डेमोक्रेसी की ऐसी तैसी: यहॉं सरकार और अदालत एक-दूसरे पर भौंहें तान कर बैठे हैं


न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका ये तीनों मजबूूत लोकतंत्र के स्तम्भ हैं. यदि ये स्तम्भ एक दूसरे से सामंजस्य बनाकर रखें तो लोकतंत्र की अस्मिता बनी रहती है और उसकी खूबसूरती भी. परन्तुु……

सरकार और न्यायपालिका के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर होने वाली खींचतान अक्सर दिखाई देती रहती है. पिछले दिनों एक बार फिर इसकी झलक देखने को तब मिली, जब कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने यह कहा कि न्यायपालिका के हद से आगे बढ़ने के कारण, शक्ति के संतुलन बने रहने पर दबाव है. रविशंकर प्रसाद ने यह बात संविधान दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में कही. इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे. 

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने भी इस बात का जवाब देने में देर नहीं लगाई. दीपक मिश्रा ने रविशंकर कुमार की टिप्पणी का जवाब देते हुए कहा कि सरकार शक्ति के वर्गीकरण को लेकर सहज नहीं है. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि लोगों के मौलिक अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता. संविधान एक सुव्यवस्थित और जीवंत दस्तावेज है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक संप्रभुता में विश्वास करता है.

इस मौके पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने यह भी कहा, ‘सरकार को किसी गणितीय फॉर्म्युला के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता’ उन्होंने कानून मंत्री की इस बात का भी खंडन किया कि न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रही है.

इस मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच नाजुक संतुलन को कायम रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि सब समान हैं. उन्होंने कहा कि राज्य के तीनों अंगों को अपनी स्वतंत्रता को लेकर सचेत रहना चाहिए और अपनी स्वायत्तता की रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए.’ 

न्यायपालिका और भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार के बीच तलवारें तो पिछले साल ही उस समय खिंच गई थीं, जब संविधान पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून निरस्त कर दिया था. यह खींचतान इस साल उस समय और बढ़ गई जब शीर्ष अदालत ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला न्यायिक पक्ष की ओर से उठाने की धमकी दी, परंतु बाद में उसने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायपालिका का काम ठप करने के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराया.

न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में सरकार के रवैए के प्रति अपना आक्रोश जाहिर करते हुए पूर्व प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर के अत्यधिक भावुक होने और इसे लेकर व्यक्त किए गए जज्बात भी पूरे साल छाए रहे. न्यायपालिका में बड़ी संख्या में रिक्तियों के मामले की चर्चा करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में आयोजित एक समारोह में अपनी व्यथा जाहिर की थी. 

न्यायाधीशों के चयन से संबंधित प्रक्रिया ज्ञापन को कॉलेजियम द्वारा अंतिम रूप नहीं दिए जाने की केंद्र सरकार की निरंतर दी जा रही दलील पर प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी भी की कि इसे अंतिम रूप नहीं दिया जाना न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करने का कोई आधार नहीं है।

कॉलेजियम जिस समय अपनी कार्यशैली को लेकर चौतरफा आलोचनाओं का शिकार हो रही था, उसी दौरान इसके सदस्य न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने प्रधान न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर कॉलेजियम की बैठकों से हटने की जानकारी दी और उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नामों के बारे में चर्चा की लिखित जानकारी चाही.

इस तरह की गतिविधियों के बीच ही न्यायालय के फैसलों पर उसके ही पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने सवाल उठाया और वे अपने ब्लॉग के माध्यम से न्यायपालिका के बारे में कथित रूप से असंयमित भाषा और उसे बदनाम करने के आरोप में न्यायालय की अवमानना की नोटिस प्राप्त करने वाले शीर्ष अदालत के पहले न्यायाधीश बन गए.  इससे पहले न्यायमूर्ति काटजू न्यायालय में पेश हुए थे और उनकी न्यायाधीशों के साथ तकरार हुई थी.

यही नहीं, इस साल धनाढ्य बीसीसीआई को पूर्व न्यायाधीश आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति की बोर्ड की कार्यशैली में सुधार की सिफारिशों को अपनाने का उल्लंघन करने के कारण शीर्ष अदालत में मुंह की खानी पड़ी. बीसीसीआई को साल का अंत होते-होते उस समय बडा झटका लगा, जब उसके अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ही शीर्ष अदालत की फटकार के दायरे में आ गए. न्यायालय ने उन पर गलत हलफिया बयान देने के आरोप में अवमानना की कार्यवाही करने की चेतावनी देते हुए आगाह किया कि न्यायिक प्रशासन में दखल देने के कारण उन्हें जेल भी हो सकती है. 

जनहित याचिकाओं पर विचार करना न्यायालय के लिए पूरे साल एक चुनौती रही और यह उस समय अधिक गंभीर हो गई, जब गैरसरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ के वकील प्रशांत भूषण ने दो व्यावसायिक घरानों से रिश्वत लेने के आरोप में प्रधानमंत्री का नाम घसीटने का प्रयास किया. इन घरानों पर आयकर विभाग ने 2012-13 में छापे मारे थे. इस मामले में कोई राहत नहीं मिलते देख अंतत: भूषण ने मनोनीत प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर को इस याचिका की सुनवाई से अलग होने का अनुरोध किया. न्यायमूर्ति खेहर ने ‘बगैर किसी ठोस सामग्री’ के याचिका दायर करने पर उनसे सवाल किए थे.

मोदी सरकार को लोकपाल की नियुक्ति में विलंब और केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक की नियुक्ति जैसे मामलों में भी न्यायालय में असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. यही नहीं, सरकार ने भारत के सांविधानिक इतिहास में पहली बार मुस्लिम समाज में 3 तलाक देने, निकाह हलाला और बहुपत्नी प्रथा का विरोध किया और इन मुद्दों पर शीर्ष अदालत में लिंग समानता तथा पंथनिरपेक्षता के आधार पर गौर करने की हिमायत की, हालांकि मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया.

इस तरह के किस्से और घटनाएं आये दिन आते रहते हैं और सरकार तथा न्यायपालिका अपना पल्ला झाड़ते रहते हैं परंतु आपसी सामंजस्य की कमी तो अवश्य है और दोनों को मिलकर इस कमी को दूर करना होगा क्योंकि कोई तीसरा पक्ष नहीं है जो इनके बीच संवाद और सुलह का माध्यम बन सके.अतः उम्मींद है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका आपसी मतभेदों को भुलाकर भारत की भलाई के कार्यों को महत्व देंगी!


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