जून 1947 “द नेशनल हेराल्ड” के लिए पत्रकार बालकृष्णा मेनन एक आर्टिकल लिखते है – “एक्स्पोजिंग साधुज” मतलब साधुओं को बेनकाब करना. मेनन का मानना था, “दुनिया में दुःख – दर्द, लड़ाई – झगडे, कपट – ईर्ष्या सब मेरे आस-पास है फिर ये साधू हिमालय में जा कर क्यों बैठे हैं?” साधुओं को बेनकाब करने की इस कड़ी में उनके अगली स्टोरी का विषय था, “आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ क्या हैं? क्या यह जीवन में किसी भी तरीके से मायने रखता हैं?” साथ ही वे उजागर करना चाहते थे कि किस तरह साधू, आम लोगों को झांसे में लेते हैं और कैसे धोखा दे रहे हैं!”. इसी सिलसिले में वे ऋषिकेश में स्वामी शिवानन्द सरस्वती के आश्रम का दौरा करते हैं.

स्वामी शिवानन्द के बारे में

उस दौर में स्वामी शिवानन्द सरस्वती का दर्शन प्रत्येक अध्यात्मिक खोजियों को अपनी ओर खींचता था. वे अध्यात्म, दर्शन और योग पर लगभग 300 पुस्तके लिख चुके थे. उनका संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन 4 सरल शब्दों में समाहित था – सेवा, प्रेम, ध्यान और अनुभव. वे सन्यास से पहले मलेशिया में एक अस्पताल के मैनेजर थे. कठिन परिश्रम, दया और करुणा से वे हॉस्पिटल के प्रत्येक मरीज के प्रिय थे. गरीब मरीजों से पैसे लेने की बजाय वे सामने से पैसे देते थे. एक दिन एक साधू, मरीज के रूप में उनके अस्पताल में आता है और एक डॉक्टर के रूप में उनकी निष्ठा को देखकर बहुत प्रभावित होता है. तोहफे में उन्हें वेदांत दर्शन की किताब दे कर जाता है. किताब से मानव जीवन की वस्त्वकिता पढ़ कर शिवानन्द अपने जीवन में अध्यात्म की जरुरत महसूस अनुभव करते हैं. नतीजन वे अपने दस साल के डॉक्टरी पेशे के बाद भारत लौटते हैं और जून 1924 को ऋषिकेश में स्वामी विश्वानन्द द्वारा सन्यास ग्रहण करते हैं. वहीं एक छोटी सी कुटिया में रह कर लगातार ध्यान करते हैं. साथ ही दुसरे साधुओं की सेवा में खुद को न्यौछावर करते हैं. साधुओं तक जरुरी दवाइयां मुहैया करवाना, उनके पैरों की मालिश करना, बीमारी में उनके लिए भिक्षा मांगना, जरुरत में रात रात भर जागना और कभी कभी उन्हें कंधे पर उठाकर अस्पताल तक पहुँचाना. आगे चलकर ये उनका ये मिशन ‘डिवाइन लाइफ’ नाम की एक संस्था का स्वरुप ले लेता है.

बालकृष्णा मेनन और स्वामी शिवानन्द का वो इंटरव्यू

वैसे तो मेनन यहाँ साधुओ को एक्सपोज करने के इरादे से आये थे मगर स्वामीजी के देवत्व, प्रेम और वेदांत उपदेश का मेनन के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा. पहली बार कुछ यूँ बात हुई दोनों के बीच:

स्वामीजी: नमस्कार मेनन, हमारे आश्रम में आपका स्वागत है. आपका यहाँ आना कैसे हुआ?

मेनन: मै दिल्ली से पत्रकार हूँ. मैंने आपके बारे में, आपके काम के बारे में बहुत कुछ पढ़ा – सुना है. मै यहाँ साधू संतो की पवित्र भूमि को देखने आया हूँ और इसके बारे में एक आर्टिकल लिखने आया हूँ.

स्वामीजी: आप यहाँ कब तक ठहरेंगे मेनन?

मेनन: मै बस अपनी जानकारी एकत्र करूँगा और एक या दो दिन में चला जाऊंगा.

स्वामीजी: इतनी जल्दी क्या है? आप अपना पूरा समय लीजिये. आप जब तक चाहे यहाँ रह सकते है.

स्वामीजी के व्यक्तित्व को देख मेनन समझ गए कि ये वह साधू नहीं जिसकी तलाश में वे यहाँ आये थे.

मेनन ने देखा की, स्वामीजी सुबह 4 बजे उठते हैं, संत्संग करते हैं, आध्यात्मिकता पर किताबे लिखते हैं, विश्व भर से आ रहे सभी पत्रों के उत्तर देते हैं, प्रश्नोत्तरी सभा करते हैं साथ ही अस्पताल सँभालते हैं, मरीजो को फल एवं मिठाइयाँ बांटते हैं, शाम को भक्ति संगीत भी करते हैं. और इतनी व्यस्त दिनचर्या होते हुए भी वे एकदम शांत और प्रसन्न रहते हैं.

स्वामीजी के जीवन का करीब से अवलोकन करने के बाद, मेनन सोचते थे कि, “मै ऐसे व्यक्ति से कभी नहीं मिला जो इतना गतिशील, सशक्त, दयालु और जैसे ईश्वर का ही रूप हो”.

मेनन ने यहाँ कुछ दिन और रहने कर निश्चय किया, फिर एक सप्ताह और बाद में वे एक महीने तक यहाँ रहे. इस दौरान मेनन की स्वामीजी से कई बार मुलाकात हुई. कुछ मौको के बाद स्वामीजी ने परख लिया कि, यह व्यक्ति कोई साधारण पत्रकार नहीं, यह जीवन में कुछ और, और गहराई से ढूंढ रहा है.

एक बार स्वामीजी ने उनसे कहा, “भगवान ने आपको इतनी बुद्धिमत्ता दी है! तुम क्यूं नहीं सांसारिक जीवन की पड़ताल करने के लिए इसका उपयोग करते? अवलोकन करो, सोचो और फिर अपने निष्कर्ष पर आओ”.

दूसरी ओर आश्रम में बात फैल चुकी थी कि दिल्ली का यह पत्रकार स्वामीजी का सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है. मेनन लगातार सवाल पूछते थे, घंटो आध्यात्मिकता पर बाते करते थे और यह सब स्वामीजी को खूब भा रहा था.

आश्रम के कुछ लोगो के मुताबिक, “मेनन की उभरी हुई बड़ी बड़ी आँखे और लम्बे लम्बे केश, दोनों संकेत देते है कि वे पिछले जन्म में एक महान योगी होंगे.”

जब एक बार फिर आना हुआ ऋषिकेश

मेनन के दिल्ली लौट आने के 3 महीने बाद, सितम्बर 1947 में स्वामीजी के 68वें जन्म दिवस के मौके पर उनके आश्रम ‘आनंद कुटीर’ में उनके शिष्यों द्वारा एक बड़े समारोह की योजना चल रही थी. पूरे भारत से संतो और भक्तों का जमावड़ा यहाँ होना था. साथ ही स्वामीजी के जीवन पर एक यादगार पुस्तक भी लिखने का विचार था. इस किताब में स्वामीजी के लेख, उनके कार्यो और योजनाओ का जिक्र होना था. स्वामीजी के शिष्य इसकी सामग्री देने को तैयार थे मगर कोई भी इतने मुश्किल काम को करने, इस पुस्तक का संपादन करने और उसे अंतिम रूप देने को राजी नहीं था.

तभी स्वामीजी के सचिव श्रीधर राव को खयाल आया कि, “क्यूं न हम दिल्ली वाले उस पत्रकार को मदद हेतु आग्रह करे! मुझे विश्वास है कि, वह बेहतर ढंग से काम करेगा.” इस बात पर स्वामीजी भी राजी हुए और किस्मत ने श्रीधर राव के मुख से एक बार फिर मेनन को ऋषिकेश बुलाया.

मेनन आगे चल कर कोई और नहीं बल्कि चिन्मय मिशन की नींव डालने वाले स्वामी चिन्मयानन्द बने.

मेनन ने स्वामीजी के आग्रह को स्वीकार किया और कई दिनों तक कड़ी मेहनत की और वक्त पर किताब का संपादन पूर्ण किया.

इसी दौरान मेनन अक्सर स्वामीजी के सत्संग व्याख्यानों में हिस्सा लेते थे. एक रोज आश्रम में सत्संग के समय अचानक स्वामीजी ने मेनन का नाम लिया और खड़े होकर आध्यात्मिकता के बारे में बोलने को कहा.

मेनन खड़े हुए और घबराते हुए बोले – मैं? मैं क्या कहूँगा? मुझे कुछ भी नहीं पता आध्यात्मिकता के बारे में!

स्वामीजी – ठीक है! तो किसी भी विषय पर बोलो जिसके बारे में आप जानते हो. आपके ऋषिकेश दौरे के बारे में या कोई भी और.

मेनन – ठीक है तो मै दिल्ली से आया हूँ और…

मेनन आगे कुछ भी नहीं बोल पाए. यह मेनन के जीवन के उन चंद लम्हों में से एक लम्हा था जब वे 4 शब्दों के आगे कुछ बोल नहीं पाए.

सन्नाटे के बिच स्वामीजी ने कहा, ठीक है! कोई बात नहीं आपको फिर से मौका मिलेगा!

सत्संग ख़त्म होने के बाद स्वामीजी मेनन की तरफ बढे और बोले, “यह क्या था? एक एम्-ए लिटरेचर और एक सफल पत्रकार, मनचाहे विषय पर 2 बाते नहीं बोल सका! आप तैयार रहना क्योकि मै एकबार फिर आपको बोलने को कहूँगा!”

इसके बाद मेनन ने श्रेयस और प्रेयस पर अपने विचार लिखे और अपना पहला आध्यामिक व्याख्यान दिया. अब समय समय पर स्वामीजी मेनन को बोलने को विषय देते थे. मेनन विषय की खोज करते थे और सबके बीच अपने विचार रखते थे.

पत्रकारिता ​ से आध्यात्मिकता की ओर

3 महीने आनंद कुटीर में रहने के बाद, मेनन अपने पत्रकारिता के पेशे को जारी रखने के लिए वापस दिल्ली लौटे. मगर इस बार वे अकेले नहीं, स्वामीजी द्वारा लिखी कई किताबे भी साथ लाये थे. इनमे स्वामीजी के व्याख्यान, और चर्चायें भी शामिल थी. मेनन ने बड़ी उत्सुकता से इन किताबों का अध्ययन किया और देखते ही देखते उनकी पत्रकारिता ने आध्यात्मिकता का मोड़ ले लिया.

अब उन्होंने आध्यात्मिक किताबो की समीक्षा लिखना शुरू कर दिया. स्वामी शिवानन्द के जीवन पर लिखी गई किताब पर उन्हें समीक्षा में लिखा कि, “वे साबित करते है कि उन्होंने प्रस्थानत्रयी को ना सिर्फ पढ़ा है बल्कि उसको पूर्ण रूप से जीया भी है.”

अगले 6 महीनों तक समय समय पर मेनन ऋषिकेश का दौरा करते रहे. इसी बीच स्वामीजी ने गौतम बुद्ध के जीवन पर एक नाटक आयोजित किया. कहानी थी, “एक दुःखयारी माँ, जो अपने मृत बालक को लेकर भगवन बुद्ध के पास आती है और पुनर्जीवन की याचना करती है”.स्वामीजी सभी में से मेनन को माँ के पात्र के लिए पसंद करते है और मेनन भी बड़ी प्रवीणता से इस पात्र को मंच पर जीते है. स्वामीजी मेनन के इस नाटक को श्रेष्ठ नाटक का दर्जा देते है. इस वाकये के बाद, मेनन सन्यास की संभावनाओ को लेकर स्वामीजी के पास जाते है मगर स्वामीजी उन्हें कुछ समय प्रतीक्षा करने की राय देते है.

कुछ समय बाद मेनन यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा पर जाते है. जहाँ वे साधुओ की जीवन शैली और आध्यात्मिक दर्शन को और करीब से समझते हैं और खुद के सन्यासी बनने के निश्चय को लेकर अपने घर एक पत्र लिखते हैं. मेनन की माँ कुच्चू अम्मा मेनन के इस निर्णय से सहमत थी और इसे मान भी चुकी थी. मगर मेनन के पिताजी गृहस्थ जीवन के पक्षधर थे. साथ ही उनका मानना था कि, “उनका पुत्र खुले तौर पर धर्म की निंदा करता था. कैसे वह सन्यासी बनने को सोच सकता है.” बाद में वे यह कहकर अनुमति देते है कि, “इस लड़के ने हमेशा वही किया है जो उसने चाहा है, सन्यास के लिए ना कहना भी मेरे लिए बेकार है.”

और इस तरह महाशिवरात्रि, 25 फरवरी 1949 को बालकृष्णा मेनन, स्वामी शिवानन्द की शरण में सन्यास के साथ नया नाम धारण करते है स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती.

स्वामी चिन्मयानन्द के स्वयं के ही शब्दों में, “संन्यास का अर्थ बलिदान है और पूर्ण रूप से अहंकार और उसकी इच्छाओं को त्यागने के बाद बलिदान की भावना से जीना”.

आजादी की लड़ाई में भी रहा योगदान

गांधीजी ने 1942 में ‘क्विट इण्डिया मूवेमेंट’ शुरू किया. जवाब में अंग्रेजो ने कांग्रेस को अवैध घोषित करते हुए गाँधी, नेहरु जैसे कई नेताओं को गैर-जमानती वारंट पर गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद देश में व्यापक रोष फैला और पुरुष, महिला, व्यापारी, मजदूर, विद्यार्थी वर्ग ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. बालकृष्णा मेनन भी इन्हीं विद्यार्थियों में से एक थे. वे अंग्रेजो की हुकूमत के खिलाफ सामग्रियां लिखते, दूसरे लोगों तक पहुंचाते और भाषण देते थे. अंग्रेज इस आन्दोलन को कोड़े, बन्दूको और गिरफ़्तारी से कुचलना चाहते थे. करीब एक हजार भारतीय हफ्तेभर में शहीद हो चुके थे. करीब छह हजार भारतीय जेलों में कैद कर लिए जा चुके थे. इसी बीच एक गिरफ़्तारी का वारंट मद्रासी लड़के बालकृष्णा मेनन के नाम भी जारी हुआ. इसके बाद मेनन कश्मीर चले गए और वहां से अंडरग्राउंड मूवेमेंट चलाने लगे. यहाँ आराम के लिए कोई बढ़िया जगह नहीं थी, खाने को भोजन नहीं था और ना ही पहनने को जरूरी कपडे थे. फिर भी वे डटे रहे. कुछ समय बाद जब वे अब्बोटाबाद से दिल्ली के लिए बस में बैठे तब उन्होंने सुना की एक अंग्रेज अधिकारी उनका नाम लेकर बस में पूछताछ कर रहा है. मेनन तुरंत बस के पिछले दरवाजे से नीचे उतरे और सचेत हो गए. फिर उन्होंने 1 साल वहीं अब्बोटाबाद में गुजारा और फिर यह सोच कर पंजाब चले गए की, उनका दो साल पुराना केस भुला दिया गया होगा.

जब मेनन को मरने के लिए सड़क पर फ़ेंक दिया गया था 

पंजाब पहुँचते हुए एक बार फिर मेनन ने विद्यार्थियों को एकत्रित करना, धरना देना और सरकार विरोधी सामग्रियां बाँटना जारी रखा. मगर इस बार मेनन धर लिए गए और उन्हें दिल्ली की जेल में डाल दिया गया. अंग्रेजो ने उन्हें तरह तरह की यातनाएं दी. कुछ समय बाद मेनन गंभीर रूप से बीमार हो गए और वे जेल में ही मर जाएँगे इस डर से अंग्रेजो ने उन्हें रात को बाहर निकला और शहर से बाहर सड़क पर मरने के लिए फेंक दिया. सवेरे एक महिला वहां से गुजर रही थी. उन्होंने ने देखा की सड़क पर एक व्यक्ति पड़ा है जिसके शरीर से खून निकल रहा है लेकिन कुछ हल-चल मौजूद है. महिला ने तुरंत मेनन को उठाया और घर ले गई. डॉक्टर को कॉल किया और बेटे की तरह मेनन की देखभाल की. कुछ हफ्तों बाद मेनन ठीक होने लगे.

चिन्मय मिशन की स्थापना

स्वामीजी के ज्ञान यज्ञ से प्रभावित होकर 1953 में मद्रास से स्वामीजी के भक्तो के एक समुदाय ने स्वामीजी को चिन्मय मिशन नाम से सांस्कृतिक, शैक्षिणिक और सामाजिक कार्यों की गतिविधियों के लिए संस्था को रूप देने की स्वीकृति मांगी. स्वामीजी समुदाय के विचारों से सहमत तो हुए मगर संस्था के नाम के विरोध में थे. उनका कहना था, “मेरे नाम से से कोई संस्था मत खोलना. मै यहाँ संस्थानक बनने नहीं आया. मै यहाँ हमारे प्राचीन साधू – संतो – ऋषियों के सन्देश देने आया हूँ जिनसे मुझसे फायदा हुआ है.”

समुदाय ने प्रति उत्तर में स्वामीजी को लिखा, “चिन्मय शब्द केवल स्वामीजी के नाम को ही प्रकट नहीं करता, जब इसका अर्थ है शुद्ध ज्ञान, जिसकी वे तलाश कर रहे हैं.” समुदाय के इस उत्तर पर स्वामीजी भी सहमत हुए और 8 अगस्त 1953 में चिन्मय मिशन को अंतिम रूप दिया गया जो आज दुनिया भर में वेदांत के ज्ञान के प्रसार में संलग्न है.

विश्व हिन्दू परिषद् का गठन

उन्होंने 1963 में एक आर्टिकल लिखा था जिसमे हिन्दू समाज की दुर्दशा के प्रति अपनी पीड़ा व्यक्त की थी. इस पीड़ा में से एक विचार को जन्म मिला. फिर दादा साहब आप्टे उनके पास गए, विचार विमर्श हुआ और उसमे से 1964 में विश्व हिन्दू परिषद् का जन्म हुआ. वे प्रथम संस्थापक अध्यक्ष के रूप में संस्था का मार्ग दर्शन करते रहे. उनकी जन्म शताब्दी पर स्मारक सिक्का प्रदर्शित करते समय नरेन्द्र मोदी कहते हैं, “स्वामीजी की जीवन यात्रा बड़ी गजब की है. कहाँ दक्षिण में जन्मे, कहाँ लखनऊ में पढाई के लिए जाना और आजादी के आन्दोलन में उन्होंने पंजाब की धरती को पसंद किया था. मुझे कभी स्वामीजी को पूछने का मौका नहीं मिला पर मुझे जरुर ये लगता था कि, वे अगर केरल या तमिलनाडु में रह भू-गर्भ आन्दोलन चलाते तो शायद पकडे जाते. क्योकि उनकी ऊंचाई इतनी थी कि वो अलग दिखाई देते थे. लेकिन पंजाब में वे मिल-झूल जाते थे. इसलीये भू-गर्भ रहने के लिए उन्होंने पंजाब को पसंद किया था.”

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