25 जुलाई को पाकिस्तान में हुआ था बाड़मेर की रेशमा का इंतकाल. भारत में सुपुर्द-ए-खाक करने के लिए 26 साल में दूसरी बार खुला खोखरापार-मुनाबाव बॉर्डर. दोनों देशों ने वैर-भाव भूलकर दी रेशमा को अंतिम विदाई.

‘पंछी नदियां पवन के झोंके कोई सरदह न इन्हें रोके… सरहदें इंसानों के लिए हैं, सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इंसा हो के…’ इस गीत को लिखने वाले जावेद अख्तर यदि 31 जुलाई को भारत-पाक की खोखरापार-मुनाबाव सरहद पर होते तो वे इस गीत के शब्दों को बदलने पर यकीनन मजबूर हो जाते.

बाड़मेर की 66 साल की रेशमा ने कुछ पल के लिए ही सही, न केवल सरहद के मायने बदल दिए, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सियासतदां भले ही सियासी फायदों के लिए नफरत के बीच बो दें, लेकिन ऐसा करके वे अवाम के जज्बातों को नहीं सुला सकते. हुआ यूं कि बाड़मेर के छोटे से गांव अगासड़ी की रहने वाली रेशमा 20 जुलाई को अपने बेटे शायब खान के साथ रिश्तेदारों से मिलने थार एक्सप्रेस से पाकिस्तान के छिपरा (बलूचिस्तान) गई थीं. यहां पहुंचते ही उन्हें बुखार आ गया. डॉक्टर को दिखाया, लेकिन वे ठीक नहीं हुईं और 25 जुलाई को उनका इंतकाल हो गया. रिश्तेदारों ने शायब को रेशमा को वहीं सुपुर्द-ए-खाक करने के लिए खूब समझाया, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने अपनी मां को अपने वतन की मिट्टी के हवाले करने की जिद पकड़ ली. मगर उन्हें यह नहीं पता था कि इसे पूरा कैसे करना है.

दोनों परिवारों की न तो आर्थिक स्थिति अच्छी है और न ही उनका भारतीय दूतावास में कोई संपर्क था. शायब बाड़मेर में परिजनों को अपना दर्द और बेबसी बयां करने से अलावा कुछ भी नहीं कर पाए. परिजनों ने इसकी सूचना जसवंत सिंह के विधायक बेटे मानवेंद्र सिंह की दी तो संवेदनाओं की कडिय़ां जुड़ती चली गईं. एक तो मानवेंद्र सिंह ने अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए, वहीं दूसरी ओर 26 जुलाई को एक खबर के जरिये विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को इस मामले की जानकारी मिली. स्वराज ने तुरंत पाकिस्तान में भारत के राजदूत अजय बिसारिया को मदद करने के निर्देश दिए.

अजय बिसारिया ने कुछ घंटो में ही शायब से संपर्क कर उनकी मां के शव को भारत लाने की प्रक्रिया शुरू की. तय हुआ कि 28 जुलाई को थार एक्सप्रेस से रेशमा का शव भारत भेजा जाएगा. इसके लिए कागजी खानापूर्ति हुई तो पता चला कि शायब के वीजा की अवधि समाप्त हो चुकी है. इस दौरान थार एक्सप्रेस शायब और उनकी मां के शव के इंतजार में खोखरापार स्टेशन पर डेढ़ घंटे तक खड़ी रही. 1965 में भारत पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद 18 फरवरी 2006 को फिर से शुरु हुई यह ट्रैन तकनीकी अथवा सुरक्षा संबंधी कारणों के अलावा किसी दूसरी वजह से स्टेशन पर इतनी देर तक खड़ी नहीं रही. शायब की वीजा अवधि बढऩे के बाद तय हुआ कि रेशमा का शव 31 जुलाई को मुनाबाव-खोखरापार के रास्ते भारत लाया जाएगा. जब शव को भारतीय सीमा में लेने के लिए खोखरापार-मुनाबाव बॉर्डर का दरवाजा खुला तो दोनों मुल्कों के बीच नफरत के बजाय भाईचारा दिखाई दिया.

पाकिस्तान ने भारत को रेशमा का शव सौंपने से पहले उसे खूब इज्जत बख्शी. बॉर्डर पर पाक सीमा में मौजूद इमिग्रेशन के अधिकारियों, रेंजर्स व अन्य कर्मचारियों ने रेशमा को जन्नत नसीब होने की दुआ पढ़ी. यही नहीं, पाक रेंजर्स ने कंधा देकर रेशमा के शव को बीएसएफ को सौंपा. इस दौरान वहां मौजूद हर शख्स भावुक था.


बाड़मेर के छोटे से गांव अगासड़ी के रहने वाली रेशमा

भारत-पाक की सरहद पर 1992 में तारबंदी होने के बाद यह दूसरा मौका है जब खोखरापार-मुनाबाव बॉर्डर को खोला गया है.  इससे पहले 2006 में यह मार्ग खोला गया था. उस समय तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह 86 श्रद्धालुओं के जत्थे के साथ इस मार्ग से बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज माता के दर्शन करने गए थे. रेशमा के अपनी जमीं पर सुपुर्द-ए-खाक होने से उनके बेटे शायब सुकून महसूस कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरी अम्मी जिंदा भारत लौटी हैं. मुझे खुदा पर उम्मीद थी. खुदा ने रास्ता बनाया और सबने सहयोग किया तो अम्मी को अपनी वतन की मिट्टी नसीब हो गई.’

वे आगे कहते हैं, ‘अम्मी कई महीनों से कह रही थी कि मैं बूढ़ी हो गई हूं. पता नहीं कब मर जाऊं, मुझे पाकिस्तान मिलवा ला. मैं उन्हें वहां ले गया तो पांच दिन बाद ही अनहोनी हो गई. सबने कहा कि अम्मी को यहीं दफना दो मगर मेरा मन नहीं माना.’ शायब को अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि उन्होंने अपनी मां को भारत में ही सुपुर्द-ए-खाक किया है. वे कहते हैं,

हम गरीब आदमी हैं. हमारी किसी से जानकारी भी नहीं है. मैंने सिर्फ अपने गांव फोन किया था. उसके बाद सब अपने आप होता गया.

– शायब

इस दौरान हुई परेशानी पर शायब कहते हैं, ‘पाकिस्तान में चुनाव की वजह से रास्ते बंद थे. 27 जुलाई की शाम को अनुमति मिली तो कागज दूतावास में रह गए. वापिस लेकर आए तब तक थार एक्सप्रेस निकल गई. इसके बाद वीजा पूरा हो गया.’ वे आगे कहते हैं, ‘वीजा कैसे बढ़ा इसकी जानकारी मुझे यहां आने के बाद पता चली. मेरी अम्मी के लिए कलेक्टर साहब ने छुट्टी के दिन भी रात 12 बजे तक दफ्तर खोला. एमएलए साहब ने कई बार फोन किया और मदद के लिए वहां लोग भेजे. एंबूलेंस का इंतजाम. सरकारी लोगों ने भी खूब मदद की.’ शायब को उम्मीद है भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते एक न एक दिन जरूर सुधरेंगे. वे कहते हैं, ‘दोनों मुल्कों के लोग एक जैसे हैं. पहले तो हमारा मुल्क एक ही था. सरहद तो खिंच गई मगर जज्बात आज भी जिंदा हैं. दोनों मुल्कों को विवादों को सुलझाकर भाईचारे से रहना चाहिए.
शिव से भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह कहते हैं, ‘मुझे रेशमा के देहांत के बारे में ग्रामीणों ने बताया. मैंने अपने स्तर पर जितनी मदद हो सकती थी वो की. विदेश मंत्री की जानकारी में मामला आने के बाद दूतावास ने भी पूरी मदद की.’

वे आगे कहते हैं, ‘क्षेत्र के सभी लोगों की भावना इससे जुड़ गई थी. सभी चाहते थे कि रेशमा का अंतिम संस्कार उनके गांव में ही हो. मेरी भावना भी यही थी. इस बात का संतोष है कि सात दिन बाद ही सही, रेशमा का शव भारत आया और अपनी धरती पर उनका अंतिम संस्कार हुआ.’

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