सीबीआई मामला : अधिकारियों की यह आपसी फूट गुजरात का इतिहास भी है और वर्तमान भी!


पीएमओ भी अधिकारियों की तू-तू मैं-मैं से बचा नहीं है.

यहाँ तो महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राकेश अस्थाना सीबीआई से ए के शर्मा को क्यों हटाना चाहते हैं? राजीव टोपनो, जिन्हें नियमित रूप से लुटियंस दिल्ली में देखा जाता है, राहुल गांधी के सहयोगी कनिष्क सिंह के साथ, वो ए के शर्मा के खिलाफ फर्जी शिकायतों का सृजन और पीछा क्यों कर रहे हे? “सुपर पीएम” क्यों ए के शर्मा को किनारे करना चाहते हैं और अस्थाना को बढ़ावा देना चाहते हैं?

गुजरात के कैडर अधिकारियों के दो समूहों के बीच चल रहा संघर्ष दिल्ली के सत्ता गलियारों में सबसे गर्म विषय हैं – क्योंकि यह हर हितधारक को घेर रहा है और प्रशासन की नींव को हिलाकर रखने का प्रयास कर रहा है। मई 2014 से, गुजरात कैडर अधिकारियों को राष्ट्रीय राजधानी में महत्वपूर्ण कार्य के लिए चुना गया है। हालांकि, ये सब “सुपर पीएम” के नेतृत्व वाले एक समूह द्वारा नियंत्रित किया जाता है – जो की कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों की एक विशेष मण्डली हें, जिनके पास प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तक बहुत करीबी पहुँच है।

इस पावर मण्डली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि लुटियंस दिल्ली के इतिहास में पहली बार – लगभग सभी – मीडिया व्यक्तियों, वकीलों, नौकरशाहों, राजनेताओं और केंद्रीय मंत्रियों को पक्ष लेने के लिए धकेला जा रहा है। लुटियंस पारिस्थितिक तंत्र में अब द्विध्रुवीय पैमाने है – “आप या तो मेरे हैं या मेरे दुश्मन हैं“। गुजरात कैडर अधिकारी इस विशेष समूह के सदस्यों के बहुत नजदीक नहीं है, जैसा कि नीचे दिए गए उदाहरणों के साथ समझाया गया है।

दृश्य 1: सीबीआई

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) मुख्य रूप से गुजरात कैडर बनाम गुजरात कैडर की इस समस्या से पीड़ित है। राकेश अस्थाना, आईपीएस, विशेष निदेशक, (सुपर पीएम के नेतृत्व वाले समूह का हिस्सा) स्पष्ट रूप से प्रमुख जांच एजेंसी में काम करने के लिए चुने गए थे। वे विभिन्न जाँचों के प्रति उनके दृष्टिकोण के कारण बहुत विवादास्पद भी रहे हैं। हाल ही में रिश्वत के मामले में राकेश अस्थाना के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) भी दायर की गई है, वह भी अहमद पटेल के करीबी विवादास्पद मांस निर्यातक और हवाला ऑपरेटर मोइन कुरैशी केस में पैसे लेने के लिए। इस घटना से पता चलता है कि गुजरात के कई कुटिल अधिकारी न केवल अहमद पटेल के करीब हैं, अपितु मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ भी अच्छी तरह से तारतम्य बनाये हुए हैं।


राकेश अस्थाना / फेसबुक | मोईन कुरैशी / (फाइल फोटो)

यहाँ दिलचस्प कहानी यह है कि राजीव टोपनो (प्रधान मंत्री के निजी सचिव), जो इस मण्डली के बहुत करीब थे, ने बहुत गंभीर प्रयास किया है, ए के शर्मा (आईपीएस, वर्तमान में सीबीआई में अतिरिक्त निदेशक) के खिलाफ फर्जी शिकायतों पर गौर करके। ए के शर्मा सीबीआई द्वारा जांच किये जा रहे/चुके कुछ उच्च प्रोफ़ाइल मामलों के प्रभारी रहे हैं। गुजरात कैडर के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, ए के शर्मा, अस्थाना की तुलना में प्रधान मंत्री के करीब होने के लिए जाने जाते हैं, एक तथ्य यह है कि यह मण्डली उनको हमेशा कम आँकती है। राहुल गांधी द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ए. के. शर्मा और प्रधान मंत्री की निकटता का भी उल्लेख किया गया था। शर्मा उस “अभूतपूर्व मामले” के प्रभारी भी हैं, जिसमें सीबीआई अपने विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की जांच कर रही है।

ख़ास बात यह है कि राजीव टोपनो ने मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान भी पीएमओ में काम किया था और राहुल गांधी के सहयोगी कनिष्क सिंह के बहुत करीबी थे। मोदी के पीएमओ कार्यालय में ऐसे अधिकारी को कैसे रखा गया यह एक लाख डॉलर का सवाल है।

ऑनलाइन समाचार पोर्टल ‘द वायर’ ने हाल ही में रिपोर्ट दी थी कि कोयला घोटाले में और प्रधान मंत्री कार्यालय के सचिव भास्कर खुलबे से संबंधित मामले में राकेश अस्थाना और ए के शर्मा के बीच गंभीर संघर्ष है। पीएमओ में खुलबे और टोपनो कौन लाया?


यह एक ज्ञात तथ्य है कि गुजरात कैडर आईएएस और आईपीएस अधिकारी केंद्र सरकार के प्रशासन में 4% से कम पदों पर कब्जा करते हैं। हालांकि, अधिकांश शक्तिशाली और प्रभावशाली नौकरियां उनके लिए आरक्षित हैं।

इसके अलावा,’द वायर’ द्वारा ही ये रिपोर्ट भी आयी कि 2जी और कोयला घोटाले में शामिल एक प्रमुख कॉर्पोरेट समूह को बचाने में “सुपर पीएम” की गहरी भूमिका है, इसीलिए सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक ए के शर्मा द्वारा इस मामले की जांच करायी जा रही है। राकेश अस्थाना को सीबीआई निदेशक के पद पर बैठाने के लिए व्यस्त लॉबिंग चल रही थी, क्योंकि ए के शर्मा अस्थाना मामले में कथित अपराध के सभी टुकड़ों को एक साथ रखने के लिए तथ्यों के मिलान / भौतिक साक्ष्य खोदने में लगे हुए हैं।

तो यहाँ महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राकेश अस्थाना सीबीआई से ए के शर्मा को क्यों हटाना चाहते हैं? राजीव टोपनो, जिन्हें नियमित रूप से लुटियंस दिल्ली में देखा जाता है, राहुल गांधी के सहयोगी कनिष्क सिंह के साथ, वो ए के शर्मा के खिलाफ फर्जी शिकायतों का सृजन और पीछा क्यों कर रहे है? “सुपर पीएम” क्यों ए के शर्मा को किनारे करना चाहते हैं और अस्थाना को बढ़ावा देना चाहते हैं? इन बहुत ही महत्वपूर्ण सवालों के जवाब सत्ता-प्रशासन में गलती की उस दीमक को स्पष्ट रूप से सामने रखेंगे, जो इस प्रशासन को खोखला कर रही हैं – हर दिन हर प्रहर।

बेहतर स्पष्टता लाने के लिए, राकेश अस्थाना (इस मण्डली के समर्थन के साथ) ने  ए के शर्मा और निदेशक सीबीआई दोनों से एक अप्रत्याशित तरीके से और एक अविश्वसनीय स्तर पर जंग लड़ी। अस्थाना ने निदेशक सीबीआई के खिलाफ शिकायत (जिसे स्पष्ट रूप से “सुपर पीएम” ने तैयार किया था) दर्ज करवाई कि निदेशक ने कैबिनेट सचिव को केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) भेजा था। इस तरह, इस मण्डली ने कैबिनेट सचिवालय, सीवीसी और सीबीआई की संस्थागत अखंडता से समझौता किया, सब एक ही वार में। मुख्य धारा मीडिया में लगातार कुछ चुनिंदा लीक द्वारा झगड़ा बढ़ गया था, जिसने सत्ता गलियारे को कंगारू अदालत में परिवर्तित कर दिया था। ए के शर्मा वह ईमानदार अधिकारी है जो अंदर से अस्थाना से लड़ रहे हैं, चिदंबरम मामले में आरोप-पत्र दाखिल करने के लिए ज़िम्मेदार हैं, और निकट भविष्य में कुछ अन्य संवेदनशील जांच खत्म करने की उम्मीद में हैं।

दृश्य 2 – वित्त मंत्रालय

1985 बैच अधिकारी जी सी मुर्मू, प्रधान मंत्री के करीब होने के लिए जाने जाते हैं और “बैंकिंग और वित्तीय सेवा” विभाग में हसमुख अधिया के अधीन काम कर रहे थे। हालांकि, सभी हितधारकों के साथ स्वतंत्र और मैत्रीपूर्ण होने के नाते, मुर्मू अधिया के “दाएं” हाथ रहकर समाप्त नहीं हुए। दिसंबर 2008 में मुर्मू ने राजस्व सचिव की कुर्सी पर आखिरकार अपनी नजर टिकाई, तो अधिया उन्हें दबाने के लिए तैयार थे। इसके लिए पी डी वाघेला (आयुक्त, कराधान) के लिए अधिया ने बेतरतीब ढंग से लॉबिंग की।


यह वित्त मंत्रालय में एक उजागर रहस्य है, कि अधिया ने मुर्मू को न सिर्फ किनारे किया, बल्कि महत्वपूर्ण निर्णय वाले लगभग सभी मुद्दों पर उनके विचारों की अवमानना भी की है। कहानी की नैतिक शिक्षा – यदि आप वित्त मंत्रालय में सफल होना चाहते हैं तो कभी भी अधिया के साथ गलत तरीके से न उलझें!

नार्थ-ब्लॉक में दबी आवाज में संकेत मिलता है कि नवंबर 2018 के बाद भी वाघेला के माध्यम से अधिया वित्त मंत्रालय को नियंत्रित करना चाहते थे। इस बात के प्रमाण के लिए तथ्य भी हैं – अधिया जिन्होंने अतीत में वित्त मंत्री के प्रति सौजन्य या सम्मान व्यक्त नहीं किया था, अचानक अपने रास्ते से बाहर आकर वित्त मंत्री के साथ निकटता की बढाई, जो की मुर्मू को पसंद नहीं था। इसी तरह अधिया, मुर्मू को राजस्व सचिव बनने से रोकने के लिए इस निकटता का पूंजीकरण करना चाहते हैं।मुर्मू को वित्त मंत्रालय में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं दिया गया और उनके कार्यकाल के अधिकांश भाग के लिए, आधिया के प्रति उत्तदायित्व निश्चित किया गया। सीबीडीटी और सीबीईसी के सभी नौकरशाहों ने जी सी मुर्मू के लिए एक विशेष स्नेह और प्रेम विकसित किया है, जो हसमुख अधिया के खाते में नहीं है। इसने अधिया में असुरक्षा की गंभीर भावना पैदा की है। अधिया ने महत्वपूर्ण बैठकों के लिए मुर्मू की विदेश यात्राओं का विरोध किया, उनके विचारों और फाइल प्रस्तावों को नकार दिया, उन्हें अतिरिक्त सचिव पद पर पदावनत कर दिया।

यह वित्त मंत्रालय में एक उजागर रहस्य है कि अधिया ने मुर्मू को न सिर्फ किनारे किया, बल्कि महत्वपूर्ण निर्णय वाले लगभग सभी मुद्दों पर उनके विचारों की अवमानना भी की है। कहानी का नैतिक शिक्षा – यदि आप वित्त मंत्रालय में सफल होना चाहते हैं तो कभी भी अधिया के साथ गलत तरीके से न उलझें!

दृश्य 3 – पीएमओ

यह “गुजरात कैडर बनाम गुजरात कैडर” नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक, दोनों सत्ता के गलियारों में एक व्यापक समस्या है। प्रधानमंत्री कार्यालय भी इससे अछूता नहीं है। 1979 बैच गुजरात कैडर अधिकारी के कैलाशनाथन की प्रविष्टि को लगातार “सुपर पीएम” द्वारा अवरुद्ध किया गया, जो नई केंद्र सत्ता के निर्माण से डरते हैं। 1983 के गुजरात कैडर आईएएस, जो वर्तमान में गुजरात के मुख्य सचिव हैं, जे एन सिंह के मामले में भी बिल्कुल इसी तरह के एजेंडे का पीछा किया गया था। यह एस के नंदा, आईएएस 1978 गुजरात कैडर के मामले में और भी स्पष्ट हो गया, जिसे प्रधान मंत्री द्वारा दिल्ली लाया गया था। नंदा को निदेशक, आवास और शहरी विकास निगम (हुडको) के महत्वहीन पद पर भेज दिया गया था।

यह एक ज्ञात तथ्य है कि गुजरात कैडर आईएएस और आईपीएस अधिकारी केंद्र सरकार के प्रशासन में 4% से कम पदों पर कब्जा करते हैं। हालांकि, अधिकांश शक्तिशाली और प्रभावशाली नौकरियां उनके लिए आरक्षित हैं। यह पहली बार नहीं है कि दिल्ली के सत्ता गलियारे में ऐसी घटनाएँ हो रही है। लेकिन हां, यह पहली बार है जब सत्ता चैनलों को नियंत्रित करने वाले कैडर या समूह के अधिकारियों के बीच इतनी गंभीर लड़ाई और परेशानी सामने आयी है । यह लगभग निश्चित रूप से उजागर होता है कि अगर अनदेखा किया गया, तो आने वाले दिनों में यह प्रशासन की नींव को नष्ट कर सकता है।

दृश्य 4 – जारी रहेगा …


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