भारत के इतिहास में जब कभी पुरातन भाषा की चर्चा होती है, तो निर्विवाद रूप से जिस भाषा का नाम आता है, वह है — संस्कृत। संस्कृत अध्ययन के पुरातन केंद्रों में वाराणसी और दक्षिण भारत के कांची और शृंगेरी जिस भूभाग का नाम सबसे पहले आता है, वह है कश्मीर। कश्मीर का पुराना संस्कृत नाम काश्मीर है, जो अब बदलकर कश्मीर हो गया है। कश्मीर को ‘शारदा देश’ के नाम से पुकारा जाता है। शारदा देश यानी माता सरस्वती का निवास स्थान। इन विशेषण से ही समझा जा सकता है कि कश्मीर में कितने विद्वानों का प्रादुर्भाव हुआ होगा।

कश्मीर भारत में एकमात्र राज्य है जहां अतीत में सबसे लंबे समय तक न सिर्फ पठन-पाठन बल्कि संपर्क भाषा के रूप में भी संस्कृत का इस्तेमाल हुआ। इंग्लैंड के भाषाशास्त्री जॉर्ज ग्रिअर्सन पिछली सदी के शुरुआत में एक दस्तावेज में लिखते हैं,‘बीते दो हजार सालों के दौरान कश्मीर संस्कृत के पठन-पाठन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां संस्कृत में दार्शनिक विमर्श से लेकर शृंगार कथाओं तक की रचना हुई।’

सम्राट् अशोक (300 से 200 ईसा पूर्व) के समय कश्मीर घाटी में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उस समय इस क्षेत्र में संस्कृत की महत्ता इसी बात से समझी जा सकती है कि तब जहां पूरे भारत में बौद्ध धर्म की मूल बातें पाली में लिखी गईं, वहीं कश्मीर में इसकी शिक्षाएं पहली बार संस्कृत में दर्ज हुईं। मध्य एशिया तक संस्कृत का प्रसार कश्मीरी विद्वानों ने ही किया था। उस समय न सिर्फ पूरे भारत से छात्र यहां संस्कृत पढ़ने आते थे बल्कि एशिया के दूसरे देशों के विद्वानों के लिए भी यह संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने कश्मीर में रहकर संस्कृत के माध्यम से बौद्ध धर्म का अध्ययन किया था।

संस्कृत व्याकरण के नियम बनाने वाले पाणिनि के बारे में ज्यादातर विद्वानों की राय है कि उनका जन्म ईसा से चौथी सदी पूर्व पाकिस्तान के खैबर पख्तून्ख्वा में हुआ था। लेकिन इतिहासकारों का एक वर्ग कहता है कि वे दक्षिण कश्मीर के गोद्रा गांव में जन्मे थे। यही कारण रहा होगा कि पाणिनि की अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण का प्राचीन ग्रंथ) पर सबसे ज्यादा टीका कश्मीर के विद्वानों ने ही लिखी हैं।

कश्मीर में संस्कृत 12वीं से 13वीं शताब्दी तक काफी प्रभावी रही। कल्हण का प्रसिद्ध ‘राजतरंगिणी’ ग्रंथ इसी समय की रचना है। प्राचीन भारतीय भाषाओं के अध्येता जॉर्ज बुहेलर (1837 से 1898) का एक दस्तावेज बताता है कि उन्होंने 1875 में कश्मीर की यात्रा की थी और तब उनकी 25 से ज्यादा संस्कृत बोलने वाले पंडितों से मुलाकात हुई और ऐसे दसियों सरकारी अधिकारी भी थे जो उस वक्त संस्कृत बखूबी समझ लेते थे। पिछली सदी में राजनीतिक उथलपुथल के चलते कश्मीर में इस भाषा के विकास पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।

पिछली शताब्दियों में यहां इस्लाम का प्रभाव बढ़ने लगा। ईराक से आए सूफी मीर सैय्यद शमसुद्दीन के प्रभाव से कश्मीर में इस्लाम मानने वालों की आबादी तेजी से बढ़ी। उसके बाद से क्षेत्र में संस्कृत का प्रभाव घटने लगा। पिछली सदी आते-आते कश्मीरी पंडितों में भी संस्कृत का ज्ञान रखने वाले नाममात्र के लोग ही रह गए थे।

वसुधैव कुटुम्बकम्, उद्भट और कश्मीर

हमारा देश संस्कृत में लिखे जिस आदर्श वाक्य से अपने औदार्य को चहुं ओर प्रकट करता है, वह है – ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। पर यह अल्पज्ञात है कि वैर-भाव और अपना-पराया भूलकर सब को अपना बताने वाला यह कथन बारह सौ सालों से ज्यादा पुराना है। इसके लेखक हैं कवि उद्भट। जिस भूमि पर इस उदार भावना को श्लोकबद्ध किया गया, वह भूमि है माता शारदा का निवास स्थान कश्मीर। जिन राजा के शासन में यह ऐतिहासिक वाक्य रचा गया, वे हैं महाराज जयापीड विनयादित्य। पूरा श्लोक इस प्रकार है –

अयं बन्धु: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
पुंसामुदारचित्तानां वसुधैव कुटुम्बकम्॥

इस श्लोक के कई रूप प्रचलित हैं, जिनका लोग उपयोग अमर इतिहास की उदारता बताने के लिए करते हैं। जैसे –

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

श्लोक में तीन पादों से भले छेड़छाड़ इुर्ह हो पर चौथा पाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सर्वत्र समान है, जो हमारी वैदिक चेतना से प्रकाशित है और संसार को भारत के होने का मतलब समझाता है।

उद्भट कश्मीर में हुए महान् संस्कृत कवि थे। वे उद्भट भट्ट, भट्ट उद्भट, उद्भटाचार्य नाम से जाने जाते हैं। महाकवि कल्हण ने राजतरङ्गिणी में लिखा है – जयापीड विनयादित्य नाम के महान् प्रतापी राजा ने 770 से 801 ईस्वी में 31 वर्षों तक कश्मीर के राज्यासन को अलंकृत किया।

महाराज जयापीड स्वयं कवित्व—शक्ति से संपन्न थे, इस नाते उन्होंने बहुत—से पण्डितों को उपहार तथा दक्षिणा देकर अपनी सभा में प्रतिष्ठित किया। इन कवियों में भट्ट उद्भट, दामोदर गुप्त, मनोरथ, शङ्खदत्त, चटक, सन्धिमान्, वामन और क्षीर नामक आठ कवि प्रधान थे। इन कवियों के शिरोमणि उद्भट कवि मधुर कविताओं से महाराज जयापीड को सुपरितोषित करके उनसे प्रतिदिन एक लाख दीनार प्राप्त करते थे। इससे उनके पाण्डित्य की महिमा, कवित्व-शक्ति और चित्त-चमत्कारी कविता निर्माण का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसी अभिप्राय से कल्हण ने राजतरङ्गिणी 4/493 में लिखा है –

समग्रहीत्तथा राजा सोऽन्विष्य निखिलान् बुधान्।
विद्वद्दुर्भिक्षमभवद्यथाऽन्यनृपमण्डले॥

बुद्धिमान् राजा जयापीड ने धरती के सारे विद्वानों को अपने कश्मीर राज्य में प्रतिष्ठित कर लिया। इससे दूसरे राजाओं के राज्यों में विद्वानों का अकाल ही पड़ गया।

राजा जयापीड और कवि उद्भट के इतिहास के प्रणाम में राजतरङ्गिणी 4/487-497 के ये श्लोक पठनीय हैं —

वचो मूर्खोऽयमित्येव कस्मैचिद्वदते स्फुटम्।
सर्वज्ञानं ददच्चक्रे सर्वान् विद्याभियोगिन:॥

देशान्तरादागमय्य व्याचक्षाण: क्षमापति:।
प्रावर्तयत विच्छिन्नं महाभाष्यं महीतले॥

क्षीराभिधाच्छब्दविद्योपाध्यायात् संभृतश्रुत:।
बुधै: सह ययौ वृद्धिं स जयापीडपण्डित:॥

भूपतेरात्मना स्पर्द्धां चक्षमे न स कस्यचित्।
आत्मनस्तु बुधै: स्पर्द्धां शुद्धधीर्बहुमन्यत॥

तावत्पण्डितशब्देऽभूद् राजशब्दादपि प्रथा।
तैस्तैर्दोषैर्न तु म्लानिं कालान्तरवदाययौ॥

नृपतौ विद्वदायत्ते राजसाम्मुख्यकाङ्क्षिभि:।
गृहा बभूवुर्विदुषा व्याप्ता: सेवागतैर्नृपै:॥

अध्यक्षो भक्तशालायां शुक्रदन्तस्य मन्त्रिण:।
विद्वत्तया थक्कियाख्यस्तेन स्वीकृत्य वर्द्धित:॥

विद्वान् दीनारलक्षेण प्रत्यहं कृतवेतन:।
भट्टोऽभूदुद्भटस्तस्य भूमिभर्तु: सभापति:॥

स दामोदरगुप्ताख्यं कुट्टनीमतकारिणम्।
कविं कविं वलिरिव धुर्यं धीसचिवं व्यधात्॥

मनोरथ: शङ्खदत्तश्चटक: सन्धिमांस्तथा।
बभूवु: कवयस्तस्य वामनाद्याश्च मन्त्रिण:॥

अवस्थावेदकास्तत्र ग्रथिता: पृथिवीभुजा।
आर्द्रान्त:करणै: श्लोका: स्मर्यन्तेऽद्यापि सूरिभि:॥
(राजतरङ्गिणी 4/550)

उद्भट कवि ने कुमारसम्भव – काव्यालङ्कारसंग्रह – भामहालङ्कारविवरण नामक तीन ग्रन्थ लिखे। प्रतीहारेन्दुराज नामक विद्वान् ने काव्यालङ्कारसंग्रह की ‘लघुवृत्ति’ टीका लिखकर उद्भट द्वारा इन तीन ग्रंथों के प्रणयन की चर्चा की है। अंगेज विद्वान् वुलार ने ‘काव्यालङ्कारसंग्रह’ पर ‘कश्मीररिपोर्ट’ नामक पत्र में लिखा है – ‘उद्भट जयापीड राजा से प्रतिदिन एक लाख दीनार प्राप्त करते थे। पर उन्होंने कोई बड़ा संस्कृत ग्रंथ नहीं लिखा। उद्भट के द्वारा लिखे ‘काव्यालङ्कारसंग्रह’ नामक अलङ्कार-ग्रन्थ में जो उदाहरण हैं, वे उन्होंने स्वरचित ‘कुमारसम्भव’ नामक ग्रंथ से लिए थे।’

कालांतर में सुख्यात अंग्रेज समीक्षक पिटरसन् ने ये चार पद्य उद्भट कवि के ही माने है जिसमें विश्वप्रसिद्ध सूक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भी शामिल है —

(1)
स्विन्नं स्वेन समुद्भटेन सरसं स्वीयं मनो जायते
श्रुत्वाऽन्यस्य समुद्भटं खलु मन: श्रोतुं पुनर्वाञ्छति।
अज्ञान् ज्ञानवतोऽपि येन वशगान् कर्तुं समर्थ: सुधी:
कार्यस्तस्य समुद्भटस्य मनुजैरावश्यकं संग्रह:॥

(2)
अयं बन्धु: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
पुंसामुदारचित्तानां वसुधैव कुटुम्बकम्॥

(3)
किं कौमुदी: शशिकला: सकला विचूर्ण्य
संयोज्य चामृतरसेन पुन: प्रयत्नात्।
कामस्य घोरहरहुङ्कृतिदग्धमूर्ते:
सञ्जीवनौषधिरियं विहिता विधात्रा॥

(4)
किमिह बहुभिरुक्तैर्युक्तिशून्यै: प्रलापै:
द्वयमिह पुरुषाणां सर्वदा सेवनीयम्।
अभिनवमदलेखालालसं सुन्दरीणां
स्तनभरपरिखिन्नं यौवनं वा वनं वा॥

उद्भट कवि कश्मीर के ही नहीं वरन् पूरी पण्डित परम्परा के ऐसे प्रतिनिधि आज भी बने हुए हैं कि जिस विद्वान् की पूरी प्रशंसा करनी हो, उसे लोग आज भी ‘उद्भट’ संज्ञा से विभूषित करते हैं। इतना ही नहीं, संस्कृत में आज भी श्रेष्ठ कविता और सूक्तियों को उद्भट कविता कहा जाता है।

संस्कृत कवि क्षेमेन्द्र

क्षेमेन्द्र कश्मीरी महाकवि थे। वे संस्कृत के विद्वान् तथा अप्रतिम प्रतिभासंपन्न कवि थे। क्षेमेन्द्र ने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इनके पुत्र सोमेन्द्र ने पिता की रचना ‘बोधिसत्त्वावदानकल्पलता’ को एक नया पल्लव जोड़कर पूरा किया था। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहास कथा लेखक सम्भवत: और कोई नहीं है। क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथों के रचना काल का उल्लेख किया है, जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय मिलता है। कश्मीर के नरेश अनंत (1028-1063 ई.) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089 ई.) के राज्य काल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ। क्षेमेन्द्र के ग्रंथ ‘समयमातृका’ का रचना काल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ ‘दशावतारचरित’ का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है।  क्षेमेन्द्र के पूर्वपुरुष राज्य के अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। फलत: इन्होंने अपने देश की राजनीति को बड़े निकट से देखा तथा परखा था। अपने युग के अशांत वातावरण से ये इतने असंतुष्ट और मर्माहत थे कि उसे सुधारने में, उसे पवित्र बनाने में तथा स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना दृढ़ करने में इन्होंने अपना जीवन लगा दिया तथा अपनी द्रुतगामिनी लेखनी को इसकी पूर्ति के निमित्त काव्य के नाना अंगों की रचना में लगाया। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहासकथा—लेखक कोई और नहीं है। उनकी सिद्ध लेखनी पाठकों पर चोट करना जानती थी, परंतु उसकी चोट मीठी होती थी।

‘नर्ममाला’ ‘देशोपदेश’ कृतियों में उस युग का वातावरण अपने पूर्ण वैभव के साथ हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। क्षेमेन्द्र विदग्धी कवि होने के अतिरिक्त जनसाधारण के भी कवि थे, जिनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध मनोरंजन के साथ-साथ जनता का चरित्र निर्माण करना भी था। ‘कलाविलास’, ‘चतुर्वर्गसंग्रह’, ‘चारुचर्या’, ‘समयमातृका’ आदि लघु काव्य इस दिशा में इनके सफल उद्योग के समर्थ प्रमाण हैं।

संस्कृत कवि कुंतक

कुंतक अलंकारशास्त्र के एक मौलिक विचारक विद्वान् थे। यद्यपि इनका काल निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हैं, किंतु विभिन्न अलंकार ग्रंथों के अंत:साक्ष्य के आधार पर ऐसा समझा जाता है कि कुंतक दसवीं शती के आसपास हुए। कुंतक अभिधावादी आचार्य थे, जिनकी दृष्टि में अभिधा शक्ति ही कवि के अभीष्ट अर्थ के द्योतन के लिए सर्वथा समर्थ होती है। परंतु यह अभिधा संकीर्ण आद्या शब्दवृत्ति नहीं है। अभिधा के व्यापक क्षेत्र के भीतर लक्षण और व्यंजना का भी अंतर्भाव पूर्ण रूप से हो जाता है। वाचक शब्द द्योतक तथा व्यंजक उभय प्रकार के शब्दों का उपलक्षण है। दोनों में समान धर्म अर्थ प्रतीतिकारिता है। इसी प्रकार प्रत्येयत्व (ज्ञेयत्व) धर्म के सादृश्य से द्योत्य और व्यंग्य अर्थ भी उपचारदृष्ट्या वाच्य कहे जा सकते हैं। इस प्रकार कुंतक अभिधा की सर्वातिशायिनी सत्ता स्वीकार करने वाले आचार्य थे। कुंतक की एकमात्र रचना ‘वक्रोक्तिजीवित’ है, जो अधूरी ही उपलब्ध हैं। वक्रोक्ति को वे काव्य का जीवित अंश (जीवन, प्राण) मानते थे। पूरे ग्रंथ में वक्रोक्ति के स्वरूप तथा प्रकार का बड़ा ही प्रौढ़ तथा पांडित्यपूर्ण विवेचन है। ‘वक्रोक्ति’ का अर्थ है- ‘वदैग्ध्यभंगीभणिति’ अर्थात ‘सर्वसाधारण द्वारा प्रयुक्त वाक्य से विलक्षण कथनप्रकार’। वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभंगीभणितिरुच्यते। कविकर्म की कुशलता का नाम है- ‘वैदग्ध्य’ या ‘विदग्धता’। भंगी का अर्थ है- ‘चमत्कार’ या ‘चारुता’। ‘भणिति’ से तात्पर्य है- ‘कथन प्रकार’। इस प्रकार वक्रोक्ति का अभिप्राय है- “कविकर्म की कुशलता से उत्पन्न होने वाले चमत्कार के ऊपर आश्रित रहने वाला कथन प्रकार”। कुंतक का सर्वाधिक आग्रह कविकौशल या कविव्यापार पर है अर्थात्‌ इनकी दृष्टि में काव्य कवि के प्रतिभाव्यापार का सद्य:प्रसूत फल है।

परम्परागत रूप से कश्मीर का साहित्य संस्कृत में था। कश्मीर के संस्कृत के प्रमुख साहित्यकारों के नाम हैं –


ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तकाचार्य लगध मुनि | पंचतन्त्र के रचयिता विष्णु शर्मा | बौद्ध दर्शन के विद्वान् नागसेन | आयुर्वेद विद्वान् तिसत |आयुर्वेद के विद्वान् और सुश्रुतसंहिता के टीकाकार जैज्जट | आयुर्विज्ञान मनीषी वाग्भट |अलंकारशास्त्र के विद्वान् भामह |बौद्ध दार्शनिक रविगुप्त | साहित्य शास्त्रज्ञ आनन्दवर्धनाचार्य | वसुगुप्त | सोमानन्द | वटेश्वर | रुद्रट | जयन्त भट्ट | भट्ट नायक | मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि | उत्पलदेव | महामाहेश्वर आचार्य अभिनवगुप्त |रघुवंश के टीकाकार वल्लभदेव | गणितज्ञ उत्पल | क्षेमेन्द्र | क्षेमराज | बिल्हण | कल्हण | सूक्तिमुक्तावलिकार जल्हण | महान् संगीतशास्त्रज्ञ शारंगदेव | वेदान्ती केशव भट्टाचार्य | मम्मट | कैयट | लोल्लट | कैहट | जैहट | रल्हण | शिल्हण | मल्हण | रुय्यक | कुन्तक | रुचक |उद्भट | शंकुक | गुणाढ्य | सोमदेव | पिंगल | जयदत्त | वामन| क्षीरस्वामी | मंख | पुष्पदन्त | जगधर भट्ट | रत्नाकर |माणिक्यचन्द्र

काश्मीरियों की  देन है संस्कृत काव्य शास्त्र 

संस्कृत विद्वान् आचार्य उमेश नेपाल का कहना है, ‘संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक रीति से इतिहास लेखन की परंपरा को चलाने एवं प्रवर्तित करने का काम काश्मीर ने किया। आजतक कल्हण की राजतरंगिणी को इतिहास के विद्वान् जितने सम्मान से देखते हैं, उतने सम्मान से संस्कृत साहित्य के किसी दूसरे ग्रंथ को नहीं देखते। शैवदर्शन की प्रमुख दो धाराएं — प्रत्यभिज्ञा दर्शन एवं सिद्धान्त शैव, भारत को काश्मीर की ही देन है। समूचे दक्षिण भारत में शिव भक्ति का मूलभूत दर्शन सिद्धान्त शैव है। इस प्रकार दार्शनिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में शिवभक्ति के तानाबाने को बुनने का काम काश्मीर ने ही किया है। संस्कृत का काव्य शास्त्र लगभग काश्मीरियों की ही बपौती है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है।’

कश्मीर यूनिवर्सिटी का सूना संस्कृत विभाग

आज का कश्मीर देखकर इसपर यकीन करना मुश्किल है लेकिन इतिहासकार इसकी वजह सभ्यता के विकास में बताते हैं। आर्य सभ्यता के बारे में माना जाता है कि इसका विकास पूर्वी ईरान में हुआ और बाद में इसको मानने वाले लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान होते हुए गंगा के मैदान तक फैल गए। पंजाब से होकर आर्य सभ्यता कश्मीर घाटी में पहुंची। इन लोगों के साथ संस्कृत भाषा भी इस क्षेत्र में आ गई और तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावशाली आर्यों के इन वंशजों ने यहां के समाज में सस्कृत को प्रधान भाषा बना दिया। कश्मीर के 11वीं सदी के एक कवि बिल्हण के शब्दों में, ‘कश्मीर में तो महिलाएं भी धाराप्रवाह संस्कृत और प्राकृत (संस्कृत के बाद की भाषाएं) में बात करती हैं।’

एक रिपोर्ट के अनुसार अब जिस आंगन में संस्कृत पली-बढ़ी, वहां इसका कोई नामलेवा तक नहीं है। कभी संस्कृत अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र रहे कश्मीर में अब कश्मीर यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान का संस्कृत विभाग बिना छात्रों के ही चल रहा है। कभी संस्कृत को जतन से पालने-पोसने वाले कश्मीर में आज इसकी हालत ऐसी है कि कश्मीर यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग में सब कुछ होने के बावजूद बस कमी है तो एक अदद छात्र की। कश्मीर यूनिवर्सिटी का संस्कृत विभाग 1983 में काफी धूमधाम से शुरू हुआ था। 1990 में यहां के हालात बिगड़ने पर इसे बंद करना पड़ा। 2001 में यह फिर शुरू तो हो गया लेकिन तभी से छात्रों की कमी से जूझ रहा है। विभागाध्यक्ष जोहरा अफजल बताती हैं, ‘हम यहां संस्कृत के बारे में जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कुछ खास नहीं हो पा रहा.’ विभाग ने 2007 से 2012 के दरम्यान संस्कृत भाषा पर कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार भी करवाए हैं लेकिन इससे भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

कश्मीर विश्वविद्यालय में छात्रों के नदारद होने का एक तकनीकी पक्ष यह भी है कि राज्य में कोई ऐसा कॉलेज नहीं है जहां स्नातक के स्तर पर संस्कृत पढ़ाई जाती हो। इस समय घाटी में जो हालात हैं उससे देश के दूसरे हिस्सों से लोग अब यहां संस्कृत पढ़ने आएं यह भी मुमकिन नहीं दिखता। यानी संस्कृत के संदर्भ में कहें तो फिलहाल कश्मीर की स्थिति दिया तले अंधेरा वाली है।

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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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