7 अगस्त : विश्वकवि रबिन्द्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि

भारत में बच्चा-बच्चा उन्हें विश्वकवि के नाम से जानता है. देश में शायद ही कोई हो जो हमारे राष्ट्र-गान ‘जन-गण-मन’ के रचयिता एवं गीतांजलि के लेखक रबिन्द्रनाथ ठाकुर को न जानता हो. लोग उन्हें आदरभाव से गुरुदेव भी बुलाते थे. चूँकि अंग्रेज ठाकुर शब्द का उच्चारण ढंग से नही कर पाते थे, अतः वह गुरुदेव धीरे-धीरे अंग्रेजों के लिए ‘ठाकुर’ से ‘टैगोर’ हो गए. वह पहले और अबतक के अकेले भारतीय हैं, जिन्हें साहित्य के नोबल से नवाजा गया है.

टैगोर का लालन-पालन अधिकांशतः उनके परिवार के नौकरों द्वारा किया गया. ऐसा इसलिए क्योंकि रविन्द्रनाथ के माताजी का देहांत, उनके बचपन में ही हो गया था और उनके पिता का ज्यादातर समय यात्राओं में गुजर जाता था.

टैगोर के ह्रदय में बचपन से ही प्रकृति के लिए अटूट प्रेम था. वह अपना जीवन प्रकृति के सानिध्य में बिताना चाहते थे. उनका यह भी मानना था कि विद्यार्थियों के लिए विद्या-अध्ययन का सबसे उत्तम माहौल प्राकृतिक सानिध्य में ही है. अपने इसी प्रकृति-प्रेम के सोंच से प्रेरित होकर 1901 में शान्तिनिकेतन के अपने आश्रम में उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की जिसने 1921 में महाविद्यालय का और 1951 में विश्वविद्यालय का रूप लिया. यही विश्वविद्यालय आज ‘विश्व-भारती यूनिवर्सिटी’ के नाम से जाना जाता है.

कलकत्ता के एक पिराली ब्राह्मण परिवार में 7 मई 1861 को जन्मे रबिन्द्रनाथ टैगोर को बचपन से ही लिखने-पढने में गहरी अभिरुचि थी, विशेषकर कविता के प्रति उनका एक गहरा लगाव था. हालांकि विद्यालयी-शिक्षा से वह महरूम ही रहे. उन्होंने आठ वर्ष की अल्प आयु में ही कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया था. बंगलादेश का राष्ट्रगान ‘अमार शोनार बंगला’ जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘मेरा सोने जैसा बंगाल’ के रचयिता भी गुरुदेव ही हैं. इसे गुरुदेव ने बंग-भंग के समय 1906 में लिखा था, जब अंग्रेजों ने धर्म के आधार पर बंगाल को दो भागों में विभक्त कर दिया था. यहाँ तक, यह भी माना जाता है कि श्रीलंका का राष्ट्रगान भी गुरुदेव की कृतियों से ही प्रेरित है.

परन्तु, सबसे बड़ी विडम्बना की बात यह है कि दो-दो देशों का राष्ट्रगान लिखने वाले गुरुदेव, वास्तव में भारत के लिए ‘विश्वकवि’ हैं या नही इसकी कोई जानकारी, कोई रिकॉर्ड भारत सरकार के पास नही है. जी हाँ, कुछ ऐसा ही जवाब 2013 में, मुझे राष्ट्रीय अभिलेखागार के जन सुचना अधिकारी ने एक आरटीआई के जवाब में उपलब्ध कराया था.

मैंने 2013 में आरटीआई के अंतर्गत जन-सुचना अधिकारी से विश्वकवि रबिन्द्रनाथ ठाकुर के ‘विश्वकवि’ की उपाधि से सम्बंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के लिए आग्रह किया था. इसके जवाब में राष्ट्रीय अभिलेखागार के लोक-सुचना अधिकारी ने 6 अगस्त 2013 को लिखे गए पत्र के द्वारा मुझे यह अवगत कराया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध नही है. उन्होंने पत्र में यह लिखा:

यह पत्र आपके 4 जुलाई 2013 के आवेदनपत्र के सन्दर्भ में है, जो संस्कृति मंत्रालय के माध्यम से 30 जुलाई 2013 o इस विभाग में प्राप्त हुआ है. इस सम्बन्ध में आपको सूचित किया जाता है कि क्रमसंख्या 1-6 के अंतर्गत मांगी गयी सुचना इस विभाग में उपलब्ध नही है. परन्तु, आपको यह भी सूचित किया जाता है कि राष्ट्रीय अभिलेखागार में श्री रबिन्द्रनाथ टैगोर से सम्बंधित अभिलेख उपलब्ध हैं और यह एक गहन शोध का विषय है. अतः आप इस विषय पर शोध के लिए यहाँ किसी भी कार्यदिवस में प्रातः 9:30 से सायं 5:30 तक आ सकते हैं. आपको पब्लिक रिकार्ड्स एक्ट 1993 के अंतर्गत सभी सुविधाएं प्रदान की जायेंगीं.

सिर्फ रबिन्द्रनाथ टैगोर ही नहीं बल्कि मेरे प्रश्न राष्ट्रकवि दिनकर और मैथिलीशरण गुप्त के राष्ट्रवि की उपाधियों के रिकॉर्ड से भी सम्बंधित थे. परन्तु, इसके जवाब में भी राष्ट्रीय अभिलेखागार के जन-सुचना अधिकारी ने कोई सुचना न होने की बात कही.

यदि देश के संस्कृति मंत्रालय के पास ही ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अभिलेख उपलब्ध नही रहेंगे, तो देश में संस्कृति की स्थिति पर तात्कालिक रूप से गंभीर विमर्श की आवश्यकता है. अभिलेख तो दूर की बात, भारत सरकार ने एक तरह से इस सन्दर्भ में कोई भी सुचना होने से ही पूर्णतः इनकार कर दिया. अब यह देश को तय करना है कि फिर ऐसी ‘संस्कृति मंत्रालय’ का क्या औचित्य?

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