मूलतः इस लेख को ऑस्ट्रेलियाई ऑनलाइन मैगजीन किल्लेट ‘Quillette’ के सब एडिटर और जर्नलिस्ट एंडी गो ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के लिए अंग्रेजी में लिखा है. ‘द आर्टिकल’ के रीडर्स को पढ़ने के लिए अभिषेक सिंह राव ने इसका हिंदी में अनुवाद किया है. इन दिनों ब्रिटेन में हुए शरणार्थियों के द्वारा लगातार जेहादी हमलों,  इस्लामिक तौर-तरीकों के बढे हुए प्रचलन और निकाब पर बैन लगाने के लिए बड़ी बहस मची हुई है. इससे पहले भी विवादित इस्लामिक प्रचारिक और ‘इस्लाम4यूके’ की मुहीम छेड़ने वाले अंजेम चौधरी के कन्विक्शन का ब्रिटेन गवाह रहा है. एंडी गो के ‘इस्लामिक इंग्लैंड’ के नैरेटिव इस लेख पर एक के बाद एक कड़ी प्रतिकिया आ रही हैं और एक विवाद खड़ा हुआ है. 

अन्य पर्यटक लंदन को शायद इसकी सैर-सपाटे की शानदार जगहों और इतिहास के लिए याद करते हैं, लेकिन मैं इसे इस्लाम के लिए याद करता हूँ! सन 2006 में, किशोरावस्था के दिनों  में, मैं लंदन घूम रहा था, तब एकरोज मैं पूर्वी लंदन के बाजार में खो गया था. वहां मैंने महिलाओं के एक ग्रुप देखा जो सिर से पैर की अँगुलियों तक काले रंग का लबादा पहने हुई थी. तब इन बिना चेहरों के फिगर्स को देखकर मैं डरकर जम गया, परेशान हुआ और भयभीत हो गया. निकाब के साथ वह मेरा पहला सामना था, जो एक औरत की आंखों के अलावा सबकुछ ढक देता है.

इस गर्मी में, मैंने फिर से लन्दन का रुख किया क्यूँकि वहाँ इस्लामिक लिबास की बहस मची हुआ है ! देश के पूर्व विदेश सचिव और लंदन के पूर्व महापौर बोरिस जॉनसन ने चेहरा ढकने वाले नकाबों पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों के विरोध में एक कॉलम लिखा है. फिर भी, उन्होंने कहा,”यह बिल्कुल हास्यास्पद है कि लोगों को लेटर बॉक्स की तरह दिखने का विकल्प चुनना पड़ रहा है.” इस पर प्रतिक्रियाओं को शायद ही कभी और ज्यादा गरमाया जा सकता है.

खैर, मैं अपने वाद-विवाद वाले अतीत को ख़त्म करना चाहता था और खुद ही लंदन के मुस्लिम समुदायों का अनुभव करना चाहता था. इसलिए मेरी पहली यात्रा पूर्वी लंदन के एक नगर टॉवर हैमलेट्स में करना तय किया जहाँ की मुस्लिम आबादी करीब 38% है, पूरे यू.के. में सबसे ज्यादा. जैसे ही मैंने व्हाइट चैपल रोड पर चलना शुरू किया, पड़ोस से अजान की पुकार गूंजने लगी. जुम्मा, शुक्रवार की नमाज़ के लिए मुस्लिम एक दिशा में जा लगे जबकि गैर-मुस्लिम विपरीत दिशा में. दोनों समूहों ने एक-दूसरे से अपनी दूरी बनाए रखी थी और आंखों का संपर्क भी नहीं होने दे रहे थे.

महिलाओं और लड़कियों ने हिजाब, निकाब और अबायस पहना हुआ था. कुछ आदमियों ने जालीदार मुसलमानी टोपियाँ और अरबी पोशाकें पहन रखी थी और उनके पतलून पैग़म्बर मुहम्मद के उदाहरण के अनुसार पैरों के टखनों से ऊपर सिले गए थे. रियाद के बाहर का यह दृश्य ब्रिटेन के दक्षिण एशियाई मुसलमानों के अरबी-करण हो जाने के लिए एक प्रमाण की तरह घठित हुआ था. नाई की दुकान के बाहर, महिलाएं तपते सूरज के नीचे इंतजार कर रही थीं, जब उनके बेटें और पति तैयार हो रहे थे.

पूर्वी लंदन की इस मस्जिद के अंदर आगंतुकों को ‘सभ्य तरीके के’ कपड़े पहनने की हिदायत दी गई थी. जिस भी महिला का सिर स्कार्फ के बगैर दिखाई दे रहा था उनके लिए रिसेप्शन से हेड-स्कार्फ दिए किए जा रहे थे. स्टाफ कर्मचारियों में से एक सज्जन आदमी ने मुझे पुरुषों के क्वार्टर चारों ओर से दिखाए. उसने मुझे इस्लाम के बारे में पुस्तिकाओं से भरा बैग दिया. इन पुस्तिकाओं में से एक में बताया गया था, मुसलमानों को ‘शरिया’ या इस्लामी कानून को फिर से स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. जो लोग इस जनादेश को अनदेखा करते हैं वे “किसी भी समाज के लिए कम मूल्यवान हैं.”उस रात, मैंने संसद के सदनों का दौरा किया. जैसे ही मैं मेट्रो रेल के ट्यूब से बाहर आया तो एक बन्दूक-धारी पुलिस ऑफिसर ने मेरा अभिवादन किया. पिछले साल वेस्टमिंस्टर में, खालिद मसूद ने कार और चाकू से हमला कर पांच लोगों की हत्या कर दी थी उसके बाद से यहाँ अतिरिक्त सुरक्षा को बहाल किया गया था. स्टेशन के बाहर, वेस्टमिंस्टर ब्रिज के सहारे रोडब्लॉक्स तैनात किये गए थे, पैलेस यार्ड के सामने एक नई सुरक्षा बाड़ लगा दी गयी थी. मैंने एक अधिकारी से मसूद के हमले के बारे में पूछना चाहा तो उसने ‘इसके बारे में बात नहीं करना’ चाहते हुए बस जवाब दिया. “मैं उस दिन वहीं था.”


उस रात, मैंने संसद के सदनों का दौरा किया. जैसे ही मैं मेट्रो रेल के ट्यूब से बाहर आया तो एक बन्दूक-धारी पुलिस ऑफिसर ने मेरा अभिवादन किया. पिछले साल वेस्टमिंस्टर में, खालिद मसूद ने कार और चाकू से हमला कर पांच लोगों की हत्या कर दी थी उसके बाद से यहाँ अतिरिक्त सुरक्षा को बहाल किया गया था. स्टेशन के बाहर, वेस्टमिंस्टर ब्रिज के सहारे रोडब्लॉक्स तैनात किये गए थे, पैलेस यार्ड के सामने एक नई सुरक्षा बाड़ लगा दी गयी थी. मैंने एक अधिकारी से मसूद के हमले के बारे में पूछना चाहा तो उसने ‘इसके बारे में बात नहीं करना’ चाहते हुए बस जवाब दिया. “मैं उस दिन वहीं था.”

ईस्ट लंदन की अपनी यात्रा के अड़तालीस घंटे बाद, मैं इस खबर से जाग गया कि एक कार ने वेस्टमिंस्टर सुरक्षा बाधा को तोड़ दिया था. पुलिस ने 29 वर्षीय सूडानी शरणार्थी सलीह खातेर को गिरफ्तार किया था, जिसे ब्रिटेन में शरण और ब्रिटिश नागरिकता दी गई थी. हमले में तीन लोग घायल हो गए थे. इसके बाद से लंदन के महापौर सादिक खान ने ‘पार्लियामेंट स्क्वायर’ के कुछ हिस्सों में वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाने के लिए समर्थन व्यक्त किया था.

इसके बाद मैंने पूर्वी लंदन के एक और डिस्ट्रिक्ट, लेटन का दौरा किया जहाँ कुछ मुस्लिम सामाजिक मानक प्रचलित हैं. ट्यूब स्टेशन के पास एक अरब कैफे पुरुषों से भरा था; अंदर कोई महिला नहीं थी. एक इस्लामी बुकस्टोर में बच्चों के लिए हिजाब पहने हुए गुडियाएं बेची जा रही थी. ये गुड़ियाएं खाली और आकृतिहीन चेहरे वाली थी, क्यूँकि रूढ़िवादी इस्लाम में मानव चित्रण प्रतिबंधित हैं.

मैं दोपहर की नमाज़ के पहले दक्षिण एशियाई सलाफी मस्जिद और मदरसा, मस्जिद अल-तावहिद के बाहर रुक गया. लबादों और निकाबों वाली लड़कियों का एक ग्रुप, कचरा डालने की जगह जहां महिला प्रवेश द्वार स्थित था, उस तरफ से गुजरा. बाद में मैंने इस्लामी शरिया काउंसिल ऑफ लेटन को देखा. एक अलग पहचान बनाए रखने के लिए इस समुदाय में धार्मिक, शैक्षिक, व्यापार और कानूनी संस्थान हैं.

इन सबने मुझे ठहराव दिया. लेकिन लंदन से तीस मील उत्तर में और इंग्लिश डिफेन्स लीग के जन्मस्थल ल्यूटन में जो कुछ मैंने देखा, उसके लिए मैं तैयार नहीं था, जहाँ उपद्रवी मुस्लिम-विरोधी प्रदर्शनों का आयोजन किया गया था. सेंट्रल मस्जिद में, मैं पंजाबी बोलने वाले जवानों के ग्रुप से मिला. “यू हैव कम टू सी ल्यूटन ?” उनमें से एक ने मुझे अंग्रेजी में पूछने के लिए जेहमत की. जवानों ने मुझे टाउन सेंटर होते हुए पीछे अपने पीछे आने को कहा.

कुछ ही मिनटों में, हम तीन अन्य मस्जिदों में गए, जो नवयुवकों के आने-जाने से जीवंत और भरी हुई थी. हम एक बंद और पुराने चर्च से भी पसार हुए, जिसकी एक खिड़की को अंडे मार-मार कर बर्बाद कर दिया था. हमें ईद अल-अदहा की छुट्टी की तैयारी में व्यस्त सैकड़ों निवासियों द्वारा दबा दिया गया. हिजाब में लड़कियाँ उनके हाथों में मेहन्दी लगवाने के लिए टेबल के चारों ओर इकट्ठा हुई थीं. सभी व्यवसायों में धार्मिक स्वभाव था. भोजनालय हलाल थे, फिटनेस सेंटर अलग-अलग लिंगों के लिए बने हुए थे और फैशन के सामान की दुकानों ने पुतलों पर ‘लज्जावान’ कपड़ों को प्रदर्शित किया था. पाकिस्तानी झंडे ऊँचे और गर्व से लहरा रहे थे. वहाँ मैंने यूनियन जैक कभी नहीं देखा.

आखिर में, वे लोग अंत में मुझे एक विचारशील इमारत की ओर ले गए जिसमें एक छोटा इस्लामिक केंद्र था. उन्होंने अपने इमाम से निजी तौर पर बात की. उसे देखने के लिए मुझे ऊपर की ओर ले जाया गया था. इमाम ने मुझसे पूछा कि क्या मैं धर्मांतरण करने के लिए तैयार हूँ. जाहिर तौर पर, इन जवानों के साथ कुछ मिसकम्युनिकेशन हुआ लगा. मैंने इमाम से कहा कि मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ, लेकिन मैं कोई भी साहित्य की सराहना करूँगा जिसे मैं घर ले सकता हूं. वह मुझे एक किताबों की दुकान में ले गया और बोला कि मैं जो भी चाहता हूँ ले सकता हूँ. मैंने पहली किताब उठाई जो अंग्रेजी में थी. यह भारत के एक कट्टरपंथी प्रचारक जाकिर नायक की थी. “कुरान का कहना है कि हिजाब महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया है,” किताब ने एक सेक्शन में बताया गया है, “ताकि वे भद्र महिलाओं के रूप में पहचानी जा सकें और इससे उन्हें छेड़छाड़ से भी रोका जा सकें.”

अन्य पर्यटक लंदन को बकिंघम पैलेस, पिकैडिली सर्कस और बिग बेन के लिए याद कर सकते हैं. मैं इसे इसकी विफल हुई बहु-संस्कृतिवाद के लिए याद रखूंगा. या शायद हो सकता है ऐसा ही एक सफल बहु-संस्कृतिवाद दिखता हो!

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