इस देश में कुछ मुद्दे और कानून ऐसे हैं जिनमें बहुत आग है, उनको छूने से अक्सर हाथ जल जाता है


 


इस देश में कुछ मुद्दे और कानून ऐसे हैं जिनमें बहुत आग है, उनको छूने से अक्सर हाथ जल जाता है. इनसे पैदा होने वाली आग या तो राजनीतिक हलकों में लगती है या किसी मजहब विशेष में या दलाल स्ट्रीट्स ऑफ़ मीडिया में. इन ज्वलनशील मतलब अतिसंवेदनशील मुद्दों में शामिल है सेकुलरिज्म, आरक्षण, तीन तलाक, समान नागरिक संहिता, नारीवाद से जुड़े मसले हो या आतंक के धर्म की बात. अगर इन पर कोई कुछ बोलता है तो या तो उसे माफ़ी मांगनी पड़ती है या किसी तरह की क़ानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है. कई मामलों में तो हिंसक विरोध भी झेलना पड़ता है.

सेकुलरिज्म नाम के अंगारे को कुछ दिन पहले केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने छू लिया, जिससे उनका हाथ तो जला ही, साथ ही विपक्ष ने संसद में और मीडिया ने देश में भूचाल ला दिया. आखिर में हेगड़े को सफाई देनी ही पड़ी और माफ़ी मंगनी पड़ी. दरअसल कुछ दिन पहले हेगड़े ने कोप्पल जिले के यलबुर्गा में ब्राह्मण युवा परिषद् और महिलाओं के प्रोग्राम को सम्बोधित करते हुए बयान दिया की ”सेक्युलर लोग नहीं जानते कि उनका खून क्या है? हां, संविधान यह कहने का अधिकार देता है कि हम सेक्युलर हैं और कहेंगे भी. लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुका है, हम इसे भी हटाएंगे,इसलिए सत्ता में हैं.”…”अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिंदू हूं तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं. लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं.”

आखिर मीडिया और नेता किस आधार पर इसे असंवैधानिक कह रहे हैं. उन्होंने संविधान में बदलाव की बात कही है. अगर सेकुलरिज्म शब्द की सच्चाई की बात करें तो ये भी तो बाद में जोड़ा गया है. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संसोधन के बाद संविधान के मुख्य वास्तुकार बाबा साहब द्वारा ख़ारिज किये गये शब्द सेकुलरिज्म को जोड़ा गया. यह निश्चित रूप से संविधान की मूल भावना और पवित्रता के खिलाफ था.

कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां सेकुलरिज्म के मसले पर बात करने वालों इसमें संसोधन की बात करने वालों को संविधान का हत्यारा कहती हैं. हकीकत ये है कि कांग्रेस की सरकारों ने अपनी सुविधानुसार कई बार संविधान में बदलाव किये. धर्मनिरपेक्षता भी इनमें से एक है जिसे बिना किसी बहस के आपातकाल के दौरान संविधान में घुसा दिया गया.

आज आलम ये है कि छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू धर्म को हानि पहुंचायी जाती है, हिंसा की जाती है, खुला जिहाद होता है, और तो और हिन्दू धर्म को और हिन्दूप्रतीकों को गाली तक दी जाती और तब सेकुलरिज्म के ठेकेदारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती. लेकिन दूसरी ओर अगर ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण की या इस्लाम की बुराइयों पर कोई बात कर लेता है, तो हंगामा खड़ा हो जाता है. हेगड़े का बयान ही पहला मौका नही हैं जब देश की सियासत में धर्मनिरपेक्षता को खतरे में बताकर भूचाल लाया गया हो, पिछले साल ही संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सेकुलरिज्म पर दिए बयान के बाद भी खूब हंगामा किया था.

लेकिन देश के कुछ असली हीरो और महापुरुष जिन्हें आज भी उनकी महानता और त्याग के लिए याद किया जाता हैं. उनकी राय इस मसले पर किस प्रकार की थी.

 डॉ. भीमराव अंबेडकर:

खुद डॉ. अंबेडकर सेकुलरिज्म को संविधान में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे और उस समय उन्होंने ऐसा होने भी नहीं दिया. भारत के सन्दर्भ में सेकुलरिज्म को लेकर बाबा साहेब के क्या विचार थे. 15 नवम्बर 1948, को संविधान सभा की बहस के दौरान बिहार से सदस्य के. टी. साह द्वारा समाजवाद और सेकुलरिज्म को जोड़ने की सिफारिश करने के जवाब में डॉ. अंबेडकर का जवाब-  “महोदय, मुझे अफसोस है कि मैं प्रो. के. टी. शाह के संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता हूं. राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, सोसाइटी को अपने सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित किया जाना चाहिए, जो कि समय और परिस्थितियों के अनुसार लोगों द्वारा खुद तय किया जाना चाहिए. इसे संविधान में ही नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि यह पूरी तरह से लोकतंत्र को नष्ट कर रहा है, “दूसरा कारण यह है कि संशोधन पूरी तरह अनावश्यक है”

महात्मा गांधी:

कांग्रेस के सबसे बड़े आराध्य और देश के बापू महात्मा गांधी ने भी इस पर विचार दिए हैं.  धनंजय कीर द्वारा लिखित किताब गांधी जी की जीवनी में लिखा है ‘’मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमान क्रूर और हिन्दू कायर होते हैं, मोपला और नोआखली के दंगों में मुसलमानों द्वारा की गयी असंख्य हिन्दुओं की हिंसा को देखकर अहिंसा नीति से मेरा विचार बदल रहा है’’.

सरदार वल्लभ भाई पटेल:

सरदार पटेल ने संविधान सभा के दौरान दिए अपने मैं भाषण में कहा था- “अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को (सेकुलरिज्म) यहां फिर अपनाया जा रहा है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था. मुसलमानों की पृथक बस्तियां बसाई जा रहीं हैं. मुस्लिम लीग के प्रवक्ताओं की वाणी में भरपूर विष है. मुसलमानों को अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए. मुसलमानों को अपनी मनचाही वस्तु पाकिस्तान मिल गया है, वे ही पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं, क्योंकि मुसलमान देश के विभाजन के अगुआ थे, न कि पाकिस्तान के वासी. जिन लोगों को मजहब के नाम पर विशेष सुविधांए चाहिंए, वे पाकिस्तान चले जाएं, इसीलिए उसका निर्माण हुआ है. वे मुसलमान लोग पुनः फूटकेबीजबोनाचाहते हैं, हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो.”

लाला लाजपत राय:

मुस्लिम कानून और मुस्लिम इतिहास को पढ़ने के पश्चात, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उनका मजहब उनके अच्छे मार्ग में एक रुकावट है. मुसलमान जनतांत्रिक आधार पर हिन्दुस्तान पर शासन चलाने हेतु हिन्दुओं के साथ एक नहीं हो सकते. क्या कोई मुसलमान कुरान के विपरीत जा सकता है? हिन्दुओं के विरूद्ध कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा क्या हमें एक होने देगी ? मुझे डर है कि हिन्दुस्तान के 7 करोड़ मुसलमान अफगानिस्तान , मध्य एशिया, अरब , मैसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगें.

महर्षि अरविन्द:

इवनिंग टॉक्स विथ अरविन्द में लिखे अनुसार महर्षि अरविन्द ने कहा है ‘’हिन्दू मुस्लिम एकता असम्भव है क्योंकि मुस्लिम कुरान-मत, हिन्दू को मित्र रूप में सहन नहीं करता. हिन्दू मुस्लिम एकता का अर्थ हिन्दुओं की गुलामी नहीं होना चाहिए. इस सच्चाई की उपेक्षा करने से लाभ नहीं. किसी दिन हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ने हेतु तैयार होना चाहिए. हम भ्रमित न हों और समस्या के हल से पलायन न करें. हिन्दू मुस्लिम समस्या का हल अंग्रेजों के जाने से पहले सोच लेना चाहिए अन्यथा गृहयुद्ध के खतरे की सम्भावना है’’

खैर आज के समय में तो भारत को एक सेक्युलर देश कहा जाता है. संविधान भी यही कहता है. सेकुलरिज्म जो भारत देश के मूल में है. यहाँ के लोगों की प्रकृति में ही है. दुनिया जानती है की पारसी समुदाय को अगर सबसे ज्यादा सम्मान किसी देश में मिला है तो भारत में मिला. यहूदी समाज, जिन्होंने इजराइल को देश के रूप में अस्तित्व में आने के बाद जो इतिहास लिखा है उसमें ये साफ तौर पे स्वीकारा है कि उन्हें भारत में जो सम्मान और सुरक्षा मिली वो और किसी देश में नहीं. ये भारत की असल धर्मनिरपेक्षता है, जबकि इसके इतर यहाँ छद्म धर्मनिरपेक्षता का वकालत मीडिया और नेता अपनी बुद्धि के अनुसार समझ का इस्तेमाल करके, इस तरह के बयानों का विरोध करते हैं. और ये विरोध उन्हें बहुत कुछ देता है, नेताओं को वोट और मीडिया को नोट.


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