जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री और अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं तब से यह माना जाता है कि इन दोनों की मर्जी के बिना पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता. लेकिन राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने प्रदेशाध्यक्ष के मुद्दे पर जिस तरह इन दोनों को चुनौती दी, उससे यह मिथक टूटता हुआ दिखाई दे रहा है.

गौरतलब है कि मोदी-शाह केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन वसुंधरा राजे ने इस पर वीटो लगा दिया. पार्टी नेतृत्व ने राजे को राजी करने के लिए ढाई महीने तक मशक्कत की, लेकिन वे टस से मस नहीं हुईं. अंत में मोदी-शाह को ही घुटने टेकने पड़े और मदन लाल सैनी राजस्थान में बीजेपी के नए कप्तान घोषित हुए.

इस पूरे घटनाचक्र को सरसरी तौर पर देखने से यही लगता है कि मोदी-शाह की जोड़ी वसुंधरा के हठ से हार गई, लेकिन क्या वाकई में ऐसा है. यदि इस पूरे घटनाक्रम के पटाक्षेप की कडिय़ों को जोड़ते हैं तो साफ हो जाता है कि बीजेपी नेतृत्व ने वसुंधरा के सामने अभी पूरी तरह से सरेंडर नहीं किया है. तो क्या मोदी-शाह मुख्यमंत्री राजे के पर कतरने के प्लान-बी पर काम कर रहे हैं?

इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले इस प्रकरण के आखिर में एंट्री लेने वाले एक शख्स के बारे में जानना जरूरी है. ये शख्स हैं बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद ओमप्रकाश माथुर. यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि माथुर के प्रधानमंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से कितने मधुर संबंध हैं. यह भी जगजाहिर है कि उनके और वसुंधरा के बीच में छत्तीस का आंकड़ा है.

ओमप्रकाश माथुर राजस्थान में भाजपा की कमान संभाल चुके हैं और सियासी गलियारों में यह चर्चा कई बार उछल चुकी है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा की जगह उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहता है. वसुंधरा का ललित मोदी प्रकरण में नाम आने के बाद तो चर्चा यहां तक चली कि पार्टी ने उन्हें कमान सौंपने का निर्णय ले लिया है, सिर्फ औपचारिक घोषणा होना बाकी है. हालांकि ऐसा हुआ नहीं.

राजस्थान में भाजपा की राजनीति में इतनी अहमियत रखने के बावजूद माथुर प्रदेशाध्यक्ष के मुद्दे पर मौन ही रहे. पिछले महीने के बीच में उनकी इस प्रकरण में एंट्री ही केंद्रीय नेतृत्व के प्लान-बी की पहली कड़ी है. दरअसल, 15 जून को जब अमित शाह और वसुंधरा के बीच बातचीत से मामला नहीं सुलझा तो राजे ने मोदी से मिलने का समय मांगा, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनका अप्वाइंटमेंट फिक्स करने की बजाय सूचना दी कि प्रधानमंत्री ने उन्हें ओमप्रकाश माथुर से मिलने के लिए कहा है.

वसुुंधरा कुछ ही मिनट में माथुर के सरकारी आवास पर पहुंच गईं, लेकिन वे डेढ़ घंटे बाद आए. जानकारी के मुताबिक इतनी देर तक माथुर प्रधानमंत्री कार्यालय में थे और वे जानबूझकर वहीं रुके रहे. सूत्रों के अनुसार वसुंधरा को लंबा इंतजार करवाने के पीछे उनका ‘ईगो हर्ट’ करने की रणनीति थी.

अंत में दोनों के बीच बातचीत हुई तो माथुर ने दो-टूक शब्दों में कह दिया कि यदि गजेंद्र सिंह शेखावत के नाम पर आप सहमत नहीं हैं तो आपकी ओर से सुझाए नामों पर पार्टी तैयार नहीं है. आखिर में यह तय हुआ कि पार्टी की ओर से नया नाम सुझाया जाएगा, जिस पर आपको सहमति देनी ही होगी.

सूत्रों के अनुसार माथुर ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह से चर्चा करने के बाद अपने खास मदन लाल सैनी का नाम वसुंधरा के सामने रखा. उन्होंने बिना देरी किए इस नाम को हरी झंडी दे दी. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि राजे ऐसे व्यक्ति को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के लिए कैसे राजी हो गईं जो माथुर के खास हैं.

इसका जवाब जानने के लिए यह जानना जरूरी है कि वसुंधरा ने गजेंद्र सिंह शेखावत का विरोध क्यों किया. कहा यह गया कि उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाने से जाट मतदाता नाराज हो जाएंगे, जिससे पार्टी का जातीय गणित गड़बड़ा जाएगा. लेकिन विरोध की असली वजह असुरक्षा की भावना रही. असल में वसुंधरा को यह डर था कि शेखावत भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं.

राजे को मदन लाल सैनी से ऐसा कोई डर नहीं है. एक तो वे 75 साल के हैं और दूसरा लोकप्रिय नहीं हैं. उनका चुनावी राजनीति में भी प्रदर्शन बेहद फीका है. उन्होंने कुल चार चुनाव लड़े, जिनमें से तीन में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. उनका स्वाभाव भी सरल है. वसुंधरा को लगता है कि वे इन्हें भी ठीक वैसे ही अपने मुताबिक ढाल लेंगी जैसे संघ की सिफारिश पर प्रदेशाध्यक्ष बने अरुण चतुर्वेदी को ढाला.

इसके उलट मोदी-शाह की रणनीति यह है कि मदन लाल सैनी के जरिये संगठन पर वसुंधरा की पकड़ को ढीला किया जाए. पार्टी नेतृत्व के प्लान-बी की यह सबसे अहम कड़ी है. और इसके सूत्रधार भी ओमप्रकाश माथुर ही हैं. कार्यभार ग्रहण के बाद सैनी के साथ बंद कमरे में डेढ़ घंटे तक चली मंत्रणा इस बात का संकेत हैं कि वसुंधरा अब संगठन को अपने हिसाब से नहीं चला पाएंगी. ऐसे में यदि नए प्रदेशाध्यक्ष की कार्यकारिणी में वसुंधरा खेमे के माने जाने वाले नेताओं को तरजीह नहीं मिले तो इस पर अचंभा नहीं होना चाहिए. सैनी अपने पहले उद्बोधन में ही यह साफ कर चुके हैं कि अब तक उपेक्षित रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी की मुख्यधारा में शामिल किया जाएगा.

यदि मोदी-शाह की यह रणनीति कारगर रही तो यह तय मानकर चलिए कि विधानसभा चुनावों में वसुंधरा को फ्री-हैंड नहीं मिलेगा. टिकट वितरण में सिर्फ उनकी नहीं चलेगी. प्रदेशाध्यक्ष के जरिये इसमें पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का इसमें पूरा दखल रहेगा. ऐसा हुआ तो राजे के लिए यह बड़ा झटका होगा. वसुंधरा के पर कतरने के फैसले पर संघ की भी सहमति है. दरअसल, संघ को ही यह शिकायत सबसे ज्यादा थी कि वसुंधरा राजे ने प्रदेश भाजपा पर कब्जा कर रखा है. मुख्यमंत्री तो वे हैं ही, संगठन में भी उनका ही वर्चस्व है. इस वजह से पार्टी की हालत पतली है, जिसका खामियाजा विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में भुगतना पड़ेगा.

संघ की इस चिंता के बाद ही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने वुसंधरा के ‘यस मैन’ माने जाने वाले अशोक परनामी से इस्तीफा मांगा. हालांकि संघ केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को अध्यक्ष बनता हुआ देखना चाहता था, लेकिन वह मदन लाल सैनी के यहां पहुंचने पर भी खुश है. मोदी-शाह का प्लान-बी कितना कामयाब होता है यह इस पर निर्भर करता है कि वसुंधरा राजे इस पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं. उनका राजनीतिक मिजाज कुछ इस तरह का है कि वे किसी की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करतीं. जो भी करती हैं अपने हिसाब से करती हैं. यदि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी खींची लकीर को दाएं-बाएं किया तो वे फिर से बगावती तेवर दिखा सकती हैं.

आगे क्या होगा यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि पिछले कई वर्षों से प्रदेश की राजनीति से दूर चल रहे ओमप्रकाश माथुर अचानक अहम भूमिका में आ गए हैं. विधानसभा चुनाव तक भाजपा की राजनीति को वे भी एक अहम केंद्र होंगे.

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं तथा जयपुर में रहते हैं)


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