चंद दिनों पहले होमो-सेक्सुआलिटी को लेकर आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के एक बयान पर सोनम कपूर खूब भड़क गईं थी. सोनम ने पहले तो इंस्टाग्राम पर श्री श्री रविशंकर को मोरॉन (मूर्ख ) लिखा. फिर गरियाते हुए ट्वीट किया कि, “इस धर्म गुरु की आखिर समस्या क्या है, अगर आपको हिंदुत्व और संस्कृति के बारे में कुछ सीखना हो तो बेहतर है इनकी जगह हिंडोल सेन गुप्ता और देवदत्त पटनायक को फॉलो कर लो.”
WTF is wrong with god men, if you want to learn something about Hinduism and culture it’s better to follow @HindolSengupta & @devduttmyth
— Sonam K Ahuja (@sonamakapoor) November 14, 2017
इतना पढने के बाद जरा साँस लीजिये और अंतिम नाम को दोबारा याद कीजिए! देवदत्त पटनायक ! इस नाम पर आपको यहाँ रोक रहा हूँ ! क्यूंकि हिंदुत्व और संस्कृति को सीखने के लिए सोनम कपूर ने जिस शिगूफे का नाम लिया हैं वह बंदा आजकल फेमस है. पद्मावती पर राजपूतों का विरोध करता है, जौहर से बचकर रेप हो जाना अच्छा बताता है, मोदी का विरोध करता है, हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं पर व्यंग करता है और धार्मिक ग्रंथों की सामग्रियों को यहाँ वहाँ से उठा कर ऐसी चटपटी खिचड़ी तैयार करता हैं जो सोनम कपूर और आलिया भट्ट जैसे लोगों के मन में घर कर जाती है.
इस शख्स ने ग्रांट मेडिकल कॉलेज मुंबई से एमबीबीएस की पढ़ाई की. फिर 14 साल तक मेडिकल क्षेत्र में काम किया. बिगबाजार चलाने वाली कंपनी के चीफ बिलीव ऑफिसर के तौर पर काम किया है. बीच में मुंबई यूनिवर्सिटी से तुलनात्मक पौराणिक का कोर्स भी कर लिया और वेद-पुराणों की खिचड़ी बनानी शुरू कर दी! इस खिचड़ी ने अनजाने में ही सही पर भारतीयों की अपने अतुल्य इतिहास और संस्कृति को देखने के नज़रिए को भारी नुक़सान पहुँचाया है.
सोचने वाली बात तो यह भी हैं कि वेद-पुराणों की बात करने वाले इस व्यक्ति को ना तो संस्कृत का ठीक से ज्ञान है और न ही किसी वैदिक भाषा का. बस हिन्दू धर्म की ऐतिहासिक किताबों और वेद-पुराणों की अंग्रेजी में चेप कर, तोड़ मरोड़ कर फेम के पीछे भाग रहा है और करोंड़ों छाप रहा है.
देवदत्त पटनायक की इसी एजेंडा सेटिंग थ्योरी पर बात करते हुए हिन्दू संस्कृति और भारतीय इतिहास के वरिष्ठ जानकार राजीव मल्होत्रा कहते हैं कि, “यह व्यक्ति हिन्दू धर्म के इतिहास को मिथक में बदल रहा हैं. और यदि एक बार हिन्दू धर्म के इतिहास को मिथक बना दिया गया, तो फिर यह जरुरी नहीं कि उनका लिखा-कहा इतिहास सच हो. वह कुछ भी हो सकता हैं. ऐसा करने वाला व्यक्ति फिर कुछ भी कर सकता हैं. कुछ भी बोल सकता है. ये लोग शुरुआत में इस तरह के काम सम्मान देते हुए करते हैं. जिससे हम उनपर विश्वास करने लगे और गर्व करने लगे. लेकिन एकबार इतिहास को मिथक में बदले जाने के बाद यह सभी के लिए खुला हो जाता हैं और फिर लोग इसमें किसी भी तरह से छेड़छाड़ करना शुरू कर देते हैं. हमारी सबसे बड़ी दुविधा यह है कि उपाय ढूंढने से पहले हमें पता ही नहीं कि समस्या क्या है? हमें लगने लगता हैं की यह सब जो हो रहा हैं वह हमारे धर्म के लिए, हमारे इतिहास के लिए बहुत ही अच्छा हैं. लेकिन ऐसा नहीं हैं. ”
इन्टरनेट पर देवदत्त पटनायक के बारे में जानकारी खंगालने पर एक नाम उनके साथ बहुत सी जगह पाया गया. वह था वेंडी डोंगियर. मोटा-मोटी पढने में आ रहा हैं कि देवदत्त पटनायक वेंडी डोंगियर को फॉलो करते हैं. यानी चेले हैं उनके. पटनायक का काम और सोच वेंडी से ही इंस्पायर्ड है. वेंडी के नाम को पहली बार पढने वालो को मैं बता देता चाहता हूँ कि यह वही महिला हैं जिसने अपनी किताबों के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं पर बेहद अभद्र एवं अश्लील टिप्पणियां की हैं और हिन्दुओं के दामन पर कीचड़ उछालने पर कोई कसर बाकी नहीं रखी हैं.
‘भगवान भक्तों का बलात्कार करता हैं’, ‘राजा दशरथ सेक्स के लिए बावले थे’, ‘गाँधी ने मरने के वक्त “हे राम” नहीं “राम रहीम” कहा था’, ‘वेद हिंसा को स्वीकार करते हैं’ – हिन्दू धर्म पर लांछन लगाने के मामले में वेंडी डोंगियर के ये सबसे कमतर विचार हैं जिसको मैं यहाँ लिख पा रहा हूँ वरना उसके उच्च विचारों को अपने हाथो से लिखना भी हिन्दू धर्म को शर्मसार करने जैसा है. लेकिन इतना कुछ होते हुए भी वेंडी कहती हैं कि “मुझे हिन्दू धर्म पसंद हैं”. वहीं देवदत्त पटनायक उनकी किताबो को बैन करने के लिए प्रदर्शनों और फैसले का विरोध करते हैं. ऐसा याराना और कहाँ मिलेगा!

हिन्दू धर्म और भारत के इतिहास पर थूक कर चाट जाने की यह जो कला हैं वह वेंडी डोंगियर और देवदत्त पटनायक दोनों में एक सी है और यही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता हैं. जैसा कि राजीव मल्होत्रा कहते हैं, ये लोग पहले खुद को स्थापित करने के लिए किसी भी विवाद के बिना लिखना शुरू करते हैं और एक बार जब लोगों का विश्वास जीत लेते हैं, तो अपना असली रंग दिखाना शुरू कर देते हैं. बदलते रंगों की इस कड़ी का एक जीता जागता उदाहरण देवदत्त पटनायक का डेलीओ में प्रकशित वह आर्टिकल हैं जहाँ उसने हिन्दू धर्म को ‘अहिंसक आतंकवाद’ का बुरका पहनाना चाहा. इस आर्टिकल में देवदत्त ने बड़ी चालाकी से हिन्दुओं और जैन धर्मावलम्बियों के बीच फूट डालने की कोशिश करते हुआ लिखा कि, “यह विडंबना ही हैं कि हिंदुत्व के नाम पर जैन धर्म के सशक्त रूप और आतंकवादी ब्राह्मणवाद बीच की लकीर धुंधली हो रही है.” गौर कीजियेगा आतंकवादी ब्राह्मणवाद ! कथित पौराणिक कथाकार कब एक जातिवाद के घटिया एजेंडे में उतर जायेगा और सनातन धर्म ने ब्रह्म तत्व को ना समझ कर ब्राह्मणों को कोसेगा तो इससे ज्यादा सांप्रदायिक कौन होगा !
और तो और, देवदत्त पटनायक ने हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में जो कुछ भी किताबें लिखी हैं उसमे कुछ भी नया नहीं है. बस जैसा कि हमने पहले ही कहा है, धार्मिक ग्रंथों को यहाँ वहाँ से उठा कर चटपटी खिचड़ी तैयार की गई है और उसे अंग्रेजी में पोत दिया गया हैं. जिसके बलबूते पर वह सोनम कपूर जैसे लोगो के लिए हिन्दू धर्म का टीचर बन जाता हैं और आध्यात्मिक गुरुओं के सामने रैफर भी किया जाता है. इस नौटंकी की वाकई दाद देनी पड़ेगी !
सोनम कपूर को मालूम नहीं होगा लेकिन देवदत्त पटनायक के हिन्दू धर्म सम्बंधित वैज्ञानिक और तर्कसंगत ज्ञान बाँटते जिन वीडियोज को देख कर वह प्रभावित हुई हैं, इस तरह का विशेष ज्ञान बहुत पहले ही लिखा जा चुका हैं, समझाया जा चुका है और वह भी सैकड़ों बार, सैकड़ों लेखको द्वारा, सैकड़ों वक्ताओं द्वारा. बस फर्क था कि उनकी भाषा देसी हुआ करती थी, लिबास भी ज्यादातर भगवा हुआ करता था, उनके नामो के आगे-पीछे कहीं पंडित, आचार्य, स्वामी जैसे अलंकार हुआ करते थे और वे लोग ‘ज्ञान बाँटने से बढ़ता हैं’ इस मंत्र के साथ लोगो के बीच जाते थे. देवदत्त पटनायक की तरह प्रोपगेंडा नहीं चलाते थे. उनको न फेम की लालसा थी न ही पैसों की लिप्सा. तभी वे कभी लाईम-लाईट में नहीं आए और उसका फायदा देवदत्त पटनायक जैसे लोग उठा रहें हैं. उन्हीं ग्रंथों के ज्ञान को, किताबों, तर्कों, ज्ञान को अपना बता कर हीरो बन रहें हैं, पैसे छाप रहें हैं, लोगो को प्रोपगेन्डा का शिकार बना रहें हैं और हिन्दू संस्कृति के नियो-कॉन्ट्रैक्टर्स बन गए है.


तो मैं अपने पाठकों से उम्मीद करूँगा कि वे देवदत्त पटनायक के प्रोपगेंडा को समझें और उसे हिन्दू संस्कृति का नियों-कांट्रेक्टर बनाने से पहले उन किताबों के पन्नों को भी उलट लें जो बहुत सस्ते दामों में उपलब्ध हैं और किसी समझदार के हाथों लिखी हैं.


