मकर संक्रान्ति इकलौता ऐसा पर्व है, जो सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है!

भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियां सामान्यत: चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित हैं, मकर संक्रान्ति इकलौता ऐसा पर्व है, जो सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। मकर संक्रान्ति से सूर्य दक्षिण मार्ग छोड़कर उत्तर मार्ग में प्रवृत्त हो जाते हैं। सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस मकर संक्रान्ति को देवताओं का प्रात:काल माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण देवताओं की रात्रि तथा उत्तरायण देवताओं का दिन है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। सूर्य की स्तुति का खास मंत्र है—

जयति जगत: प्रसूतिर्विश्वात्मा सहजभूषणं नभस:।
द्रुतकनकसदृशदशशतमयूखमालार्चित: सविता।।

मकर संक्रान्ति पर्व का संबंध सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में आने से है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है। मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतना एवं कार्य करने की शक्ति में वृद्धि होती है। इस पौराणिक भावना के आधार से मकर संक्रान्ति पर पूरे भारतवर्ष में विविध रूपों में सूर्य की उपासना, आराधना एवं पूजन कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। ध्यान देने की बात है कि भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियां सामान्यत: चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति इकलौता ऐसा पर्व है, जो सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है।

सूर्य, राशियाँ और संक्रांति का मतलब

समस्त संसार की आत्मा यानी संसार जिससे संचालित है, वे सूर्य हैं। सूर्य ब्रह्मांड का निर्माता, संचालक, व्यवस्थापक, पालक एवं पोषक और आकाश में निरंतर रमण करने वाला है। सारे प्रणियों को कर्म करने की प्रेरणा देता है। संसार की उत्पत्ति का कारण सूर्य है। मनुस्मृति कहती है — आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा:।। यानी सूर्य से वर्षा होती है, उस वर्षा से अन्न एवं अन्न से ही मनुष्य का अस्तित्व बना रहता है।

समस्त संसार की आत्मा यानी संसार जिससे संचालित है, वे सूर्य हैं। सूर्य ब्रह्मांड का निर्माता, संचालक, व्यवस्थापक, पालक एवं पोषक और आकाश में निरंतर रमण करने वाला है। सारे प्रणियों को कर्म करने की प्रेरणा देता है। संसार की उत्पत्ति का कारण सूर्य है। मनुस्मृति कहती है — आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा:।। यानी सूर्य से वर्षा होती है, उस वर्षा से अन्न एवं अन्न से ही मनुष्य का अस्तित्व बना रहता है।

ऋग्वेद में सूर्य को ‘विश्वात्मा’ कहा गया है, ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।’ जगत् में व्याप्त समस्त जड—चेतन वस्तुओं की आत्मा सूर्य है। सूर्य संपूर्ण ब्रह्मांड में समय का निर्धारण करता है। काल की सबसे छोटी इकाई ‘त्रुटि’ से लेकर सबसे बड़ी इकाई ‘प्रलय’ तक की गणना सूर्य की गति से ही संभव है। अत: हर रोज सूर्योदय व सूर्यास्त से किसी न किसी पर्व या घटना का संबंध होता है। उदयास्त सूर्य से एक अहोरात्र, तीस अहोरात्र से एक मास, पंद्रह अहोरात्र से एक पक्ष, सात अहोरात्र से एक सप्ताह, दो पक्षों का एक मास, बारह मासों से एक वर्ष का निर्माण होता है। इन बारह मासों में सूर्य वैदिक ज्योतिष में वर्णित बारह राशियों मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ एवं मीन में विचरण करता रहता है। एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के प्रवेश को ‘संक्रांति’ कहते हैं — रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते।

मकर संक्रांति के अलावा भी कई संक्रांतियां

संक्रान्ति प्राचीन काल में भी उतनी ही मान्य थी जितनी अभी है। प्राचीन समय में अर्थात् कलियुग के आरंभ में संक्रांति प्रत्येक माह में उत्सव के रूप में मनाई जाती थी। धीरे-धीरे वर्ष भर की बारह संक्रांतियां चार श्रेणियों में विभक्त होकर रह गई। इनमें सबसे पहली है, दो अयन संक्रांति अर्थात उत्तरायण मकर संक्रांति तथा दक्षिणायन कर्क संक्रांति। दूसरी है विषुवत् संक्रांति यानी मेष एवं तुला की संक्रांति। इन्हें हम उत्तरी व दक्षिणी गोल के नाम से जानते हैं। तीसरी है षडशीतिमुख, जिसका तात्पर्य है मिथुन, कन्या, धनु व मीन की संक्रांति। चौथी है विष्णुपदी संक्रान्ति, जिसमें वृष, सिंह, वृश्चिक एवं कुंभ की संक्रांति की गणना होती है। लेकिन ये संक्रान्तियां गौण हो चुकी हैं। अब केवल दो संक्रांतियां जानी जाती है। उत्तरायण की मकर संक्रांति तथा दक्षिणायन की कर्क संकान्ति। इनमें भी अब सिर्फ मकर संक्रांति ही उत्सव के रूप में मनाई जाती है। विष्णुपुराण के अनुसार तो चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं संक्रान्तियां पर्व है पर अब मकर संक्रांति जैसी मान्यता किसी दूसरे दिन की नहीं है।

उत्तरायण में ‘अयन’ शब्द मार्ग का वाचक है। उत्तरायण अर्थात् उत्तर के मार्ग पर चलना। दक्षिणायन यानी दक्षिण वाले मार्ग पर चलना। देवताओं के एक अहोरात्र अर्थात् दिन—रात की गणना का कारक भी यह अयन है। मकर संक्रान्ति से सूर्य दक्षिण का मार्ग छोड़कर उत्तर मार्ग में प्रवृत्त हो जाते हैं। सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस मकर संक्रान्ति को देवताओं का प्रात:काल माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण देवताओं की रात्रि तथा उत्तरायण देवताओं का दिन है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी भी धारणा है कि इस दिन दिया गया दान सौ गुना बढ़कर देने वाले को फिर से प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल के दान का खासा महत्त्व है।

बारह मास की बारह संक्रान्तियां अलग—अलग वार पर आने से सात प्रकार की होती है। ये हैं — रविवार को घोरा, सोमवार को ध्वांक्षी, मंगलवार को महोदरी, बुधवार को मंदाकिनी, गुरुवार को मंदा, शुक्रवार को मिश्रिता और शनिवार को राक्षसी। ये संक्रान्तियां नक्षत्रों से संयोग होने पर भी इन्हीं सात नामों से ही जानी जाती है। भिन्न—भिन्न संक्रान्तियां अलग—अलग प्रभाव डालती है। बृहत्संहिता और कृत्यकल्पतरु के अनुसार संक्रान्ति दिन या रात्रि, दोनों में कभी भी हो सकती है। प्राचीन काल में संक्रान्ति नक्षत्र के हिसाब से मानी जाती थी। परंतु आचार्य वराहमिहिर के समय से ही राशिमूलक संक्रान्ति प्रचलित हुई। यही प्रचलन आजतक जारी है। ‘बृहत्संहिता’ में आचार्य वराहमिहिर कहते हैं,आश्लेषार्द्धाद्दक्षिणमुत्तरमयनं  रवेर्धनिष्ठाद्यम्। नूनं कदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु।।साम्प्रतमयनं सवितु: कर्कटकाद्यं मृगादितश्चान्यत्। उक्ताभावो विकृति: प्रत्यक्षपरीक्षणैव्यक्ति:।।

मकर संक्रांति के दिन कैसा हो शेड्यूल ?

संक्रान्ति अगर दिन में हो तो पुण्यकाल दिनभर होता है। रात्रि में संक्रान्ति होने पर सूर्य किरणों से पवित्र होने पर दूसरे दिन में संक्रान्ति स्नान करना चाहिए। पराशर, शातातप, जाबालि, मरीचि इत्यादि ऋषियों ने संक्रान्ति का पुण्यकाल सोलह घटिकाओं का माना है। पूर्ण पुण्यलाभ के लिए स्नान, दान आदि पुण्यकाल में ही करने चाहिए। मकर का सूर्य समस्त संसार को सर्वसुख प्रदान करने वाला होता है। यह केवल मनुष्य या पशुओं ही नहीं अपितु ग्रहों के दोष का भी हरण कर लेता है। मकर राशि में स्थित सूर्य चेष्टा बल, काल बल को प्राप्त कर लेता है। शास्त्रकार उत्तरायण सूर्य के बारे में कहते हैं –

राहुदोषं बुधो हन्यादुभयोस्तु शनैश्चर:। त्रयाणां भूमिजो हन्ति चतुर्णां दानवार्चित:।पंचानां देवमन्त्री च षण्णां दोषं तु चन्द्रमा:। सप्तदोषं रविर्हन्याद्विशेषादुत्तरायणे।।

इस श्लोक का तात्पर्य है कि राहु, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, गुरु, चंद्रमा इन छह ग्रहों के दोषों को उत्तरायण में आया अकेला सूर्य नष्ट कर देता है।

मकर संक्रान्ति पर्व को ‘उत्तरायणी’ पर्व भी कहते हैं। अत: उत्तरायण मकर संक्रान्ति को विशेष अनुष्ठान करने चाहिए। मकर संक्रान्ति पर तीन दिन या एक दिन का उपवास करना चाहिए। जो व्यक्ति तीन दिनों तक उपवास करता है और उसके उपरांत स्नान करके उत्तरायण सूर्य की पूजा करता है, वह वांछित फल प्राप्त करता है। संक्रान्ति पर दान और स्नान प्रमुख है। स्कन्दपुराण में लिखा है,धेनुं तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे। सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम्।।

मकर संक्रांति और आज का सामाजिक परिवेश

भारतरत्न से विभूषित आचार्य पांडुरंग वामन काणे ने ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में लिखा है, ‘आजकल मकर संक्रान्ति धार्मिक कृत्य की अपेक्षा सामाजिक अधिक है। कदाचित् कोई उपवास या श्राद्ध करता हो, किंतु बहुत से लोग समुद्र या प्रयाग जैसे तीर्थों में स्नान करते हैं। तिल का प्रयोग अधिक होता है। तिल की महत्ता यों प्रदर्शित की है — जो व्यक्ति तिल का प्रयोग छह प्रकार से करता है, वह कभी असफल नहीं होता। तिल से नहाना, तिल से उबटन, तिलयुक्त जल से पितरों को जल देना, तिल से हवन करना, तिल खाना और तिल का दान करना।’ शातातप का वचन है —तिलोद्वर्ती  तिलस्नायी शुचिर्नित्यं तिलोदकी। होता दाता च भोक्ता च षट्तिली नावसीदति।।

आजकल मकर संक्रान्ति पर अधिकांश में नारियां ही दान करती हैं। राजस्थान में मकर संक्रान्ति पर महिलाएं अपनी सासु और ननद को ‘वायना’ देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है। दक्षिण में ‘पोंगल’ नामक उत्सव होता है, जो उत्तरी या पश्चिमी भारत में मनाए जाने वाले मकर संक्रान्ति पर्व जैसा ही है। पोंगल तमिल वर्ष का पहला दिन है। तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे ‘संक्रमण’ कहते हैं।
मकर संक्रान्ति पुरातन काल से पुण्य पर्व के रूप में ख्यात है। मान्यता है कि महाभारत में भीष्म पितामह ने स्वर्ग प्राप्ति हेतु उत्तरायण में सूर्य के आने पर मकर संक्रान्ति के दिन ही देहत्याग की थी। छान्दोग्य—उपनिषद के अनुसार उत्तरायण काल में शरीर त्याग करने वाला पुण्यात्मा पुरुष अर्चिरादि मार्ग से मोक्ष को प्राप्त करता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को देवयान एवं पितृयान समझाते हुए कहते हैं —अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना:।।धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।

इन श्लोकों का तात्पर्य है कि उत्तरायण के छह महीनों में मृत्यु को प्राप्त हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन देवताओं द्वारा ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। उत्तरायण सूर्य से भारत में पवित्र नदियों में स्नान प्रारंभ होता है। कुंभ स्नान भी मकर संक्रान्ति से ही प्रारंभ होगा। गोस्वामी श्रीतुलसीदास ‘रामचरितमानस’ में मकर संक्रान्ति को व्याख्यायित करते हुए कहते हैं — माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आई सब कोई।। मकर संक्रान्ति भारतीय परंपरा का ऐसा मिलन पर्व है, जो हरेक अंचल में श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। दान इस पर्व का केंद्रबिंदु है, जो इसे अनूठा सामूहिक पर्व बनाता है।

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