हाल ही में यूएस ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को बढ़ावा और घृणित या भेदभावपूर्ण सार्वजनिक स्पीच और चर्चाओं का विरोध करने के लिए 5 लाख डॉलर (करीब 3.24 करोड़ रूपये ) अनुदान की घोषणा की है. यू.एस. इस क्षेत्र में काम करने वाली एन जी ओ के द्वारा ये राशी खर्च करने चाहता है. इसके लिए गैर सरकारी संस्थाओं को आमंत्रित किया है. इसी के समान अनुदान की घोषणा यू.एस. ने श्रीलंका के लिए भी की है. मकसद समान है .
कुछ अख़बारों और मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो पिछले साल भारत में हुई कुछ हिंसक घटनाएँ जो गो मांस और गो तस्करी के चलते हुई. उनसे जुडी रिपोर्ट्स के आधार पर अमेरिका ने ऐसे आर्थिक अनुदान की घोषणा की है. उन घटनाओं में इसी तरह के एन जी ओ, मीडिया, मानवाधिकार संगठनों सेक्युलर दलों के सहयोग से जो सबसे चर्चित घटना रही, वो थी घर में गो मांस रखे होने की अफवाह के चलते अखलाख की हत्या की घटना, जो आज़म खान देश के प्रति सम्मान के चलते यूनाइटेड नेशंस तक पहुंची वो बात अलग है की पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश और केरल में हिन्दुओं पर हो रही हिंसा पर किसी का ध्यान नहीं गया. यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका द्वारा ह्यूमन राइट्स और रिलिजियस फ्रीडम के नाम पर भारत में दखलंदाजी करने के मंसूबे रखे हैं. इससे पहले भी भारत के कथित छद्मी एक्टिविस्ट्स के साझे में ख़राब ह्यूमन राइट्स और रिलिजियस इन्टॉलरेंस भरी छवि गढ़ने के लिए विभिन्न रिपोर्ट्स और बयानबाजी करता रहा है.
जैसा कि इस अनुदान के सम्बन्ध में जानकारी है, कि फण्ड अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सामाजिक अधिकारों और उनके संरक्षण के लिए दिया जा रहा है. अमेरिका की भारत को यह अनुदान देने में क्या रुची है, और वो भी गैर सरकारी संगठनों के माद्यम से, इसी तरह की विदेशी फंडिंग लेकर कई फर्जी एन जी ओ देश में धार्मिक आजादी, समरसता के “ये अधिकार-वो अधिकार” का शोर मचाकर माहौल गरम रखती हैं, और इन्हीं से लोग अपनी रोजी रोटी चलाते है. पिछले साल इसी तरह की 20000 एन जी ओ के लाइसेन्स FCRA के नियमों का उलंघन करते हुए विदेशी फण्ड जुटाने के कारण रद्द किये गये थे. अब अमेरिका इसी तरह के एन जी ओ को फिर से देश में सक्रिय कर गैर जरुरी मुद्दों के सहारे भारत पर दबाब बनाने की कोशिश कर रहा है. गौरतलब है कि ऐसे ही अमेरिकी दबाब के चलते अब फोर्ड फॉउंडेशन को “विदेश फंड लेने से पहले गृह मंत्रालय से अनुमति लेने” की लिस्ट से हटा दिया है, मतलब सीधे विदेशी चंदा लिया जा सकता है.
धार्मिक आजादी के मामले में खुद अमेरिका की सच्चाई दुनिया से छुपी नहीं है.
पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कितनी बदजुबानी हुई है इस्लाम और दूसरे धर्मों को लेकर। और इस बदजुबानी में सबसे आगे रहे खुद अमेरिकी राष्ट्रपति रहे. इससे पहले भी ओबामा शासन में खुले तौर पर डिसास्टर मैनेजमेंट के नाम पर कैथोलिक मिशनरीज के जरिये बड़े स्तर पर फंड भारत में धकेला गया है. हाल ही में, पिछले कुछ समय में इस भारतीयों के साथ सिलसिलेवार हिंसक घटनाये भी हुई हैं. हिन्दू मंदिरों पर हमले की घटनाएँ तो बदस्तूर जारी है. खुले मंच से मुस्लिमों पर पाबन्दी की बातें खूब हुई है. अमेरिका में रंग भेद की हिंसा से तो उनके अपने सदियों पीड़ित है. कुछ साल पहले ही मजहबी पहचान के चलते देश के पूर्व राष्ट्रपति श्री एपीजे अब्दुल कलाम के साथ अमेरिका में सिक्यूरिटी जाँच के नाम पर हुए दुर्व्यवहार की पूरी दुनिया को जानकारी है.
इसलिए पहले अपने घर को साफ करे और उसके बाद दूसरे की घर की गंदगी देखे, अमेरिका के लिए खास नसीहत.
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