लोग कहते हैं कि ज़माना ‘कंटेंट ओरिएंटेड’ फिल्मों का है. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि एक्टर कौन है, डायरेक्टर कौन है, प्रोड्यूसर कौन है, फिल्म के कंटेंट में दम होना चाहिए! एक बार हो सकता है कि उस फिल्म से आपका मनोरंजन ना हो लेकिन दमदार कंटेंट है तो फिल्म की सराहना होती है.

‘द ताशकंद फाइल्स’ की रिलीज़ के पहले ऐसा ही कुछ फ़िल्मी और मीडिया के दिग्गज बात किया करते थे और शायद आगे भी करेंगे लेकिन इस बार एक सुनियोजित तरीके से इस बेहतरीन फिल्म को इग्नोर किया और करवाया जा रहा है.

मैंने जैसे पढ़ा है, भारत में सिनेमा का आगमन सामाजिक चेतना के लिए हुआ था. सवालों और जिज्ञासाओं की बुनियाद पर जवाब ढूंढने वाली जनता को सिनेमा के पहले भी नाटकों, रामलीलाओं, भवाईयों के माध्यमों से सच्चाई परोसी जाती थी. लेकिन धीरे-धीरे हमारा सिनेमा वेस्ट से प्रभावित हुआ, बोल्ड हुआ और सामाजिक बुराइयों का प्रतीक बनने लगा.

आज यदि एक आम आदमी की भी आकस्मिक मौत हो तो उसका पोस्टमार्टम होना आम बात है लेकिन भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हराया,उसके बाद संधि समझौता करने के लिए उनको ताशकंद बुलाया गया और हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटो में उनकी मौत हो गई. पढ़ने पर ही बेहद रहस्यमय घटना प्रतीत होती है लेकिन पोस्ट मार्टम को जरुरी नहीं समझा जाता. जबकि उनके शरीर का नीला पड़ना और खून भरे कट्स साफ नजर आ रहे थे.

इतने संवेदनशील मुद्दे पर फिल्म बनाना अपने आप में ही हिम्मत वाला काम है.

सैंकड़ो आरटीआई, इंटरव्यूज, दौरे, मुखबिरों से बातचीत और 3 साल की रिसर्च के बाद यह फिल्म स्क्रीन तक आई है और देखने के बाद आँख खुलने के साथ एक भाव बेचैनी का सबक बनता है जो आने वाले समय में जब-जब शास्त्री जी का नाम या तस्वीर सामने आएगी, हम उन सवालों को भुला नहीं पाएंगे जो इस फिल्म में पूछे गए हैं.

मारधाड़, रोमांस और सॉफ्ट-पोर्न के मसालों से इतर यह फिल्म उन लोगों के लिए खास है जो इतिहास और राजनीति में थोड़ी बहुत रूचि रखते हैं. यदि नहीं भी रखते हैं तो एक बार जाइये, रूचि अपने आप आ जाएगी. आपका मनोरंजन शायद ना भी हो लेकिन फिल्म देखकर जब बाहर निकलेंगे तो भेड़ियों के भेष में हर दिन जो लोग राजनितिक आतंकवाद, सामाजिक आतंकवाद, न्यायिक आतंकवाद और बौद्धिक आतंकवाद फैला रहे हैं, उनका चेहरा जरूर बेनकाब हो जाएगा.

पत्रकार-गण तो इसे इग्नोर कर ही नहीं सकते क्योंकि यह फिल्म खोजी पत्रकारिता की सबसे बड़ी मिसाल है. फिर भी विडंबना देखिये कि इसी पत्रकारों की जमात में से एक ने इस फिल्म को ज़ीरो रेटिंग दी है. क्या कभी आज से पहले आपने सुना है ज़ीरो रेटिंग के बारे में? मैंने तो नहीं सुना! भारत की सबसे ख़राब फिल्मों के बारे में जब गूगल किया तो हिमेश की कर्ज, अजय की हिम्मतवाला, रामगोपाल वर्मा की आग, अक्षय की तीस मार खान, प्रियंका की लव स्टोरी 2050 जैसे नाम सामने आये लेकिन इन फिल्मों को भी कभी एक से नीचे का रेटिंग नहीं मिला फिर ‘द ताशकंद फाइल्स’ को क्यों?

कई बार हो सकता है फिल्म उतनी अच्छी नहीं बनी हो लेकिन समीक्षक उस फिल्म के एक्टर्स के बारे में बात करना नहीं भूलते. ‘द ताशकंद फाइल्स’ में नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती, पंकज त्रिपाठी, राजेश शर्मा, विनय पाठक, प्रकाश बेलावाड़ी जैसे उम्दा एक्टर्स है लेकिन उनकी एक्टिंग को लेकर भी कहीं बात नहीं हो रही. क्या आपको यह आम बात लगती है? क्या एकाएक इन सबकी एक्टिंग बेकार हो गई?

फिल्म में लीड एक्ट्रेस श्वेता बासु का अभिनय भी क़ाबिल ए-तारीफ़ है.

यह सब छोड़िये, एक से बढ़कर एक धांसू डॉयलोग्स होते हुए भी उनकी भी कहीं चर्चा नहीं! मुझे जितने याद है – “राजनीति में कुछ सच नहीं होता यही उसका सच है.” “लोग सच नहीं सच की कहानी सुनना पसंद करते है.” “कौन कहता है कि मरे हुए पीएम से किसी का फायदा नहीं होता.” “शास्त्री जी को दो बार मारा गया. एक ताशकंद में और फिर सिस्टमेटिकली लोगों की याद में.” “ये सत्य और अहिंसा का देश है, ये गांधी और नेहरू का देश है… शास्त्री जी का क्यों नहीं?” “श…श…श… कुछ मत बोलो, सेक्युलेरिज्म है.”

सवाल बहुत हैं लेकिन इन सबका जवाब सिर्फ एक ही है – ‘द ताशकंद फाइल्स’. शास्त्री जी की मौत से जुड़े सवालों का भी जवाब मिल जाएगा और खुद के सवालों का भी. साथ ही पोलिटिकल टेररिज्म, सोशल टेररिज्म, जुडिशल टेररिज्म और इंटेलेक्चुअल टेररिज्म के नए प्रश्न आपके दिमाग में जन्म लेंगे!

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