त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद लेनिन के स्टेच्यू गिराने के जबाब में वामपंथी पार्टियों और संगठनों के बदले की बौखलाहट से उठी गुंडई कहीं ज्यादा निंदनीय और दयनीय है. लेफ्ट या यूं कहे रेडिकल और अल्ट्रा लेफ्ट द्वारा बदले में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की स्टेच्यू को तोड़ कर कौन सी नयी प्राइड वाली मिसाल कायम की है.

जाधवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र भेष धरे गुंडों का कानून को हाथों में लेना, पुलिस से भाजपा के छात्र संगठनों से सम्बंधित लोगों के निशाना बनाना वामपंथियों को बुतपरस्त-आस्तिक ज्यादा और अपने आदर्श ‘लेनिन’ की बदनामी का खूब ठेका लेना साबित करती है. गिराने की इस घटना से सबसे ज्यादा बवासीर वामपंथी नेताओं को और वामपंथी मीडिया को हुआ है, साथ ही विपक्ष(केंद्र की सत्ता से बाहर बैठे समस्त दल) को भी.

भारत में लेनिन की मूर्ति क्यों?

लेनिन को दुनिया भर के कम्युनिस्ट अपना मसीहा मानते हैं, दुनियाभर से तात्पर्य जो भी बचे खुचे हैं. क्यों मानते हैं, क्योंकि लेनिन पूँजीवाद के विरोधी थे….नहीं नहीं बल्कि इसलिए कि उन्हें वो कूल लगता है। जी हाँ, ‘हर हाथ शक्ति’ जैसा चमत्कारी विचार तो सरदार पटेल ने भी दिया था. पूंजीवाद के विरोध की बात तो सिर्फ घटिया खेल था.. वैसा ही घटिया खेल जो आज सीताराम येचुरी और बृन्दा करात जैसे औसत दर्जे के चाल फ़रेबी लोग युवाओं के साथ खेल रहे हैं!

लेनिन जो कि प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी का खास जा बन बैठा था, वही जर्मनी जो पूंजीवादी भी था और रूस का विरोधी भी. एक ओर रूस जर्मनी से लड़ रहा था. दूसरी ओर लेनिन की जर्मनी से बहुत दोस्ती थी. इसी वजह से 1917 आते-आते लेनिन का पूंजीवादी के विरोध का नक़ाब उतरने लगा. लोग कहने लगे कि उन्होंने जर्मनी से पैसे खाए हैं और इसीलिए वो रूसी सत्ता को कमजोर करने में लगे हैं. रूस जंग लड़ रहा था. बहुत सारे रूसी इस जंग में मारे गए थे. लेनिन के खिलाफ विरोध के स्वर तेज होने लगे. लेनिन भागकर फिनलैंड चला गया.

फिर बाद में लेनिन ने किस तरह पूंजीवादी जर्मनी के सहयोग से अपने ही देश में सिविल वार और आम जनता को भुखमरी की भट्टी में झोंक दिया, यह आज के कूल डूड टाइप के लौंडों को जानना चाहिए….

भारत की बात की जाए तो यहाँ लाल सलाम कितना तर्क संगत है? जबकि पहले ही लोकतांत्रिक सरकार है। यहाँ निचले से निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को सर्वोच्च सत्ता तक पहुंचने का अवसर मिलता है. आज देश का प्रधानमंत्री एक चायवाला है, राष्ट्रपति आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार से….. तो क्या कम्युनिस्म की मेड इन चाइना क्रांति सिर्फ इसलिए कि सीताराम येचुरी, बृन्दा करात, उमर खालिद और कन्हैया जैसे जाहिलों को सत्ता सौंप दी जाए!

साम्यवाद का नारा बुलंद करने वालों से सिर्फ एक सवाल कि क्या लेनिन पूंजीवादी या पूंजीवाद का समर्थक नहीं था? अगर नहीं था तो क्यों नहीं आम जन की तरह रूस में रहकर भुखमरी की मौत कुबूल की! और फिर जिनके मसीहा ने ही अपनी सत्ता लोलुपता के लिए जर्मनी से मिलकर अपने ही देश और देशवासियों के साथ खूनी खेल खेला हो….वो वामपंथी कल को भारत के टुकड़े नहीं करेंगे इस बात की क्या गारंटी है!

लेनिन के कम्युनिज्म से क्या मिला? 

गाँधी के स्टेच्यू पर कालिख पोतने के दबे शोर में लेनिन पर ही बवंडर क्यूँ? 

अब सोचने की बात ये की वास्तव में टीवी चैनल्स पर लगातार तीन दिन बहस क्यूँ मची है? पब्लिक प्रोटेस्ट किये जा रहे हैं और इसका बदला लेने के लिए देश के अन्य हिस्सों में अराजकता का माहौल पैदा किया जा रहा है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लेनिन के विचारों से दुनिया में हिंसा बढ़ी. लेनिन जिसे आज कई देशो ने नकार दिया यहाँ तक लेनिन के पैतृक देश रूस ने भी…और अब ये राजनैतिक विचारधारा बस बड़े तौर पर चीन तक सिमट के रह गई, तो निश्चित तौर पर ना तो मीडिया को इसे मुद्दा बनाने की जरूरत थी और न ही लेनिन की मूर्तियां कहीं खड़ी करने की. जिसके पैदा किये विचार की वजह से दशकों तक जिन्दा लोगों को पुतला समझ के मार गिराया उस पर कभी देश में एक दिन चर्चा नही हुई. आज नफरत और हिंसा के प्रतीक एक निर्जीव पुतले को गिराने पर क़यामत आ गई.

लेनिन से ही प्रेरित भारत में लाल सलाम की झंडा बरदारी करने वाले वामपंथीयों की जहाँ-जहाँ देश में सरकार होती है वहां हिंसा का दौर ही देखने को मिला है. केरल में आये दिन होने वाली हिन्दू नेताओं और बीजेपी आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या के रूप में सबके सामने है. त्रिपुरा में भी इनका ये खेल चल रहा था. ढाई दशक की वामपंथी गुलामी और दासता से जकड़े त्रिपुरा के लिए लेफ्ट की हार का दिन त्रिपुरा की आजादी का दिन था और वहां लेनिन का स्टेच्यू गिराना ठीक शायद उसी तरीके से था जब लेफ्ट के नेता चुनावों में विपक्षी दलों की हार पर अर्थी निकालते हैं. पश्चिम बंगाल में सिद्धार्थ शंकर राय की कांग्रेसी सरकार के हारने पर क्या वामपंथियों ने हिंसा-आगजनी नहीं की? रवींद्र नाथ टैगोर की मूर्तियों का भंजन नहीं किया? एक ऐसा व्यक्ति का जो न कभी भारत आया है ना ही भारत के लिए उसका कोई योगदान रहा है बस कुछ लोग जो अपनी देशविरोधी सोच को लेकर विवादों में रहते हैं वो लेनिन को अपना आदर्श जरूर मानते हैं. लेकिन लेनिन की प्रतिमा के भंजन पर उठा बवंडर गजब है.

पिछले साल राजस्थान में अलग अलग हिस्सों में मुस्लिम बहुल छोटे कस्बों में मूर्तियों पर कालिख पोतने की कई घटनाये हुई थी जिनमें सबसे महत्वपूर्ण 15 अगस्त के दिन किशनगढ़ के पास बिचुन में तिरंगा जलाने की घटना और साथ ही इसी के पास मोजमाबाद में महात्मा गाँधी की मूर्ति पर कालिख पोतकर ISIS जिंदाबाद के नारे लिखने की हुई थी. जो राष्ट्रीय तो छोड़ो स्थानीय मुद्दा भी न बन सका. इस घटना पर मीडिया और गाँधी को आदर्श मानने वाली पार्टियां मुह में दही जमा कर बैठी थी.



चार साल पहले जयपुर के ही हसनपुरा में जहा मुस्लिम बहुतायत में है वहां एक मंदिर में माँ दुर्गा की मूर्ति के साथ छेड़छाड़ हुई कुछ मुश्लिमों ने मूर्ति के स्तन तोड़ दिए थे जिसके बाद तनाव फैला पर मीडिया शांत रहा.

बात दो महीने पहले की दिसम्बर महीने की ही है जब तमिलनाडु के कांचीपुरम रेलवे स्टेशन पर कुछ क्रांतिप्रेमियों ने रामानुजाचार्य, आदि शंकराचार्य के दीवारों पर बने चित्रों को मिटाया. कांचीपुरम रेलवे स्टेशन की तोड़-फोड़ करने वाले युवाओं के एक समूह ने मंदिर नगर के आसपास काफी तनाव पैदा कर दिया. कथित तौर पर पेरियार द्रविड़ कज़गम, विदुताई चिरुथालिक काची (VCK) और माओवादियों के एक गुट ने रेलवे स्टेशन को तोडा. विदुताई चिरुथालिक काची के नेता ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इसे पोस्ट कर इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि यह हमने ही किया है और हम सभी सार्वजनिक जगहों से हिंदुत्व के प्रतीकों को हटा देंगे तथा धीरे-धीरे हम हिन्दू धर्म को भी देश से निकाल देंगे. ये खबर किसी भी हिंदी या अंग्रेजी के राष्ट्रीय अख़बार में नहीं छपी और न ही टीवी पर दिखाई गई.

बुद्धत्व का साम्प्रदायिकता से भरपूर एक घिनौना चेहरा!

11 अगस्त 2012 की वो घटना जब आजाद मैदान मुंबई में स्थित अमर शहीदों के बलिदान को याद रखने के लिए बनाये गए अमर जवान ज्योति स्मारक को कुछ अमनपसंद तरुणों ने ध्वस्त कर दिया था. देश वो दिन कभी नहीं भूल सकता.


 वीडियों देखें: लेनिन की मूर्ति तोड़ा जाना क्या लोकतंत्र की हत्या है ?


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