​​नक्सलवादियों द्वारा बर्बर तरीके से कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा की हत्या पर दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नंदिनी सुन्दर जून 2013 में ‘आउटलुक’ मैगज़ीन में छपे अपने आर्टिकल में लिखती हैं – “Mahendra Karma’s death was long expected.”

25 मई 2013, सुकमा की दर्भा घाटी से कांग्रेस के कुछ नेता ‘परिवर्तन रैली’ समाप्त कर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 202 के निकट के जंगलों से लौट रहे थे. वे देखते हैं कि सड़क पर कटे हुए एक पेड़ ने रास्ता रोक रखा है. तभी काफिले की एक गाड़ी विस्फोट की चपेट में आती है और अचानक नक्सलियों की ओर से गोलीबारी शुरू हो जाती हैं.

अंधाधुंध गोलीबारी के बीच नक्सली, नेताओं और सुरक्षा कर्मियों को पकड़-पकड़ कर पूछ रहे थे, “आपमें से कौन है महेंद्र कर्मा?”
तभी कार में से एक व्यक्ति बाहर आता है और कहता है, “इन लोगों को छोड़ दो, मैं हूं महेंद्र कर्मा.”

नक्सली इतना सुनते ही साथियों से कहते हैं, “बंद करो, मिल गए महेंद्र कर्मा.”

फिर नक्सली महेंद्र कर्मा के हाथ बांध देते हैं और उन्हें सड़क से खींचकर पास की घनी झाड़ियों में ले जाया जाता है. एक महिला नक्सली कर्मा को पीछे से मारती है, दूसरी महिला नक्सली टाँगों पर हमला कर गिरा देती है. महेंद्र कर्मा पर करीब 50 राउंड गोलियां दागी गयीं और उनकी बॉडी को करीब 78 बार चाकुओ से गोदा गया. मौत का जश्न नक्सलियों ने कर्मा की छाती पर कूद-कूद कर मनाया. उनकी डेड बॉडी से फुटबॉल की तरह किक मार-मार कर खेला गया. इस घटना में नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा के साथ साथ 27 और लोगों की भी हत्या कर दी थी.

सलवा जुडूम: जिसके कारण नक्सलियों का मुख्य टारगेट थे कर्मा

बस्तर से सांसद रह चुके महेंद्र कर्मा का नाम कांग्रेस के बड़े नेताओ में शुमार था मगर उनकी मुख्य पहचान बस्तर के टाइगर के रूप में थी. उन्होंने 2005 में सलवा जुडूम नामक अभियान की शुरुआत की थी. जिसका मुख्य हेतु नक्सलियों सफाया करना था. इससे पहले भी नब्बे के दशक में कर्मा जन-जागरण अभियान और 2003 में दंडकारण्य-समन्वय समिति के तहत नक्सल विरोधी अभियानों की अगुवाई करते रहे थे.

सलवा जुडूम यह एक आदिवासी शब्द है जिसका अर्थ होता है – ‘शांति का कारवां’. इसके लिए कर्मा ग्रामीण आदिवासियों को अपने साथ लेकर नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें स्पेशल पुलिस ऑफिसर बनाते थे. और अभियान के तहत जंगलों में चल रही नक्सली गतिविधियों और ठिकानों की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को देते थे.

अभियान की सफलता इस वाकये से भी नापी जा सकती हैं कि, कर्मा एक कांग्रेस नेता थे और उसी नाते यह अभियान भी कांग्रेसी था लेकिन राज्य में बीजेपी की सरकार आने के बाद भी रमण सिंह ने इसे जारी रखा. लेकिन मानव-अधिकारों की वकालत करने वाले प्रबुद्धों की आँख की किरकिरी बन बैठा और विवादों की भेंट चढ़ गया. कथित प्रोफेसर नंदिनी सुन्दर के जरिये सुप्रीम कोर्ट की दर तक पहुँचा. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार दे दिया.

कुल मिला कर नक्सलवादियो में कर्मा के नाम का खौफ था. उन्होंने अकेले दम पर नक्सलवादियो के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था तभी वे बहुत जल्द नक्सलवादियो की रडार पर आ गए और उनकी हत्या की प्लानिंग कर ली गई.

कर्मा की हत्या से पहले भी कई बार उन पर जानलेवा हमले हुए. वैसे, कर्मा को जेड प्लस सुरक्षा भी मुहैया करवाई गई थी लेकिन उनकी हत्या के दिन करीब आधे से ज्यादा सुरक्षाकर्मी मौके पर नहीं थे.


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