स्त्रीत्व, नारीवाद या फेमिनिज्म का परचम थामे हमारी कथित संभ्रांत महिलाएं इस फेर में उलझ कर वो ओछी हरकत कर देती हैं, जिसके लिए वे एक आम समाज को ‘योनिकेन्द्रित मानसिकता’ का दोषी तो ठहराती हैं लेकिन ठीक दूसरी तरफ ‘योनिकेन्द्रित मानसिकता’ को खुद खुले तौर पर अभिव्यक्ति करती हैं. इस समाज की मानसिकता को बदलने से पहले दोहरेपन को बदलना खासा जरूरी है, क्यूँ कि समाज का एक बड़ा तबका उनकी इस ओछे, जाहिलपन से कहीं बेहतर अवस्था एक स्त्री को मुहैय्या कराता है. जिसको यदि स्वरा भास्कर गाली दे रही हैं तो खुद अपनी खिल्ली उड़वा रही हैं. 

सिलसिलेवार हुई पिछले दिनों की कुछ घटनाओं ने स्त्रीत्व की अवस्था को लेकर एक नयी बहस को जन्म दे दिया है. यदि राज्य के लोगों के लिए सम्मानीय शासिका ‘रानी पद्मावती’  यदि स्त्री होने की गरिमा के साथ कोई समझौता न करे, अपनी इज्जत के भूखे भेड़ियों द्वारा ब्रिकी लागू होने से बचाने के लिए ये जौहर का ऐसा रास्ता चुने तो क्या यह चुनाव स्त्रीत्व की मजबूत अवस्था नहीं है? तो स्त्रीत्व की मजबूत अवस्था क्या इसे मानें कि एक पोर्न अदाकारा का पदार्पण से इस सोच पर वजन दें और कहें कि संसार में स्त्री के कामुक शरीर और गुप्तांगो से कोई सुन्दर जगह संसार में नहीं है जहाँ मनस्वी सुकून पाया जा सके. या फिर स्त्रीत्व की मजबूत अवस्था इसे मानें कि अमृता अरोड़ा एक यौनांग की आकृति वाले पार्टी केक से भौंडेपन को प्रदर्शित करें.

स्वरा भास्कर ने कहा कि ‘पद्मावत’ देखने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि वह एक महिला के तौर पर ‘योनी’ तक सिकुड़ गयी हैं. उन्होंने संजय लीला भंसाली को कटघरे में रखकर कहा कि यह फिल्म महिलाओं की उपलब्धियों को कमतर आंकती है। आपने बगैर सोचे-समझे इस पुरुषों के वर्चस्व वाली आपराधिक प्रथा को जिस तरह महिमामंडित किया है, उस पर आपको जवाब देना चाहिए सर। टिकट खरीदकर आपकी फिल्म देखने वाली दर्शक होने के नाते मुझे आपसे पूछने का हक है कि आपने यह कैसे किया और क्यों किया?’’



स्त्रीत्व की अवस्था को मजबूत करने के लिए स्वरा भास्कर का तर्क यदि पुरुषों का कल्पित वर्चस्व के जबाब में यदि विरक्त भौंडेपन या फिर अक्षुण्ण यौनांगों की खुली नुमाइश से ही किया जा सकता है तो बताइये पद्मावत से ज्यादा आप स्वत: योनि केंद्रित हैं या नहीं? क्या कथित संभ्रांत महिलाये इसी योनि केंद्रित सोच की परमपोषक नहीं हैं? 

लेकिन फिर भी यहाँ जिक्र करना चाहते हैं पण्डित जी का, पण्डित जी चन्द्रशेखर आजाद! कहा जाता है कि उस समय देश के शीर्ष नेता रहे, हम उनका नाम यहाँ उल्लेखित नहीं करेंगे, ने अल्फ्रेड पार्क में पण्डित जी के होने की मुखबरी अंग्रेजों से कर दी. आजाद चारों तरफ से घेर लिए गए, बच निकलने का कोई तरीका नहीं, गोलियाँ जब तक थीं, लड़े. जब एक ही गोली बची तो उन्होंने खुद पर खर्च करना मुनासिब समझा, क्योंकि वे जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आना चाहते थे. इसका कारण यह था कि उन्हें अपनी जान से अधिक अपना स्वाभिमान और आत्मसम्मान प्रिय था, आज़ाद रहने की कसम खायी थी!

स्वरा भास्कर को बताना चाहते हैं कि ‘सती’ और ‘जौहर’ दो अलग-अलग रीतियाँ हैं. आप ‘सती’ प्रथा का विरोध कर सकती हैं क्योंकि यह समाज द्वारा थोपी गयी रीति थी, परन्तु जौहर तो उस युग में भी महिला सशक्तिकरण का परिचायक था. जौहर के कम ही उदाहरण इतिहास में पढ़ने और सुनने को मिलेंगे. इसे थोड़े विस्तृत ढंग में समझते हैं – कोई आक्रमणकारी जो बहसीपन के चरम पर है, बाहुबल से आपके राज्य की सेना को पराजित कर दिया गया है, आपके सामने खड़ा है और आपको विवश कर रहा है उसकी ‘रखैल’ बनने के लिए…..स्वरा जी, आप ‘रखैल’ शब्द समझती हैं? बर्बर, कामलोलुप, हिंसक और घिनौना शख्स, जिसका उद्देश्य सिर्फ आपका शारिरिक शोषण ही नहीं मानसिक यातनाएं देना भी है, आप जिस ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ झंडा लिए घूम रही हैं, सभी प्रकार की आजादियाँ चली जाती हैं तीसरी दुनिया में और आप जिस ‘जीवन जीने का अधिकार’ की बात करती हैं, क्या सोचती हैं कि किसी हत्यारे, सनकी और जाहिल इंसान के हरम में आपको यह आजादी दी जाएगी, शायद आपको दे दी जाए क्योंकि आप अति की बुद्धिमान जो ठहरी!

फिर एक रास्ता तो है जौहर का, जिसमें आप खुद को शारिरिक और मानसिक यातनाओं से बचाते हुए, ससम्मान अपनी देह त्याग देते हो. इसमें किसी प्रकार का सामाजिक दबाब नहीं होता, बल्कि होता है तो आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा. और दूसरा रास्ता होता है कि आप स्वयं को उस निर्दयी आक्रमणकारी के हाथों में सौंप दें, जो आपको सेक्स की चीज समझेगा, जी हाँ चीज। जिसे जब चाहे तब अपने हिसाब से उपभोग कर सके! आपको अपने धर्म को छोड़ दूसरा धर्म अपनाना पड़ेगा, अपने विचार छोड़ उसके विचारों से सहमत होना पड़ेगा और हाँ, उस पिशाच के हरम में आपको ट्विटर या द वायर भी नहीं मिलेंगे, जहाँ से बैठे-बैठे आप अपना ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का राग अलाप सकें!

स्वरा भास्कर के तर्क के मायने तो यही है कि आप ‘बलात्कारी’ को आमंत्रण दें और उसके लिए आप अपने इज्जत का गला ही क्यूँ ना घोंट लें? क्या ये बलात्कार को बढ़ावा देने वाली खुली छूट नहीं है पुरुषों के उस वर्चस्व के लिए जिसको आप चुनौती देने का दम्भ भरती हैं. बेशक बलात्कार का अभिशाप लिए जीना एक स्त्री के लिए मृत्यु सदृश्य है और एक विकसित समाज के लिए स्त्रीत्व का यह हनन कतई स्वीकार्य योग्य नहीं है लेकिन विकसित समाज में आप स्त्रीत्व की कौनसी अवस्था की आप हिमायती हैं ये आपके लेख से निकल नहीं आया? क्या आपकी चुप्पी अमृता अरोड़ा के भोंडे केक पर यही जाहिर करती है कि आप भी रामगोपाल वर्मा की ‘गॉड, सेक्स एंड ट्रुथ’ में दिखाए गए महिला चरित्र के चित्रण से सरोकार रखती हैं और रानी पद्मावती के जौहर से अधिक सम्मानजनक स्थिति उस फिल्म की पटकथा को मानती हैं? यदि हाँ, तो आठ सौ पहले के इतिहास को दकियानूसी ठहराकर अपने आप को इससे से पीछे के समय में धकेल सकती हैं जहाँ पुरुष सिर्फ घोडा तुल्य होकर समतुल्य मादा के हनन के लिए कामुक प्रतिस्पर्धा को सबसे बढ़कर समझता है और आपको ये सही और रोचक लगता है.



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ये इंडिया है….भौंडेपन के साथ मार्केटिंग की जाये तो प्रोडक्ट जल्दी बिकता है.


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