ये वो हैं जो 26/11 की उस घटना से आपको रूबरू करवा रहे थे. एक एक मिनट की रिपोर्ट दे रहे थे, ये वहां के हालत और बचाव ऑपरेशन की पूरी जानकारी दे रहे थे.
ये सच में उस समय कोई राष्ट्रीय हित या कोई सामाजिक हित का काम नहीं कर रहे थे. न हीं मुंबई और देश की जनता में किसी तरह की जागरूकता या सतर्कता फैला रहे थे. हकीकत कहें तो उस समय ये बस अपनी टीआरपी बढ़ा रहे थे. टीआरपी की दौड़ में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की रेस कर रहे थे. ये बात टीवी न्यूज़ चैनल्स के बारे में है. जो उस घटना की लाइव रिपोर्टिंग कर रहे थे और आतंकियों की मदद कर रहे थे. इनकी संवेदना तब तो बिलकुल मर जाती है जब इनके सामने लाशें बिखरी हों वो वक्त इनका संवेदना जुटाने का नहीं सुर्खियाँ बटोरने व सनसनी बनाने का होता है.
कुछ टीवी चैनल्स 26/11 के उस हमले के दिन लाइव रिपोर्टिंग कर गैर जिम्मेदारी का परिचय दे रहे थे. उस दिन वो अपने दर्शकों को जानकारी नहीं दे रहे थे बल्कि पाकिस्तान में आतंक के हैडक्वाटर में बैठे हमलावरों के सहयोगियों को भी पूरे ऑपरेशन की जानकारी दे रहे थे. जिससे मुंबई में छुपे हमलावरों की मदद हो रही थी और वो पुलिस की पकड़ से खुद को बचा पा रहे थे. NSG कमांडोज और पुलिस के ऑपरेशन की पूरी जानकारी लाइव टीवी पर दिखाई जा रही थी. जिससे ये ऑपरेशन मुश्किल होता जा रहा था. आतंकी खुद का आसानी से बचाव कर पा रहे थे.







26/11/2008 हुए इस हमले में 166 लोगों की मौत हुई थी और आतंकियों को पकड़ने के लिए चलाये ओपरेशन में 10 से ज्यादा होनहार ऑफिसरों, कमांडो, और मुंबई पुलिस के सिपाही शहीद हुए. हमारा मीडिया अपनी स्वतन्त्रता का कितना गलत उपयोग करता है इससे बेहतर कोई उदाहरण नहीं है. इनकी सनसनी के चलते हमारे कई सिपाही शहीद हो गये. ये चैनल्स उन हमलावरों से कम गुनहगार नहीं है. टीवी चैनल्स के इस घृणित मोडस ऑपरेंडी की निंदा सुप्रीम कोर्ट ने तो फटकार लगाकर की.
2012 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस हमले के मुख्य आरोपी कसाब पर फैसला सुनते वक्त मीडिया की गैरजिम्मेदार भूमिका पर भयंकर लताड़ लगाई. जस्टिस आफ़ताब आलम और जस्टिस सी. के. की बैंच ने कहा की संविधान की धारा 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान है लेकिन उसके साथ कुछ जरुरी प्रतिबंध का भी है. जब आपकी अभिवक्ति की आजादी संविधान की धारा 21 के तहत जीवन जीने की आजादी को खतरे में डालने का काम करे, तब आपकी बोलने की आजादी पर प्रतिबंध होना चाहिये.
ऐसे मौकों पर मीडिया की लाइव रिपोर्टिंग और उनके बहादुर कैमरा मैन और रिपोर्टर की बहादुरी वैसी ही होती है. जैसी कसाब और उसके साथी आतंकियों की हिमाकत . कुछ तो कोर्ट के इतना कहने के बाद भी नहीं सुधरते और आगे भी आतंकी हमलों के दौरान वही भूमिका निभाना जारी रखते हैं. पिछले साल पठानकोट में हुए आतंकी हमले के दौरान आर्मी की और से चले ओपरेशन की फिर से लाइव रिपोर्टिंग की गई. और तो और आर्मी की सारी एक्टिविटी लाइव बताई जा रही थी. इस बार पठानकोट से आजाद मीडिया एनडीटीवी लाइव था. “सेना के हैलीकॉप्टर उड़ चुके हैं, गोला बारूद का गोदाम लेफ्ट में है, कमांडो पीछे के गेट से बेस में घुस चुके हैं.” इस तरह की खतरनाक रिपोर्टिंग देख लगता है, जैसे इन घटनाओं को अंजाम देने में ये आजादी मीडिया पूरी भूमिका निभाते हैं.
इसके लिए एनडीटीवी पर एक दिन के बैन की घोषणा भी हुई पर देश की ‘फ्रीडम ऑफ़ प्रेस’ ब्रिगेड के आगे हार मान कर सरकार ने बैन इस्थगित कर दिया.
आज 26 नवम्बर को हम उन जान गंवाने वाले नागरिकों, शहीदों को याद कर रहे है जो उस दिन आतंकियों के हमले में मारे गये.
लेकिन हमें उस पाकिस्तान को और उन आतंकियों को भी नहीं भूलना है जिन्होंने इस हमले को अंजाम दिया, और साथ ही पाकिस्तान की पैरवी करने वाले और आतंकियों की मौत पर आंसू बहाने वाले उन पत्रकारों और मीडिया चैनल्स को भी नहीं भूलना चाहिये. इनके प्रति गुस्सा ही देश को आतंकवाद और देश को तोड़ने की साजिश के खिलाफ लड़ने की ताकत देता है.


