताते हैं कि सियासत की सारी ताक़त तो कश्मीर में अलगाव के मुद्दे को ज़िंदा रखने में लग जाती है। यहां के नागरिकों को रोजगार और घाटी के विकास के बारे में चिंतन करने को किसको फुर्सत है। आम नागरिकों से उनका ज्यादा वास्ता नहीं है। वे कहते हैं, बेटे ने ग्रेजुएशन किया है। तीन लाख रुपये देने के वादे पर भी नौकरी नहीं मिली। अब डल में ही शिकारा चला कर अपनी ज़िंदगी गुजार रहा है।

टैक्सी के ड्राइवर बिलाल ने सियासत को अपने तरीके से समझाया। उसने कहा, घाटी में कोई पार्टी नहीं चाहती अमन हो। अगर एक पार्टी हार गई तो वह अलगाववाद को अपने तरीके से जिंदा रखती है। अलगाववादियों को सहलाती है। पत्थरों को इकट्ठा करके रखती है। यहीं चीजें उन्हें घाटी में जिंदा रखती है।  सियासत का यही दुर्भाग्य है। जिन बातों से उन्हें जिंदा नहीं रहना चाहिए, वे ही उनके जीवन स्रोत हैं।

फिर से शिकारा के केवट की बात। डल में शहर की एक पूरी अर्थव्यवस्था चलती है। जैसे ही शिकारा झील में सौ डेढ़ सौ मीटर आगे बढ़ता है, मक्का वाला अपनी नाव लेकर आपके शिकारे से सटा देता है। आगे एक फल वाला आता है। एक प्लेट में पेश है-तरबूज, आम, लीची, केला, सेव के कटे टुकड़े। फिर आपकी डल यादों को अमर करने के लिए कुछ कश्मीरी पोशाकों के साथ एक नाव आती है। वह आपके शिकारा में ही आपको उन पोशाकों को पहनाकार आपकी तस्वीर ले लेगा। थोड़ा आगे बढियेगा तो नगीनशीं आपके मन मुताबिक अंगूठी तैयार कर देगा।

अगर श्रीनगर बन्द है और आपको शॉपिंग करनी है तो डल आपके लिए बेहतरीन मॉल है।

झील के भीतर टापुओं पर हर तरह की दुकान बंद के दौरान भी खुली मिलेगी। यहां आप काश्मीर के शॉल और दूसरी चीजें खरीद सकते हैं। झील के भीतर कई टापू हैं जहां जीवन भरपूर ज़िंदगी के साथ चलता है। यह झील अपने भीतर उगे कई टापुओं को जिंदा रखती हैं।

जून के आखिरी दिनों में अमरनाथ की यात्रा शुरू होने वाली थी। लिहाजा हर जगह फौज अनजाने खतरों के बीच श्रद्धालुओं की हिफाज़त के लिए मुस्तैद थी।  सोनमर्ग के रास्ते में चढ़ते ही एक बोर्ड आपका स्वागत करता है-फ़ौज आपकी सेवा में- सचमुच कितनी तसल्ली मिलती है इसे देखकर, पढ़कर और महसूस कर। जवान स्थितप्रज्ञ की तरह अपने हथियारों के साथ मुस्तैद रहते हैं। अगर चलती गाड़ी में उनको सलाम किया तो मुस्कुराते हुए सिर हिला देते हैं। हर डेढ़ सौ दो सौ मीटर की दूरी पर एक या दो जवान तैनात थे। अमरनाथ यात्रा का एक रास्ता बालटाल के रास्ते सोनमर्ग होते हुए जाता है। ये कम दूरी का है, मगर अनंतनाग से थोड़ा मुश्किल है। सोनमर्ग के रास्ते मे सिंधु नदी पूरे उफान से बहती हुई चलती है। इसके किनारे कई रेस्टोरेंट हैं। सोनमर्ग के रास्ते मे ज्यादातर रेस्तरां पंजाब के नाम पर है। खास बात यह कि सामिष खाने वाले प्रदेश में शुद्ध शाकाहारी खाने वालों के लिए सोनमर्ग से बेहतर कुछ नहीं है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय , पंजाबी , पहाड़ी हर तरह का शाकाहारी भोजन इस रास्ते मे है।

सोनमर्ग से तीस किलोमीटर आगे है जीरो पॉइंट। यानी लाइन ऑफ कंट्रोल से थोड़ा पहले। यहां पहाड़ के जिस्म से चिपकी बर्फ पर सैलानी बर्फ के खेलों का आनंद लेते दिख जाते हैं। इसी बर्फ के निचली तहों से बहता पानी आगे सिंधु नदी में घुलकर पाकिस्तान के रास्ते समंदर में विलीन हो जाता है। पानी भी कितना सफर करता है। जीरो पॉइंट से पहले बालटाल में अमरनाथ यात्रियों ने अपने डेरे जमा लिए थे। उनके रंग बिरंगे टैंटों को पहाड़ों से देखते हैं तो लगता है घाटी किसी दुल्हन सी सजी बैठी है।

पहलगाम यानी बैल गांव अनंतनाग जिले का हिस्सा है। अमरनाथ यात्रा का यह मुख्य रास्ता है। यह रास्ता आगरा-बीकानेर राजमार्ग जैसा आरामदेह है। एकदम सपाट और चौड़ी सड़क। आधारभूत ढांचे के स्तर पर हुए काम का यह बेहतरीन प्रतीक है। अनंतनाग श्रीनगर से लगभग 60-65 किलोमीटर दूर है। इसी रास्ते से जम्मू का रास्ता निकलता है। वैसे अमरनाथ यात्रा के लिहाज से देखें तो यह ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का रास्ता है, जहां से पांच हजार वर्ष पहले पांडवों ने महाप्रयाण किया था

इसी से शोपियां का रास्ता निकलता है। अलगाव की चिंगारियां इस इलाके में ज्यादा सुलगाई जाती हैं, लिहाज़ा सेना के जवान और स्थानीय पुलिस के जवान हर सौ मीटर पर मौजूद है। इन जवानों पर हर वक़्त किसी अनजाने खतरे का साया रहता है। मगर मौत को ये अपनी मुट्ठी में रखते है। सैलानियों को सेना के जवान बायपास रास्तों से नहीं जाने देते। सुरक्षा कारणों से। हमारे साथ हमारे मित्र और स्थानीय रहवासी सुनील कौल साब थे। उन्होंने कश्मीरी में उनसे बात की, मगर जब उन्होंने हमारे चेहरे देखे तो बाईपास रास्ते से जाने से एकदम मना कर दिया। इस रास्ते के दोनों और अखरोट के पेड़ और लीथर नाला साथ साथ चलते हैं।

पहलगाम की यात्रा के दौरान बीच में पड़ता है पंपोर इलाका। यह दक्षिण कश्मीर के आतंक सक्रिय जिला पुलवामा का हिस्सा है। पुलवामा जिला केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीर में सबसे ज्यादा केसर पुलवामा के पंपोर क्षेत्र में होती है। और दुर्भाग्य से पंपोर में अलगाव के बीज भी खूब पनपते हैं। कैसा विरोधाभास है। पूरी घाटी में आम लोगों में सियासी पार्टियां केसरिया के प्रति दुर्भावना भरने में कोई कसर नहीं छोड़ती। घाटी में सियासी दलों और अलगाववादी संगठनों को सबसे ज्यादा खौफ या नफरत केसरिया रंग से है।  इतना फोकस अगर केसर पर किया होता तो इस इलाके की आर्थिक हालात और भी ज्यादा मजबूत होती। खैर।

कश्मीर में आपने कहवा नहीं पिया, तो समझिए आपसे कुछ न कुछ छूट गया। स्थानीय कहवा तरोताजा करने के लिए काफी है। पहलगाम से लौटते वक्त सूखे मेवों की एक दुकान पर कुछ सूखे मेवे खरीदने के बाद दुकानवाले अब्दुल डार ने कहवा आफर किया। स्थानीय चाय और सूखे मेवे मिश्रित कहवा एक अलग तरह का बेहतर स्वाद जुबाँ पर चिपका देता है। यूं तो कश्मीर में वाजवान यानी बकरे के गोश्त से बना खास व्यंजन यहां की खासियत है, मगर निरामिष का संस्कार उस ओर जाने से रोकता है।

पहलगाम के रास्ते में मट्टन से आगे निकलने पर रास्ते में उजड्ड से खड़े कश्मीरी पंडितों के घर, जो अब भी खौफ, नफरत, अलगाव के इतिहास को समेटे है,  मन को छिन्न भिन्न कर देते हैं। सड़क किनारे अभी भी बेखौफ खड़े विशाल घरों के खोखले पिंजर, टूटी खिड़कियां और दरवाजे, आंगनों में उग आए जंगली पौधे घरों की तात्कालिक बिवशता, असहाय, बेसहारापन जैसी हालत बयां करते हैं।

कितने मट्टू, कौल, सप्रुओं की यादें इन टूटी खिड़कियों और दरवाजों से चिपकी हैं। दुर्भाग्य से, जिस पीढ़ी की इन घरों में पैदाइश हुई, उन्हें इनमें मरना तक नसीब नहीं हुआ। नई पीढ़ी जो दिल्ली, जम्मू और दूसरी जगहों पर जन्मी, पली और बढ़ी हुई है, वक्त की धार के साथ-साथ उनका भावनात्मक लगाव इन टूटे घरों से कितना रहा है, कहना मुश्किल है। मगर, दिल्ली और श्रीनगर की सियासत के चेहरों पर ये बिखरे घर कई बदनुना दाग छोड़ देते हैं। हमारे साथ, हमारे मार्गदर्शक के रूप में चल रहे श्री सुनील कौल के परिवार को भी 90 के दशक में घाटी में अपने विशाल घर को छोड़कर  जम्मू का रुख करना पड़ा। तब उनकी उम्र 16-17 की थी। उन्हें वो मंजर अब भी हूबहू याद है। मगर मैंने उन्हें कुरेदा नहीं। उन जख्मों को कुरेदने से बेहतर है उनकी साफ सफाई कर उनमे मलहम भरा जाए। अपने ही घर के आंगन में टैंट लगाकर रहना किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। विकसित लोकतंत्र में यह अस्वीकार्य है। कुछ आवाजें उठ रही हैं। मगर एक बात तय है बिना शक्ति भक्ति संभव नहीं है। पंडितों को सिर्फ सियासत के बल पर ही नहीं, बल्कि अपने भुजबल और आत्मबल से अपने खोये अतीत को हासिल करना होगा। बिल्कुल इजराइल के यहूदियों की तरह। बिना ज़मीन के अस्तित्व के भी यहुदियो ने दो हज़ार साल तक अपने भीतर बिना जमीन और आसमान वाले राष्ट्र को ज़िंदा रखा। जब भी मिलते तो कहते अगली बार यरुसलम मिलेंगे।  क्या पंडित भी श्रीनगर में मिलने, आशियाना संवारने, और शक्ति का नया केंद्र बनाने के वादे के साथ  मिलने की हिम्मत करेंगे।  संभव है आने वाले दिनों में उनके उजड़े घरों में फिर से गृह प्रवेश की शहनाई बजे। चार दिन बाद एक अलसाई सुबह में भीगी वादियों को छोड़ हम वापस लौट आए। लौटते-लौटते भीगते चिनारों ने हमसे वापस आने का वादा लिया। उसके मौन शब्दों ने कहा, देखिएगा, जल्द ही घाटी में गृहप्रवेश की शहनाइयां गूंजेगी। तुम फिर लौटकर आना सैलानी।

उम्मीद है कश्मीर की अगली यात्रा किसी कश्मीरी पंडित मित्र के  गृह प्रवेश के निमंत्रण पर होगी।

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