इस शीर्षक पर विचार से पहले आपको एक पूरा घटनाक्रम समझना होगा। यह घटना दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से शुरू होती है। विद्यार्थियों की आपसी मुठभेड़। परीक्षा का पंजीकरण। सर्वर रूम में तार काट डालना। नकाबपोश गुंडागर्दी। होस्टल में तोड़फोड़। फिर पुलिस की एंट्री। कुलपति के खिलाफ धरना प्रदर्शन। फिर विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी के खिलाफ चल रहा कथित विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे नया मोड़ लेने लगता है। प्रियंका गांधी से लेकर वामपंथी पार्टियों के कई लीडरान यहां आना शुरू होते हैं। कन्हैया कुमार अपना गला खरासकर यहां आ पहुंचते हैं। स्वरा भास्कर ट्विट कर आंखों से आंसू निकालने की बुरी तरह कोशिश करते (मगर आंसू आखिर तक नहीं निकल पाए) हुए अपने फोलोअर्स को भड़काती है, पहुंचो…जितनी जल्दी हो जेएनयू पहुंचो…हम लुट गए…टाइप में अपील करती है।

आंदोलन में विद्यार्थियों की भीड़ के आकर्षक नारों में, अपना चेहरा दिखाने के लिए कई फिल्मी सितारे भी कूद पड़ते हैं। ‘बस विरोध करना  है’, की भावना से ओतप्रोत सिने जगत के कई कलाकार , कुछ चर्चा हासिल करने और कुछ अभिव्यक्ति की आजादी को चमकाने के लिए इस भीड़ के लोकप्रिय नारों में मुस्काते नजर आने लगते हैं। और यह कथित आंदोलन एक नई ऊंचाइयां लेने लगता है। इतनी उचाई कि कुछ समाचार चैनल कई तरह के स्टिंग ऑपरेशन कर डालते हैं। कुछ चैनल सारे दिन कन्हैया कुमार से लेकर स्वरा भास्कर की आक्रामक आवाजों से अपनी स्क्रीन को भर्रा देते हैं।  चूंकी जेएनयू नई दिल्ली में मौजूद है, जहां हर नेशनल मीडिया की ओबी वैन आसानी से आ जा सकती है, इसलिए उन्हें उन लोकप्रिय नारों के सामने अपना बूम लगाने में ज्यादा तकलीफ नहीं होती। दुर्भाग्य से इन चैनलों को कोटा में बच्चों की मौत का घटनाक्रम मुद्दा ही नहीं लगता। कई दिनों बाद, जब हर जगह बच्चों की मौत की खबरे छपने लगती है, तो उन्हें भी लगने लगता है कि हां, यह भी राष्ट्रीय मुद्दा हो सकता है।  फिर जेएनयू चलते हैं। एक नेशनल मीडिया का रिपोर्टर जेएनयू के भीतर उस जगह से रिपोर्टिंग करने लगता है, जहां झगड़ा शुरू होता है…गौरतलब यह है कि अभी तक किसी भी खबरनवीस को इस घटना के बारे में कोई खबर नहीं है…। मगर, वह रिपोर्टर उस खबर को जेएनयू के भीतर से ब्रेक करता है। एक प्लांटेड स्क्रिप्ट। एक प्लांटेड आंदोलन। प्लांटेड कवरेज। एक प्लांटेड साजिश। प्लांटेड बयानबाजी। सब कुछ इतने अच्छे से मैनेज किया कि एक अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है। खैर।

अब बात करते हैं दीपिका पादुकोण की। उसकी फिल्म छपाक की। साथ में यह याद रखिएगा कि जेएनयू में जो भी आंदोलन चल रहा है उसमें वाम दलों के छात्र संगठन हैं और उनके सामने मुकाबला करने के लिए है विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी है। कांग्रेस की छात्र ईकाई एनएसयूआई यहां कहीं नहीं है। कांग्रेस के दुर्भाग्य से, इस पूरे आंदोलन में एनएसयूआई के किसी भी कार्यकर्ता का न तो माथा फूटा और बदकिस्मती से न ही उन्होंने किसी का माथा फोड़ा। मगर कथित ‘आवाज दबाने’ के खिलाफ केंद्र सरकार के खिलाफ बोलना तो है ही। अपने कार्यकर्ता न सही, लेफ्ट वालों का तो माथा फूटा है ना। और लेफ्ट और हमारा खून का रिश्ता है। तो बोलना तो बनता है। ये क्या…अब आप बीच में कोटा में सौ से ज्यादा बच्चों की मौत पर कोटा नहीं आने का उलाहना देकर उन्हें भड़काइए मत। यह उनकी मर्जी है, वे कोटा आएं न आए। या जयपुर से जीम जामकर सीधे निकल जाएं। आप कौन होते हैं उन्हें अपने नजदीक के किसी मित्र की शादी में हलवा पूरी जीमने से। इसमें आपको क्या है…। ये भला क्या बात हुई कि बच्चों की मौत पर उनके घर जाना चाहिए। बच्चों की मौत पर भला कोई घर जाता है…यह गलत परंपरा है, ऐसा राजस्थान के संवेदनशील मुख्यमंत्री कहते हैं। उनकी यही बात मानकर वे कोटा नहीं गई। जो नेता वहां गए और अकाल मौत मरने वाले छोटे बच्चों के घरों में जाकर उनके घरवालों को सांत्वना दी…मुख्यमंत्री के हिसाब से यह सब सब बेकार है। वे इसकी कठोर निंदा करते हैं।

फिर से पुराने ट्रेक पर लौटते हैं। अब उसी बात को आगे बढ़ाते हैं। दीपिका, जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष के साथ सहानुभूति दर्शाने या कहें कथित तौर पर महिला सशक्तिकरण का प्रदर्शन करने जेएनयू पहुंच जाती है। लेकिन ट्विटर पर बायकाट छपाक ट्रेंड करने लगता है। ऐसा ट्रेंड करवाने वालों को लगता है कि दीपिका उन लोगों का साथ दे रही हैं, जो टुकड़े टुकड़े गैंग के मेंबर है और भारत के टुकड़े करने का इरादा रखते हैं। वे इन लोगों को लिबरल, लेफ्ट, हिंदु विरोधी और टुकड़े टुकड़े गैंग जैसी कुछ संज्ञाएं देते हैं। यह उनकी भावना है। क्या कहा जा सकता है। खैर, अगर दीपिका को वहां जाने की आजादी है, उनके साथ खड़ा होने की आजादी है तो उनकी फिल्म के खिलाफ बोलने और लिखने वालों को भी तो अभिव्यक्ति की आजादी है। बताइए, इसमें क्या बुरा है। इसमें कोई बुराई नहीं है। वे लोगों को दीपिका की फिल्म को नहीं देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। यह उनका अधिकार है।

आगे बढ़ते हैं। पिछले हफ्ते यानी दस जनवरी को दीपिका की छपाक और अजय देवगन की तानाजीः द अनसंग वारियर रिलीज हुई। दोनों फिल्मों के कारोबार को देखें तो छपाक को वह दर्शक नहीं मिला जो, अजय देवगन की तान्हाजी को मिला। फिल्म की समीक्षा में नहीं जाते हुए सीधे बात करते हैं कांग्रेस के भीतर आए वैचारिक खोखलेपन पर। पार्टी के गिरते वैचारिक स्तर को मजबूत करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने कांग्रेस शासित सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया कि दीपिका पादुकोण की छपाक को तत्काल टैक्स फ्री कर दिया जाए। ऐसा ही हुआ। यह फिल्म टैक्स फ्री हो गई। अब इसका राजनैतिक विश्लेषण कीजिए। आपको हर उस चीज का समर्थन करना है, जो केंद्र विरोधी हो। उसके लिए भले ही आपके आर्थिक हालात मंजूरी न दे। आपको हर उस नियम, कानून का विरोध करना है, जो केंद्र ने लागू किया हो, भले ही आपकी पुरानी सरकारों ने ही उन्हें अमलीजामा पहनाचा हो। भले ही आपके मेनिफेस्टो में वह बातें हो। हो, तो हो, उससे क्या!कांग्रेस के विरोध करने के तरीकों से महसूस किया जा सकता है कि इनकी विचारशक्ति कितनी कमजोर हो गई है।

थोड़ी चर्चा विरोध करने की मानसिकता पर। इनके विरोध करने के तरीके देखने हैं तो आपको इनके विद्वान नेता शशि थरूर के ट्विट्स को देखना होगा। खासकर सीएए और एनआरसी पर वे जिस तरह दूसरे बेतुके ट्विट्स को रीट्विट करते हैं, उससे उनकी बौद्धिक क्षमताओं पर शक होने लगता है। तरस भी आएगा और हंसी भी। आपके चिर युवा नेता का आक्रामक चेहरा अच्छा लगता है, एक पुरानी पार्टी होने के नाते आपको सरकार की नीतियों के खिलाफ आक्रामक होना भी चाहिए। आक्रामकता में इतना नीचे नहीं गिरिये कि आप सावरकर पर भद्दी बातें करना शुरू कर दें। फ्री कश्मीर के बैनरों का समर्थन करना शुरू कर दें। दिल्ली के शाहिन बाग में जिन्ना वाली आजादी का समर्थन शुरू कर दें। देश की इस पुरानी पार्टी को फिर से यह बात याद करने की जरूरत है कि देश की आप पर भी उतनी ही जिम्मेदारी है, जितन सरकार की। इसलिए अपने वैचारिक तंत्र को मजबूत कीजिए। उन्हें छोटी-मोटी आक्रामकता के चक्कर में गड्ढों में न गिराइए।

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि 'दआर्टिकल' उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए आप हमें लिख सकते हैं या लेखक से जुड़ सकते हैं.

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