बात 16 दिसम्बर, 2012 की है, आप सभी लोग उस लड़की से भलीभांति परिचित हैं जिसका नाम था निर्भया। उस बेचारी लड़की के साथ 5 जल्लादों ने बेरहमी से बलात्कार किया और…..वह घटना आज भी हमारी आत्मा को झकझोर कर रख देती है। उस समय हमारी मीडिया का काम काफी सराहनीय रहा, दिन-रात उस घटना को लोगों तक पहुँचाया और उस मामले में त्वरित कार्यवाही के लिए सरकार और कानूनी संस्थाओं को विवश भी किया, हालाँकि यह बात अलग है कि उस मामले में भी फैसला काफी देर से आया। उस समय देखकर खुशी हुई कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मजबूत हो रहा है…..परन्तु बहुतेरे मामले ऐसे रहे हैं, जिनमें मीडिया बौराई हुई कहीं “तैमूर नामा” तो कहीं ‘विराट और अनुष्का की शादी के रिसेप्शन’ की वीडियोग्राफी करती नजर आई….यह दो वाकये मुझे याद आ गए, ऐसे सैकड़ों हैं।

देश के हृदय प्रदेश, मध्यप्रदेश में हाल ही में 85 फ़ास्ट ट्रेक अदालतें बनाई गई हैं। ये अदालतें बलात्कार से जुड़े मामलों को जल्द से जल्द निपटाने में कारगर हैं। इस कड़ी में वांछित परिणाम मिलने शुरू हो गए हैं। इससे राज्य सरकार की निकम्मेपन वाली जो छवि पिछले कुछ सालों में बनी, दूर होगी। 2 महीने पहले, 31 अक्टूबर की रात भोपाल में हुई बलात्कार की घटना के चारों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।

 

 

ऐसा ही एक वाकया रतलाम से भी आया है….जिसमें 14 साल की लड़की के साथ जोर ज़बरदस्ती और प्रताड़ित करने के मामले में आरोपियों (सद्दाम और उसका दोस्त) को जीवनपर्यंत कारावास और अर्थदण्ड की सजा दी गई। ऐसे ही न्यायिक मजबूती के कई सारे प्रकरण पिछले कुछ महीनों में आये….

ये फैसले कहीं न कहीं जन-मानस के मन में एक उम्मीद जगाने वाला है और इस तरह के प्रयासों की खुले मन से प्रशंसा होनी चाहिए। इस तरह के कदम अपराधियों में भय बनायेंगे तथा आपराधिक घटनाओं में कमी आएगी। ऐसे और मामले आपको कानूनी इतिहास में देखने को नहीं मिलेंगे जिसमें दोषियों को इतनी जल्दी और कठोरतम सजा दी गयी हो। परन्तु हमारी मीडिया ने इन फैसलों को जनता को दिखाना शायद उचित नहीं समझा या हो सकता है कि यह खबर उस लेवल की नहीं, जिस लेवल की खबर ‘योगी आदित्यनाथ क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं…..’ या ‘जायरा वसीम का फर्जी वीडियो’!

देश का तथाकथित मीडिया, तथाकथित इसलिए कि ये अपना काम ईमानदारी से नहीं करते। या यूँ कहें कि पत्रकारिता की परिभाषा को बिल्कुल भी चरितार्थ नहीं करते। किसी एक विषय को लेकर पत्रकारों का रवैया या तो समर्थन में होगा या विरोध….ये शुरुआत से ही अपना दिमाग तैयार कर लेते हैं कि यह मुद्दा सही है या गलत है, बस फिर क्या…उसी धारणा पर चलते-चलते मीलाड बनने की कोशिश करते रहते हैं। खबर नहीं दिखाते, खबर बनाते हैं….दरअसल बात जे है कि हमाये देश को मीडिया कछू जादा ई भावनात्मक होए जात है कबहूँ-कबहूँ, और कबहूँ-कबहूँ तो इनकी आत्मा है जौन ससुर, मर जात है।

एक समय था जब हमारी तथाकथित मीडिया मध्यप्रदेश को ‘बलात्कार का प्रदेश’ साबित करने पर आमादा थी, ऐसा लग रहा था कि मानो इन पत्रकारों की आत्माएं सच में इस तरह के मामलों से क्षुब्ध हैं….मैं इस तरह के मामलों को उठाने या सरकार को घेरने का विरोधी नहीं हूँ, बल्कि पत्रकारिता में एक सन्तुलन का पैरोकार हूँ। ये बात सही है कि मध्यप्रदेश में बलात्कार की घटनाओं के आंकड़े रूह को कंपा देने वाले हैं, और यह बात भी सही है कि मध्यप्रदेश सरकार इन मामलों में काफी देर से जागी। परन्तु अब जबकि सरकार ने कानूनों को अमलीजामा पहनाना शुरू किया है और इन कानूनों से वांछित परिणाम भी आने लगे हैं तो सरकार के इन कदमों की सराहना भी होनी चाहिए।

जब भी मध्यप्रदेश में कोई बलात्कार हुआ, हमारे देश की ‘दलाल स्ट्रीट ऑफ मीडिया’ ने मध्यप्रदेश सरकार को तो घेरा ही बल्कि मध्यप्रदेश की भूमि को भी बलात्कारियों की भूमि साबित करने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। हमने कई मीडिया नेटवर्क के Prime Shows में ‘मध्यप्रदेश बलात्कार के मामलों’ को स्थान पाते और उन्हें काफी समय खपाते देखा है, परन्तु इतने सख्त कानून और त्वरित कार्यवाही की इतनी घटनाओं के बावजूद हमारा मीडिया “तैमूर” को राष्ट्रीय धरोहर बनाने में व्यस्त है। अब जबकि सरकार की मंशा ऐसे मामलों को लेेेकर साफ है तो क्या हम हमारी तथाकथित मीडिया सेे यह उम्मीद रख सकते हैं कि वह ईमानदारी से इन खबरों को उचित स्थान दे।

 


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