1995 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक जजमेंट के अनुसार “हिंदुत्व का हिंदू धर्म के साथ कुछ भी लेना देना नहीं है, लेकिन हिंदुत्व भारत में जीवन का मार्ग है.

2014 में जब पहली बार हिंदुत्ववादी पार्टी भाजपा बहुमत के साथ केंद्र में पहुंची, तभी से देश की राजनीति में, देश की आबोहवा में, देश की सोच में एक बड़े बदलाव के कयास लगाये जा रहे थे. भाजपा को वोट देने वाले और नहीं देने वाले, दोनों खेमों को इस बात का बखूबी अंदाज़ा था. चूँकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा का मात्र संगठन है इसलिए अब देश में राष्ट्रवाद और हिन्दुत्ववाद का पौधा फलने-फूलने वाला है. और इस पौधे का जो बिरवा बोया गया है, उसके बहुत दूरगामी परिणाम होंगे!

अब जबकि अगले साल ही लोकसभा के चुनाव होने हैं, ऐसे में हम देख सकते हैं कि इस पौधे के फलों को हर कोई मजे से खा रहा है! कुछ लोग दबा के खा रहें हैं तो कुछ थोड़े, लेकिन सब खा तो जरूर रहे हैं!

सबसे पहले तो ये ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ है क्या?

‘हिंदुत्व’ यह शब्द अपने आप में बहुत सी परिभाषाएं समेटे हुए है! इतिहासकारों के अनुसार, वीर सावरकर इस शब्द के अग्रणी प्रयोगकर्ता हैं लेकिन वीर सावरकर से पहले भी इस शब्द की अपने-अपने तरीकों से परिभाषाएं होती रही हैं! बहरहाल, भाजपा का ‘हिंदुत्व’ सावरकर की भारत के लिए एक राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित करने के लिए बनाई गई एक ‘राजनैतिक विचारधारा’ से प्रेरित है, तो कांग्रेस के लिए बस माथे पर तिलक लगाए मंदिर-मंदिर घूमना है!

मोटा-मोटी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के शब्द का डीएनए को परखा जाए तो इसका मतलब होता है, “एक ऐसे हिंदुत्व का पालन जिसके कारण धर्मनिरपेक्षता वाली छवि को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे!” और अगर राजनीतिक लिहाज़ से इसको बयां किया जाए तो, “एक ऐसी प्रैक्टिस जिसके कारण पुराना वोट बैंक यथावत रहे और साथ-साथ नए वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित किया जाए!”

‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की जरुरत क्यों?

वैसे ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की बात वही लोग करतें हैं जिनको हिंदुत्व की जानकारी नहीं, लेकिन फिर भी राजनीतिक लिहाज़ से देखा जाए तो भाजपा “हार्ड हिंदुत्व” के लिए जानी जाती है और इसी कारण देश के ज्यादातर हिन्दू संगठन, हिन्दू समुदाय, हिन्दू परिवार, हिन्दू नेता भाजपा का साथ देतें आएं हैं! और इसका प्रभाव हम भारत के मौजूदा नक़्शे पर देख सकते हैं, जहाँ देश के 75% हिस्से में भाजपा और भाजपा गठबंधन का शासन है.

भाजपा के इस “हार्ड हिंदुत्व” वाले कार्ड के सामने कांग्रेस हमेशा से “सेक्युलर” कार्ड खेलती आई है, लेकिन मोदी सरकार के सत्ता के शिखर पर काबिज होने के बाद, हम जिस बदलाव की बात कर रहे थे उसमें “सेक्युलर” शब्द अब बस कांग्रेसी भाषणों तक ही सीमित रह गया है. इसीलिए हिंदुत्व की इस बहती गंगा में कांग्रेस आला-कमान ने भी हाथ धोने की सोची और कुछ इस तरह कि उनका पुराना वोट बैंक भी टस से मस न हो!

कांग्रेस ने अपने 60 साल के शासनकाल में हिंदुत्व को जी जान से कलंकित किया था. अपने इसी शासनकाल के दौरान उन्होंने “हिन्दू-आतंकवाद” की कल्पना का ईजाद किया और मुस्लिम तुष्टिकरण का राग अलापना जारी रखा. इसी वजह से हिन्दू वोट उनसे दूर होते चले गए और उसका खामयाजा पार्टी आज तक भुगत रही है!

तो हिंदुओं को साइड लाइन करके कांग्रेस को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई करने के लिए राहुल ने मंदिर-मंदिर जाना शुरू कर दिया, माथे पे तिलक लगाना शुरू कर दिया, कल तक उनपर मुसलमान के वंशज होने के आरोप लगते थे, वे आज खुद को ‘जनेऊ धारी हिन्दू’ कहलाने लगे.

कांग्रेस ने इस तरह के हथकंडों के लिए ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला गुजरात’ को चुना और इससे हांसिल परिणाम हमारे सामने है! गुजरात में हार कर भी कांग्रेस के हौंसले बुलंद हैं और वे इस हार को ‘मोरल जीत’ बता कर आगे भी इस राह पर चलने की बात कर रहें हैं!

कुल-मिलाकर, कांग्रेस को भनक लग चुकी है कि ‘हिंदुत्व’ को स्वीकार करने के अलावा अब कोई चारा नहीं है! इसके बगैर राहुलजी की नैया पार नहीं लगने वाली!

‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की टाइम-लाइन

वैसे तो इसका खात मुहूर्त राजीव गाँधी के हाथों हुआ था लेकिन चूँकि उस दौरान कांग्रेस के पास अशोक गहलोत जैसे तथाकथित चाणक्य नहीं थे, इस वजह से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के दाँव को ठन्डे बस्ते में समेट कर रख दिया गया.

इसके बाद, 2002 के गुजरात चुनावों में एकबार फिर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की खबरों ने तूल पकड़ा जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत मंदिर दौरे से की थी. इस चुनाव की शुरुआत भले ही कांग्रेस ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की तर्ज पर करनी चाही लेकिन 2002 गोधरा काण्ड के घाव अभी भरे नहीं थे. नतीजन मोदी की ‘कट्टर हिंदुत्व’ वाली छवि के सामने कांग्रेस के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ को मुंह की खानी पड़ी. 182 सीटों के सामने भाजपा को 127 सीटें मिली और कांग्रेस 51 पर ही सिमट कर रह गई. इस दौरान हिंदुस्तान टाइम्स में एक आर्टिकल छापा था जिसका शीर्षक था – ‘सॉफ्ट हिंदुत्व की हार

2007 में एकबार फिर जब गुजरात चुनाव ने दस्तक दी तब एकबार फिर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की सुर्ख़ियों ने जोर पकड़ा लेकिन पिछली हार से सबक लेते हुए इस चुनाव में कांग्रेस ने हिंदुत्व के मुद्दे को हाथ तक नहीं लगाया. इस बार उन्होंने अपना पुराना ‘सेक्युलर कार्ड’ ही खेलना मुनासिब समझा.

पत्रकार शीला भट्ट द्वारा तत्कालीन गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी को ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के बारे में पूछे गए एक सवाल पर सोलंकी ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ को ज्यादा हवा न देते हुए साफ शब्दों में कहा था कि, “कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष है और धर्मनिरपेक्ष बनी रहेगी!”

इसके बाद समय समय पर दलाल स्ट्रीट ऑफ़ मीडिया, ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का जिक्र अपनी टीआरपी और रीडर-शिप बढ़ाने के लिए करता आया है!

2014 में सेक्युलर कार्ड खेलने के बावजूद लोकसभा चुनावो में करारी हार मिलने के कारण एक बार फिर कांग्रेस ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर अपना रुख किया और अभी तक मात्र इफ्तार पार्टी का आयोजन करने वाली कांग्रेस ने हिन्दू त्यौहार भी मानाने का ऐलान किया, जिसकी शुरुआत जन्माष्टमी के त्यौहार से हुई, जब कांग्रेस की दिल्ली यूनिट ने भजन संध्या का आयोजन किया.

Rediscovering Janmashtami: Congress’ grand strategy to counter Hindutva

2015 में जब 57 दिन की छुट्टियों के बाद राहुल गाँधी वापस भारत लौटे थे, तब उन्होंने एकाएक केदारनाथ की यात्रा करने का मन बना लिया. यहीं से कांग्रेस के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के आलिंगन की बात सबके सामने आ गई और मीडिया से लेकर सियासी गलियारों में इस शब्द ने जोर पकड़ा था.

Is Congress adopting ‘soft Hindutva’ to woo back majority community from Modi?

केदारनाथ के बाद, राहुल ने मथुरा के बांके बिहारी मंदिर का दौरा किया. विश्लेषकों का कहना था कि, छुट्टियों के बाद राहुल गाँधी एक फिर तैयार है, लेकिन इस बार ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के साथ.

अब तक कांग्रेस जन्माष्टमी, रामनवमी जैसे हिन्दू त्यौहार मानाने लग गई थी, कांग्रेसी दफ्तरों में भजन संध्या का आयोजन होना शुरू हो गया था, राहुल मंदिर-मंदिर घूमने लग गए थे और कांग्रेसी कार्यकर्ता गाय के साथ फोटू भी खिंचवाने लग गए थे. कुल मिलाकर कांग्रेस ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की चौसर बिछा ही दी.


Source: theweek.in

2016 आते आते ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ यह शब्द पुराना और काफी चर्चित हो चुका था लेकिन अपने चरम तक पहुंचने में एक सीढ़ी दूर था. राहुल गाँधी ने इस सीढ़ी को पार किया अपने अयोध्या दौरे के साथ. राहुल गाँधी ने अयोध्या के हनुमानगढ़ी मन मंदिर में प्रार्थना कर उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव का बिगुल बजाया ! यहाँ आपको बता दें कि दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से ऐसा पहली बार हुआ था कि नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य का अयोध्या गया हो!

Is Congress playing the soft Hindutva card in Uttar Pradesh?

इस दौरान, भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रहे हिंदुत्व के इस युद्ध में AIMIM के अध्यक्ष ने भी छलांग लगाई और ‘हार्ड हिंदुत्व’ और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ से परहेज करते हुए अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहा.

Owaisi targets ‘Congress’s soft Hindutva’ and ‘BJP’s hard Hindutva

2017 ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की सुर्खियों का स्वर्ण वर्ष कहा जा सकता है! 15 साल पहले गुजरात से ही कांग्रेस ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का प्रयोग पर हाथ धरा था जिसके बाद से लगातार उसे मुँह की खानी पड़ी, लेकिन इस बार गुजरात कि कमान कांग्रेस के तथाकथित चाणक्य अशोक गहलोत के हाथो में थी. 22 वर्षो की सत्ता विरोधी लहर, पटेलों की भाजपा से अनबन और दलितों व ओबीसी के सुलगते मुद्दों के साथ साथ कांग्रेस को लगने लगा की यदि इस बार नरम रुख रखने वाले हिन्दुओं को अपनी ओर कर लिया जाए तो सत्ता हाथ लग सकती है.

अपने इन्हीं मंसूबों के तहत राहुल गाँधी ने करीब 27 हिन्दू मंदिरों का दौरा किया. हमेशा मुसलमानों की पैरवी करने वाली कांग्रेस ने इस बार राहुल से किसी भी मस्जिद का दौरा नहीं करवाया, ना ही उनके किसी भाषण में मुसलमानों के मुद्दों का जिक्र हुआ. यहाँ तक कि भाजपा के आरोपों को गलत साबित करने के चक्कर में कांग्रेस ने राहुल को ‘जनेऊ धारी हिन्दू’ बता कर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ को और अधिक मजबूत करने की एक नाकामयाब चाल चली.

खैर, अब 2018 की शुरुआत में ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का सूरज पूर्व में भी उगता नज़र आ रहा है. इसबार कांग्रेस की देखा-देख, कभी ‘गौ मांस खाना मेरा मौलिक अधिकार है’ कहने वाली ममता बनर्जी ने भी इसकी शुरुआत कर दी है. साल की शुरुआत में ममता ने बीरभूम जिले में एक मंदिर में पूजा-अर्चना की थी और 15,000 ब्राम्हणों को सम्बोधित किया था.

इसके अलावा, कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे राहुल गाँधी जब बतौर पार्टी अध्यक्ष रायबरेली यूपी में पहुंचे तो उन्होंने हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ अपने दौरे की शुरुआत की.

20 जनवरी के बाद कर्नाटक में राहुल गांधी की ओर से प्रचार अभियान के पहले चरण की शुरुआत भी होने वाली है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि गुजरात की ‘मोरल विक्ट्री’ से उत्साहित राहुल यहाँ भी मंदिर-मठों में जाकर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के प्रचार से पीछे नहीं हटेंगे.

और तो और कभी प्रवीण तोगड़िया को ‘कट्टर हिंदुत्व’ का चेहरा बता कर विश्व हिन्दू परिषद् पर बैन की मांग करने वाली कांग्रेस के नेता कल प्रवीण तोगड़िया की प्रेस कॉन्फ्रेंस के ठीक बाद उनसे मुखातिब होने पहुँच गए! इस वाकये के बाद तो यहाँ तक कहा जा रहा है कि “हिन्दू वोट के लिए राहुल गाँधी मौलानाओं को भी मंदिर भेज सकते है!”

राजनीतिक हलकों में कांग्रेस के इन वर्तमान कयासों को 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है ऐसे में देखने वाली बात होगी कि हिंदुत्व पर और कितने सॉफ्ट होंगे राहुल!

मीडिया में ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’

टीआरपी के लिए देश की सुरक्षा तक को कुर्बान करने वाली मीडिया भी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के इस वायरल फीवर से खुद को अलग नहीं कर पा रही है!

मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक जहाँ सिर्फ ज़ी न्यूज़ ही इस ख़ैमे के मीडिया खिलाड़ी के रूप में जाना जाता था वहाँ आज ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ को वक्त की मांग समझते हुए आजतक ने देश के सबसे बड़े हिन्दू पत्रकार के चेहरे रोहित सरदाना को ज़ी न्यूज़ के स्टूडियो से उठाकर आजतक स्टूडियो में ‘दंगल’ करवाने बिठा दिया. आजतक की यह कवायत साफ तौर पर ज़ी न्यूज़ की हिंदुत्ववाद और राष्ट्रवाद की तर्ज पर बढ़ती लोकप्रियता के सामने अपनी छवि बैलेंस करने के लिए है.

हिंदी मीडिया के अलावा अंग्रेजी मीडिया में ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का आधार अर्नब गोस्वामी ने खड़ा किया है ऐसा कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. एक डिबेट के दौरान अर्नब ने एक वक्ता को यह कहते हुए चुप किया कि, “हाँ, मैं भी हिन्दू हूँ!” गौर किया जाए तो, मोदी सरकार के कालखंड के पहले अंग्रेजी मीडिया में इस तरह के बयान शायद ही कभी सुनाई दिए होंगे! मई 2017 से अर्नब गोस्वामी के ‘रिपब्लिक टीवी’ के रूप में शुरू हुए नए अध्याय को भी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की कड़ी का एक चैप्टर कह सकते हैं!

बॉलीवुड में ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’

राजनीति और मीडिया के अलावा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने भी देश के मिजाज को भाँपा और पहली बार सलमान खान की बजरंगी भाईजान में सलमान खान को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बाल-स्वयंसेवक के तौर पर दिखाया गया. आयुष्मान खुराना की ‘दम लगा के हईशा’ में भी शाखा कल्चर को बड़े परदे पर दिखाया गया था.

देश के मुसलमानों की आतंकवाद में धूमिल होती छवि को सुधारने के लिए हिंदी फिल्मों के प्रयासों के इतर ऐसा पहली बार होने लगा कि आरएसस की राष्ट्रवादी और समाजसेवी छवि को सबके सामने इस तरह लाया गया.

इसके अलावा हम सब जानते हैं कि हिंदुत्व की जड़े कहीं न कहीं राष्ट्रवाद से जुडी हुई हैं. अक्षय कुमार ने मोदी सरकार के आने के बाद देश की बदलती हवा में उड़ते हुए एक पे एक राष्ट्रवादी फिल्में बनाना शुरू की और सभी सुपर हिट साबित हुई. आजतक इस्लामिक आतंकवाद के मुद्दे से दूर भागने वाला बॉलीवुड अचानक हॉलिडे, बेबी, नाम शबाना जैसी फिल्मों से भर गया और इसका फायदा भी खूब हुआ.

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