हमारे लोकतंत्र के लिए ‘न्यूज लिटरेसी’ चाँद पर जाने के ख्वाब जैसी


इंटरनेट मीडिया और जिम्मेदारियों का अभाव

आज आलम यह है कि न्यूज इकठ्ठा करने और ऑडियंस तक पहुंचाने की प्रोसेस ‘रिवर्स ड्रेन’ में तब्दील हुई है. मेन-स्ट्रीम मीडिया से निर्भरता विस्थापित होकर ‘गैजेट’ वाली पत्रकारिता पर आ गयी है.

लगभग एक दशक होने के चला है, जब से लोकतंत्र का पाँचवे खम्भे के रूप में पल्लवित ‘डिजिटल जर्नलिस्म’ या यूं कहे इंटरनेट मीडिया ने हमारे न्यूज रूटीन में पैर पसारा है. खबरों के बाजार जगत के उस सामंती दौर में जहां इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया गुरुर के साथ ‘एलियन धरती पर आकर गायों का दूध पीने’ से लेकर ‘भूत-चुड़ैल’, सेक्स, ड्रामा और सनसनी के नाम पर या फिर खास सूत्रों के हवाले से और सहूलियत की ग्राउंड रिपोर्टिंग से ‘नैरेटिव’ से भरे कटेंट के बोझ को हम पर लाद कर ‘डेमोक्रसी, एक्सप्रेशंस और फ्री प्रेस’ का डंका बजाये फिरते थे, फिर डिजिटल जर्नलिज्म / इंटरनेट मीडिया ने ‘गरीब’ ऑडियंस को बलवान बनाकर एक सुपर हीरो की तरह हमें मुक्ति दिलायी थी. असीम विस्तार से भरे हर तरीके के कंटेंट के लिए समावेशी फॉर्मेट पर, फेसबुक और ट्वीटर जैसे पावर पैक्ड सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ खबर परोसने वाले और पढ़ने वालों के बीच संवाद की ‘टू-वे’ अप्रोच पर आधारित प्रतिक्रिया जन्य इस मीडिया में दररोज पैदा होते नए ब्लॉग्स, न्यूज-वेबसाइट्स, माइक्रो-ब्लॉगिंग और ‘ऐवरी वन कैन बी अ रिपोर्टर’ की तर्ज पर वीडियोज की भरमार ने मेन स्ट्रीम की पत्रकारिता की दीवार को धक्का देकर गिरा दिया है. आज आलम यह है कि न्यूज इकठ्ठा करने और ऑडियंस तक पहुंचाने की प्रोसेस ‘रिवर्स ड्रेन’ में तब्दील हुई है. मेन-स्ट्रीम मीडिया से निर्भरता विस्थापित होकर ‘गैजेट’ वाली पत्रकारिता पर आ गयी है. इस इंटरनेट मीडिया ने खबरों के तंत्र में समायी हुई अनियमितताओं और अंधे भेड़ चलन पर लगाम कसने वाले ‘वॉच डॉग्स’ की भूमिका बखूबी निभायी है. इसकी सीधी पड़ताल इंटरनेट मीडिया में लगातार हो रहे इन्वेस्टमेंट को देखकर और मेन स्ट्रीम मीडिया द्वारा अपने ऑपरेशन सेटअप्स को इंटरनेट मीडिया की जरुरत के हिसाब से तैयार रखने से की जा सकती है.

इंटरनेट मीडिया का एक बड़ा मार्केट भारत में उभरा है 

आंकड़ों के लिहाज से, 2017 के अंत तक 73 करोड़ से भी ज्यादा स्मार्ट फ़ोन यूजर्स थे भारत में और ये संख्या 16 % की दर से दुनिया में सबसे तेज रफ़्तार से बढ़ते हुए 2019 के अंत तक 81 करोड़ के आकंड़े को छू जाएगी. मतलब सेटटॉप बॉक्स के जरिये टी.आर.पी बटोरने के लिए टीवी कनेक्शंस को मत गिनिए, स्क्रीन्स की संख्या  को गिनिए जहां यूजर निजी तौर पर कंटेंट देखेगा. यही बढ़ोतरी भारत में इंटरनेट उपभोग की भी हैं, यह 65 प्रतिशत अर्बन और 18 प्रतिशत रूरल आबादी तक पहुँच बना चुका है. उस पर भी जिओ आने के बाद टेलीकॉम कंपनियों के बीच सस्ती दरों पर डाटा उपलब्ध कराने को लेकर मचे घमासान के नतीजन बाढ़ आयी हुई है. कुल मिलाकर आज इंटरनेट मीडिया लगभग $1447 मिलियन डॉलर की इंडस्ट्री के तौर पर उभर चुका है.

बेशक इस इंटरनेट मीडिया ने टीवी और अख़बारों के कंज्यूमर्स को अपनी ओर शिफ्ट किया है. इस शिफ्ट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई वो चीजें है- पहला तो ‘सम्पादकीय एजेंडा’ और दूसरी ‘मीडिया इंडस्ट्री को विज्ञापन के जरिये मिलने वाली आय’. सम्पादकीय एजेंडा को लेकर तो भारत में एक विकट स्थिति उत्पन्न हुई है. भारत में इंटरनेट मीडिया का उदय मेन स्ट्रीम मीडिया के विरोध से हुआ है, इसका एक बड़ा कारण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अपने शैशव अवस्था से यौवन तक के दो दशक में ‘भ्रष्ट’, ‘पेड़’, ‘बायस्ड’ आदि प्रचलित रूप में ऑडियंस पर खूब वैचारिक अत्याचार करना है और इसी की तरदीद के लिए ऑडियंस का गुस्सा इंटरनेट मीडिया से जाहिर हुआ. इसके चलते मेन स्ट्रीम मीडिया के सम्पादकीय एकाधिकार को समाप्त कर एक अलग तरीके के सम्पादकीय एजेंडा का निर्माण हुआ जोकि वैकल्पिक न्यूज, खंडन और प्रतिक्रिया से भरा नजर आने लगा और इस तरीके के सम्पादकीय एजेंडा की कमान परिभाषित ‘स्कूल ऑफ़ जर्नलिस्म’ से निकलकर मोटेतौर पर सामान्य ऑडियंस और इंटरनेट यूजर्स के हाथ में आयी क्यूंकि खुल कर बोलने और लिखने के प्लेटफॉर्म्स खड़े जो हो गए, सोशल मीडिया का सहारा मिला. और आज हजारों की तादाद में हरेक के पोर्टल्स, यू ट्यूब चैनल्स और ब्लॉग्स की भरमार हो गयी है. दूसरी बात, इस बढ़ते हुए मार्केट में ऑडियंस की भरपूर संख्या ने आमदनी के लिए ‘बढ़िया एड रेवेन्यू’ सुलभ कराया है जिसके चलते ऑडियंस की घटती संख्या के मद्देनजर विज्ञापनदाताओं के जेहन में  ‘मेन स्ट्रीम मीडिया के खर्चीले विज्ञापनों, खासकर प्रिंट मीडिया पर क्यूँ खर्च किया जाये?’ की अवधारणा मजबूत हुई है. वेस्टर्न प्रिंट मीडिया में तो विज्ञापन के जरिये मिलने वाली आय का डिजिटल पर शिफ्ट होने का खतरा साफ झलका है. क्यूंकि वहां के अखबारों और जर्नल्स के पाठकों की संख्या भारत के सस्ते दामों पर मिलने वाले करोड़ों पाठकों वाले अखबारों के मुकाबले काफी कम है और इस नुकसान की भरपाई के लिए अख़बारों ने अपने कटेंट के डिजिटल एक्सेस के लिए ‘पे वॉल’ खड़े कर दिये हैं या फिर ‘क्राउड फंडिंग’ वाले डोनेशन वाले मॉडल पर चले गए हैं, गार्जियन यूके की हालिया ‘एडिटोरिअल अपील’ को इसके लिए सुना जा सकता है.

फेक न्यूज : इंटरनेट मीडिया का विषैला ‘बाई-प्रॉडक्ट

जैसा कि हम ऊपर चर्चा कर चुके हैं कि किस तरह से इंटरनेट मीडिया ने ‘सम्पादकीय एजेंडे’ को प्रभावित किया है? कुछ भी बोलने, लिखने की आज़ादी यूजर्स के हाथ में होने से इंटरनेट मीडिया के बेलगाम ‘सम्पादकीय एजेंडे’ से पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की वो जबाबदेही और जिम्मेदारी नदारद है जो कि एक हद तक परिभाषित ‘स्कूल ऑफ़ जर्नलिस्म’ से निकले हुए सम्पादकीय एजेंडे की हुआ करती है. इस माध्यम के कुछ अभ्यर्थियों को छोड़ दिया जाये तो इंटरनेट मीडिया का सम्पादकीय एजेंडा मिस लीडिंग कंटेंट, फेक न्यूज, अफवाह, राजनैतिक पार्टियों के लिए तरफ़दारी और विचारधाराओं की ओछी लड़ाईयों और प्रोपगेंडा में बँटकर एक खतरा बनकर उभरा है. जानकारों के मुताबिक फेक न्यूज के इस सिंड्रोम ने तो अमेरिका और यूरोप में लोकतंत्र और चुनावों को प्रभावित करने का ऐसा ‘ट्रॉमा क्रिएट’ किया जिसके बाद से जिम्मेदार मीडिया संस्थान, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और विकीपीडिया ‘फेकन्यूज’ को काउंटर करने के लिए तकनीकी निर्माण करने के लिए बाध्य हो रहे हैं. भारत में भी फेक न्यूज से लींचिंग और सामजिक तनाव की घटनाएं बखूबी देखने को मिल रही हैं. लेकिन हिंसक घटनों के सबक के लिए फेक न्यूज के विरोध में दुनियाभर से आवाज उठ रही है. ऐसा नहीं है कि ये खतरा इंटरनेट मीडिया आने के पहले मेन स्ट्रीम मीडिया के साथ नहीं हुआ करता था, बिलकुल ये उस समय भी रहा है लेकिन जो तब दस गुना था वो आज सौ गुना हुआ है और अब इस खतरे को हजार गुना करने के लिए लगातार और तेजी बढ़ रहे ऑडियंस के इजाफे को समझ कर, मेन स्ट्रीम मीडिया संचालित कर रहे कमर्शियल मीडिया घराने भी प्रोपगेंडा की प्रतिद्वंदिता पर उतर आए हैं उस मुनाफे की जमीन को दोबारा हथियाने जिसे आम ऑडियंस ने उनके पैरो के नीचे से खींचा था. मतलब ये इंटरनेट डेमोक्रेसी की स्थिति उसी मार्केट शेयर की तरफ लौट रही है जो मेन स्ट्रीम मीडिया में कायम है और चंद रसूखदारों के हाथों से संचालित होती है. कहने को एक बड़ा खतरा सामने खड़ा है.

‘न्यूज लिटरेसी’ की जिम्मेदारी कौन लेगा?

इंटरनेट मीडिया की इकोसिस्टम में ओपिनियन का धंधा बखूबी चला हुआ है. एक लगातार उठ रहे मुद्दे में विभिन्न समय पर आए ‘न्यूज ब्रेक्स’, ‘न्यू डेवलपमेंट्स’ को अपनी सहूलियत के अनुसार ट्विस्ट कर प्रसारित करना और उसे कम या ज्यादा जोर देकर कवरेज और कैम्पेन करना एक एडिटोरियल प्रैक्टिस का हिस्सा है जिसे आज इस मीडियम में बड़े स्तर पर अपनाया गया है. उदाहरण के लिए राफेल डील पर कवरेज को ही देख लिया जाए. मुद्दे की ‘बैक डोर एंट्री’, बाद में समय समय पर किसी डेवलपमेंट को खास जोर देकर और किसी डेवलपमेंट को इग्नोर कर फैक्ट और आरोपों की ऐसी खिचड़ी पकाई है जिसे सामान्य ऑडियंस को समझने के लिए घंटों की क्लास लेनी होगी. दूसरी तरफ ऑडियंस न्यूज सॉर्स जाँचने, फैक्ट चैक करने और फेक न्यूज को जज कर पाने में विफल रह रहे हैं. इस भयावह स्थिति के कारण एक आम ऑडियंस बिल्कुल ‘न्यूज ईललिटरेट’ है. हिंदुस्तान में मीडिया संस्थानों ने ‘न्यूज लिटरेसी’ को गैर-जरूरी चीज समझा है बजाय इसके, ऑडियंस को मुफ्त या सस्ती दरों पर न्यूज उपलब्ध होने की लत को ही बढ़ावा दिया है. इसके उलट, जब यूनाइटेड स्टेट्स में सर्च इंजन और सोशल मीडिया पर भरोसे में हो रही लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, ऐसे में वेस्टर्न मीडिया ने न्यूज लिटरेसी को बढ़ावा देने के, सिटिजंस के लिए न्यूज के मायने समझाने, बेलेन्स कवरेज या दोनों पक्षों को शुमार करते हुए न्यूज को परखने के लिए ऑडियंस के लिए अपने चार्टर्स और संहिताओं के निर्माण के प्रोजेक्ट्स को वरीयता देना पहले से ही शुरू कर दिया है, जो फेक न्यूज जैसे बाई-प्रोडक्ट पर लगाम लगाने की दिशा में बढ़िया कदम है. यहाँ भारत में, मीडिया के पैगम्बर देश के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में बहुत पीछे होने की दुहाई तो देते रहते हैं, लेकिन ‘न्यूज लिटरेसी’ को बढ़ावा देने के दायित्व से कोसों दूर भागते हैं. प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में ऊपर के पायदानों पर काबिज देशों के मीडिया संस्थानों ने ऑडियंस की ‘न्यूज लिटरेसी’ को काफी गंभीरता से लिया है. लेकिन भारत जैसे खबरों के बड़े मार्केट में ‘न्यूज लिटरेसी’ तो छोड़िए, लिटरेसी का ही टोटा है, इसलिए हमारे लोकतंत्र के लिए ‘न्यूज लिटरेसी’ चाँद पर जाने के ख्वाब जैसी हैं!


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