इस दीवाली अपने बच्चों को 90’s वाला अपना बचपन बतायें


रामलीला मंचन

इस दीवाली से किशोर पीढ़ी को सनातन तत्वों से परिचित करवाने का उपक्रम करें।

तीस साल के कैलाश चन्द्र एक सरकारी स्कूल में तृतीय श्रेणी के अध्यापक हैं। वे अपने विद्यार्थियों को महाभारत और रामायण के चरित्र, घटनाक्रम और उनसे जुड़ा सूक्ष्म जीवन दर्शन महज बातों बातों में समझा देते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्होंने रामायण या महाभारत को औपचारिक तौर पर पढ़ा है। न किसी गुरुकुल में इसकी शिक्षा दीक्षा ली है। खुश किस्मती से उनकी पैदाइश नब्बे के दशक के ग्रामीण क्षेत्र की रही, जिस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली रामलीला, रासलीला, भागवत पाठ, पौराणिक चरित्र राजा हरिश्चन्द्र, नरसी मेहता, गोरखनाथ, मोरध्वज सहित अनेक चरित्रों पर आधारित नाटक और सत्संग पेश किए जाते थे। लोग देर शाम का वक्त इन्हीं कार्यों के लिए सुरक्षित रखते थे। नब्बे के दशक और उससे पहले पैदा होने वाले बच्चों के लिए गुरुकुल थे, जिनमें वे सहज रूप से जीवन से जुड़े दर्शन को ग्रहण कर लेते थे। कैलाश चंद्र के अवचेतन मन में बसी वे बातें आज अनुभव के साथ विस्तारित हो गई हैं।

फिर आर्थिक उदारवाद आया। लोगों ने खेतों में सोना उगाना शुरू किया। उनमें पैसे की कुछ अतिरिक्त समझ पैदा हो गई। इसका फायदा ये हुआ कि लोगों के पास पैसा तो खूब आ गया, मगर उनका अपनी जड़ों से कटना शुरू हो गया। आर्थिक उदारवाद का सांस्कृतिक मूल्यों पर गहरा असर पड़ा है। इसका खामियाजा सबसे ज्यादा अगर किसी पीढ़ी को उठाना पड़ा है तो वह है बीसवीं सदी की आखरी और इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशक में पैदा होने वाली पीढ़ी को। आज पंद्रह से अठारह साल के किसी किशोर से आप दुनिया भर के तकनीक की जानकारी चंद पलों में ले सकते हैं, मगर सांस्कृतिक मूल्यों या सनातन परंपरा से जुड़े किसी चरित्र या घटना से उसका जुड़ाव लेश मात्र भी न होगा। अगर है भी तो वह महज सोशल मीडिया आधारित अधूरी और अर्धसत्य जानकारी। मगर जीवन दर्शन और व्यवहार में उसकी प्रायोगिकता लगभग शून्य है।


किशोर पीढ़ी के पास छोटी छोटी समस्याओं, तनावों, मुश्किलों का हल करने का दर्शन नहीं है।

रही-सही कसर हमारी कथित आधुनिक शिक्षा पद्धति ने पूरी कर दी। राम, कृष्ण, गोरखनाथ, राजा हरिश्चन्द्र, भृतहरी और ऐसे ही ऐतिहासिक चरित्रों के बारे में पढ़ाना या बताना अब कथित सेक्यूलरवाद में उलझ सकता है। मां-बाप को उदारवाद के दौर में अपनी और परिवार की महत्वाकाक्षाओं का उदर भरने से फुरसत नहीं है। इसका असर ये हुआ कि किशोर पीढ़ी के पास छोटी छोटी समस्याओं, तनावों, मुश्किलों का हल करने का दर्शन नहीं है। यूं कहें कि उनके पास संदर्भ सामग्री नहीं है, जहां से वे अपनी मुश्किलों का हल ढूंढ लें। इसके अभाव में अक्सर किशोर किसी अनचाही और अनजानी राहों में समाधान तलाशने लगता है। कई बार ये उपाय आत्मघाती साबित होते हैं।

फिर क्यों हम बेवजह नई पीढ़ी को ताने दें? उसका कोई दोष नहीं है। क्यों उससे उम्मीद करें कि वह भी मां बाप के साथ वही व्यवहार करेगी, जो उसके मां बाप ने अपने माता पिता के साथ किया है। अगर किसी कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग ही खराब है तो उसमें आप चाहे कितने अच्छे से अच्छे एप्स डाल लें, वह काम नहीं करेगा। एक और समस्या ये है कि उस पीढ़ी को अब वह सब जानने की भूख भी नहीं रही। उन्हें जबरन वह सामग्री नहीं दी जा सकती। क्योंकि इस वक्त आभासी दुनिया के जिस रंगीन दौर में वे तैर रहे हैं, उन्हें वहां से अलग करना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

दीवाली का उत्सव आ रहा है। दीवाली का अर्थ ही अंधेरे को हटा कर ज्ञान, उम्मीद, आशा और खुशियों की रोशनी जलाना है। तीन स्तरों पर काम कर हम अपने सनातन तत्वों से अपनी पीढ़ी को जोड़ने का काम कर सकते हैं। पहला समाज के स्तर पर। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समाज के सहयोग से छोटी छोटी रामलीलाएं, महाभारत की कहानियों पर आधारित नाटक और ऐतिहासिक पात्रों की कहानियां रोचक ढंग से कही जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत ग्राम सभा भामाशाहों के सहयोग से चौपालों पर रामलीला और रासलीलाओं का मंचन करवाएं।

शहरी क्षेत्रों में विवेकानंद केंद्र, नेहरू युवा केंद्र जैसे सरकारी और गैर सरकारी संगठन स्वाध्याय केंद्र शुरू करने की जिम्मेदारी उठाएं। इस दिशा में विवेकानंद केंद्र के कार्य काफी सराहनीय है।

विद्यालय स्तर पर सबसे बेहतरीन कार्य किया जा सकता है। राज्य सरकारें ये सुनिश्चित करें कि सप्ताह में कम से कम एक कालांश इन कहानियों और कथाओं के लिए सुरक्षित रखा जाएगा। राजस्थान सरकार ने इस दिशा में प्रयास जरूर किया था। मगर इसे बाबाओं के प्रवचनों से दूर रखकर इसमें कुछ रचनात्मक चीजें की जा सकती है। इसके लिए स्कूलों को पूरी स्वायतता हो।

क्या ये दीवाली सनातन मूल्यों की स्थापना की संधि वेला हो सकती है? क्या हम अपनी ऐतिहासिक़ जिम्मेदारी निभाने के लिए सजग है? अगर हम ऐसा कर सके तो यकीनन एक बार फिर हम सनातन राह पर आगे बढ़ते दिखेंगे और आज सामने आ रही बहुत सारी सामाजिक और मानसिक समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।


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