आचार्य रामानंद का चलाया संप्रदाय एक अकाट्य सत्य—सेतु है। समाज को एक सूत्र में बांधने का धागा है। मौजूदा राजनीति में सवर्ण और दलित के धड़ों में बंटे लोगों को श्रीमठ की याद नहीं आ रही है। पर वह शताब्दियों से गंगा किनारे खड़ा समरसता फैलाने की साधना में लीन है। स्वामी भगवदाचार्य के जमाने में महात्मा गांधी ने श्रीमठ को ‘सामाजिक समावेशी’ की संज्ञा दी थी, जो 1942 की बात है।   

सात शताब्दियों पहले बनारस के एक जुलाहे कबीर को गुरु की तलाश थी। उन्हें लगता था कि गुरु के बिना कभी सफलता नहीं मिलेगी। उनके मन में काशी में रहने वाले स्वामी रामानन्द को गुरु बनाने की इच्छा जागी। तब स्वामी रामानंद बनारस ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के एक जाने-माने संत थे। उनके हजारों शिष्य थे। उनका रहन-सहन सरल और सहज था। उनका आध्यात्मिक-सामाजिक दायरा बहुत विशाल और जात-पांत से परे था। कबीर जानते थे कि सुबह के अंधेरे में आचार्य रामानंद स्नान करने के लिए श्रीमठ से पंचगंगा घाट की सीढियां उतरते हैं। कबीर उन्हीं सीढिय़ों पर उस जगह लेट गए, जहां से रामानंद गुजरते थे। स्नान के लिए गंगा घाट उतरे स्वामी रामानंद का पांव कबीर पर पड़ा। बहुत अफसोस और अपराधबोध के साथ अंधेरे में रामानंद ने झुककर कबीर को उठा लिया और कहा, ‘राम-राम बोलो, तुम्हारा सारा दुख दूर होगा।’ बस फिर क्या था, कबीर को राम मंत्र मिल गया। उन्हें गुरु मिल गए और कबीर की ‘चदरिया झीनी-झीनी’ हो गई।

स्वामी रामानंद ने कबीर को पहचाना था कि यह शिष्य मामूली नहीं है। यदि यह तथाकथित छोटी जात का जुलाहा है, तो क्या हुआ। उन्होंने कबीर को शिष्य स्वीकार कर लिया। स्वामी रामानंद ऐसे अद्भुत गुरु थे, जिन्होंने जातियों और वर्गों के खेमों में बंटे भारतीय समाज में उद्घोष किया, ‘जात-पांत पूछे नहीं कोई, हरि को भजे से हरि का होई।’ रामानंद ने कबीर को कैसे चेताया और कितना चेताया, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि कबीर की भक्ति संवेदना में गुरु का स्थान गोविंद से बड़ा है। इसीलिए कबीर जब कभी स्वामी रामानंद का नाम लेते हैं तो वे उनका बड़े गौरव और श्रद्धा से लेते हैं-‘कहै कबीर दुविधा मिटी गुरु मिल्या रामानंद।’ सत्रहवीं सदी में हुए इतिहासकार मुहसिन फनी ने अपनी पुस्तक ‘दबिस्तां-ए-मजाहिब’ में लिखा है, ‘कबीर जन्म से मुसलमान थे पर वे स्वामी रामानंद के शिष्य बनना चाहते थे क्योंकि रामानंद ‘राम’ को जानते थे।’

स्वामी रामानंद की शिष्य मंडली में कपड़े बुनने वाले कबीर ही नहीं थे बल्कि उसमेंं चर्मकार रैदास भी शामिल थे, जो चमड़े का काम करते थे और काशी की गलियों में जूते सिलते थे। वहांं धन्ना जाट थे तो संत सेन नाई भी, जो लोगों के बाल बनाते थे। पीपा दर्जी, सदन कसाई, कूबा कुम्हार समेत अनेक उन जातियों के संत-भक्त-कवि रामानंद के चलाए संप्रदाय के हिस्से थे, जो ‘राम-राम’ की गुंजार फैलाकर समाज में जातिसत्ता पर गहरी चोट मार रहे थे। 

आचार्य रामानंद ऐसे गुरु थे, जिन्होंने जन्म सत्ता की बजाय व्यक्ति सत्ता को महत्त्व दिया। भारतीय समाज को एकजुट करके एक ऐसी राह दिखाई, जिस पर देश आज भी चल रहा है। ऊंच-नीच को न मानने वाला भारतीय संविधान तो बाद में बना, लेकिन प्रयाग में ब्राह्मण कुल में जन्मे स्वामी रामानंद ने यह नींव 14वीं सदी में ही रख दी थी, जिसे ‘मध्यकालीन भक्ति आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपने प्रवचन और लेखन का आधार संस्कृत के साथ देशज भाषाओं को भी बनाया। अपने एक संस्कृत ग्रंथ ‘वैष्णव-मताब्ज-भास्कर’ में उन्होंने शास्त्रों के आधार पर यह घोषणा ही कर दी कि ‘भगवान अपनी भक्ति में जीवों की जाति, बल और शुद्धता की अपेक्षा नहीं करते। सभी समर्थ और असमर्थ जीव भगवान को पाने में समान अधिकारी हैं।’ 

स्वामी रामानंद का यह अवदान है कि उन्होंने मुगल आततायियों के सामने मजबूत भारतीय समाज खड़ा किया था। उनके आनंद मठ में तथाकथित नीची जातियों के भक्तों-संतों के लिए पर्याप्त जगह थी। यह जगह भी गागरौन के महाराजा पीपा और ब्राह्मण अनंतानंद के साथ। पद्मावती और सुरसरि, दो महिलाओं ने भी उनके बारह प्रमुख शिष्यों में अपनी जगह बनाई थी। वर्ण, लिंग और वर्ग का कहीं कोई भेद नहीं। केवल राम का नाता।  

वे ऐसे गुरु थे, जिनका श्रीमठ आज भी कायम है। उनके और उनके शिष्यों के भी चलाए पंथ आज भी चल रहे हैं। अनेक संत परंपराएं रामानंद के श्रीमठ निकली। दादू, रामस्नेही, वारकरी, घीसा पंथ, कबीर पंथ और रैदास पंथ जैसी ढेर सारी भक्ति-काव्य परंपराओं का मूल उत्स श्रीमठ है। हिंदी साहित्य के अमर ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के लेखक गोस्वामी तुलसीदास रामानंद के शिष्य नरहर्यानंदाचार्य थे। भक्ति साधिका मीरा रामानंदाचार्य के शिष्य रैदास की शिष्या थी। 

काशी में गंगा किनारे बना श्रीमठ शताब्दियों से निर्गुण तथा सगुण रामभक्ति परंपरा का मूल केंद्र है। कालांतर में इसकी हर शाखा ने वृक्ष का रूप ले लिया। मूल मरता चला गया। यह विडंबना है कि आज इनमें से कोई परंपरा शायद ही श्रीमठ में खुद को ढूंढऩा चाहती हो। यह दु:खद आश्चर्य है कि खुद रामानंद संप्रदाय के भीतर भी ‘श्रीमठ’ को चुनौती दी जा रही है, जो एक घिनौना सच है। यह श्रीमठ की अपनी समस्या है जिसे अग्रणी संत तथा विद्वान हल करेंगे। जिस बात पर विवाद है, वह यह है कि श्रीमठ को कब व किसने बनाया? कुछ इसे स्वामी रामानंद का बनाया मानते हैं। दूसरे विद्वानों का मत है कि स्वामी रामानंद को श्रीमठ उनके गुरु राघवानंद से मिला। जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि श्रीमठ मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को सबसे बड़ा केंद्र था। संत साहित्य के विद्वान सुखदेव सिंह इसे मध्यकालीन भारत की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पहचान मानते हैं। रिचर्ड बर्गट ने अपने शोध में पाया कि आज के उत्तर भारत जो हिंदू धर्म है, उसे ‘रामानंदी हिंदू धर्म’ कहना चाहिए। क्योंकि यदि रामानंद न होते तो इसका अस्तित्व बचे रहना मुश्किल था। 

आचार्य रामानंद का चलाया हुआ संप्रदाय जातीय आधार पर टूट रहे समाज के बीच एक अकाट्य सत्य—सेतु है। जहां छुआछूत और खान-पान में कोई भेदभाव नहीं है। समाज को एक सूत्र में बांधने का धागा है, जो भारत में फैल रही जातीय वैमनस्यतारूपी बीमारी की रामबाण दवा है। भले ही मौजूदा राजनीति में सवर्ण और दलित के धड़ों में बंटे लोगों को श्रीमठ की याद नहीं आ रही है। पर वह गंगा किनारे खड़ा शताब्दियों से समरसता फैलाने की अपनी साधना में लीन है। कभी श्रीमठ में स्वामी भगवदाचार्य के जमाने में महात्मा गांधी ने वहां जाकर श्रीमठ को ‘सामाजिक समावेशी’ की संज्ञा दी थी, जो 1942 के शुरूआत की बात है। 

रामानंद का वह विशाल आनंद वन श्रीमठ अब बहुत थोड़ा-सा रह गया है। आश्चर्य कि बात है कि स्वामी रामानंद का वह विशाल श्रीमठ, जहां हजारों फकीर, सैंकड़ों जंगम-जोगड़े, नाथपंथी, वैरागी और संन्यासी रहा करते थे, वहां अब लोगों के घर हैं, तरह-तरह के पड़ाव हैं, मस्जिदें हैं, दुकानें हैं, लोगों के घर हैं। काशी में श्रीमठ के नाम से बहुत जरा-सी पुण्य भूमि बची हुई है, जहां अभी रामानंद संप्रदाय के प्रधान स्वामी रामनरेशाचार्य रहते हैं। रामनरेशाचार्य ने बीते तीन दशकों में श्रीमठ को नया विस्तार दिया है। अब वहां संतों, विद्वानों और विद्यार्थियों का जमघट लगा रहता है। 

जिस तत्परता और आसानी से रामानंदाचार्य ने अपने समय में धर्म और धार्मिक चेतना से उस समय के समाज की विसंगतियां दूर की, उसकी आज फिर जरूरत है। मानवता को आधार बनाकर गंदे तथा नकारात्मक विचारों और सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। आज क्या पर्याप्त कारण नहीं हैं, धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के अंत:संबंधों को केंद्र में रखकर फिर से भक्ति आंदोलन को पुन: परिभाषित करने की? आवश्यकता है एक भाषा, एक मनोवृत्ति और प्रतिबद्धता की, जो परस्पर विरोधी धाराओं को इकट्ठा करके स्वामी रामानंद की तरह रामभक्ति के महासागर में समेट सके।

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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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