जो कुंभ में जाते हैं, वे अपने साथ आखिर क्या लेकर लौटते हैं? अपने पापों को तज और गंगा जल को अंजलि में भर सूरज की तरफ मुंह करके उड़ेलते जरूर हैं, पर इसके बाद उस ‘सामूहिकता’ का क्या करते हैं जिसके लिए कुंभ में जाना अनिवार्य था. वैचारिक मंथन और मनन की प्रक्रिया के बिना कुंभ का क्या कोई मतलब रह गया है? अपनी तमाम सीमाओं को छोड़ समूह में घुल मिल जाने के लिए कुंभ शुरू हुआ था, जिससे विचार और संस्कृति का आदान—प्रदान हो सके, लेकिन अब समूह में जाकर भी अपनी सीमा रेखा को और अधिक गहरा करने के लिए कुंभ का इस्तेमाल क्यों हो रहा है? क्यों कुंभ में भी व्यक्ति सत्ता को नजरअंदाज कर उन्हें राजनीतिक लाभ में तब्दील किया जा रहा है?

धर्म और परंपरा की नगरी प्रयाग में लोक आस्था का सबसे बड़ा मेला कुंभ चल रहा है. चमत्कार है कि करोड़ों श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में बहती धारा के एक कण के आचमन के लिए कोसों दूरी तय कर धर्म के सर्वाधिक माहात्म्य वाले मेले में पहुंच जाते हैं. एक ओर कुंभ जारी है, जो दुनिया भर के लोगों में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. दूसरी ओर कुंभ के मौजूदा स्वरूप पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जो कुंभ के धार्मिक बदलाव को लेकर उठे हैं.

सालों पहले सीमित संसाधनों के बावजूद कुंभ से दी जा रही आध्यात्मिक प्रेरणा लोककल्याण के लिए वरदान थी. अब जब कुंभ में चमचमाती सडक़ें, रोशनी फैलाते बिजली के खंभे और टैंटों में पांचसितारा सुविधाएं हैं तो यह पर्व अपने मूल आध्यात्मिक पक्ष के दूर होकर भौतिक वातावरण का सर्जक होता जा रहा है. अध्यात्म विद्या, दार्शनिक धाराओं के विभिन्न संप्रदाय और वैदिक सनातन तत्त्व की चर्चा की जगह किंनर अखाड़े, नेत्र कुंभ, स्वच्छता कुंभ और परिवार नियोजन के कैंप ने ले ली है. असम में बढ़ते बांग्लादेशियों से होने वाली असुरक्षा और हिंदुओं के दो बच्चों तक सीमित हो जाने की चिंता ने कुंभ के पुरातन स्वरूप को मूल धारा से भटकाकर आधुनिक मुद्दों पर ला खड़ा किया है, जिसे कुंभ की मूल प्रकृति में विकृति ही कहा जा सकता है. वहीं, हिंदू धर्म की तरफदारी करने वाले राजनैतिक संगठन पुरातन धार्मिक संप्रदायों और उनके वास्तविक मुखियाओं को किनारे कर खुद दुकानदार बन बैठे हैं. ये सिर्फ अपने राजनीतिक लाभ के लिए संतों और धर्माचार्यों का उपयोग कर रहे हैं, जो धर्म के साथ छलावा है.

जो कुंभ में जाते हैं, वे अपने साथ आखिर क्या लेकर लौटते हैं? अपने पापों को तज और गंगा जल को अंजलि में भर कर सूरज की तरफ मुंह करके उड़ेलते जरूर हैं, पर इसके बाद उस ‘सामूहिकता’ का क्या करते हैं जिसके लिए कुंभ में जाना अनिवार्य था. वैचारिक मंथन और मनन की प्रक्रिया के बिना कुंभ का क्या कोई मतलब रह गया है? देश भर के गांवों और शहरों से लोग प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर इसलिए जमा हो जाते हैं कि उन्हें ‘तीरथ’ में डुबकी लगा ‘पुण्य’ कमाकर लौटना है. अपनी तमाम सीमाओं को छोड़ समूह में घुल मिल जाने के लिए कुंभ शुरू हुआ था, जिससे विचार और संस्कृति का आदान—प्रदान हो सके. लेकिन अब समूह में जाकर भी अपनी सीमा रेखा को और अधिक गहरा करने के लिए कुंभ का इस्तेमाल क्यों हो रहा है? क्यों कुंभ में भी व्यक्ति सत्ता को नजरअंदाज कर उन्हें राजनीतिक लाभ में तब्दील किया जा रहा है?

मौजूदा दौर में कुंभ में जाकर यह तय करना मुश्किल है कि ये बाबा भले हैं और ये बाबा कारोबारी. नकली—नकलचियों के पोस्टर कुंभ में ‘मोक्ष’ का विज्ञापन कर रहे हैं. संसार के कल्याण का दावा करने वाले संतों में समन्वय की जगह प्रतिस्पर्धा है. प्रयाग में प्रवेश करते ही बाबाओं के होर्डिंग लगे दिखते हैं. साबुन-तेल के विज्ञापनों की मानिंद बाबा भी मॉडलिंग के अंदाज में फोटो लगा रहे हैं. आखिर आत्म—कल्याण के लिए संसार को त्याग चुके बाबा अपना प्रचार क्यों कर रहे हैं या करवा रहे हैं? क्या हर बाबा अपने—आप में खुद एक ब्रांड बन चुके हैं? अगर कल्याण का रास्ता एक ही है तो सामूहिक प्रयास क्यों नहीं हो पा रहे हैं? एक ही संप्रदाय के कई जगद्गुरु कैसे हो सकते हैं? शंकराचार्य की चार पीठों पर सैंकड़ों शंकराचार्य कैसे घूम रहे हैं? रामानंद संप्रदाय का मुख्यालय काशी का ‘श्रीमठ’ है तो फिर एक दहाई रामानंदाचार्य कैसे हुए? ऐसे ही बेतहाशा बढ़ते मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर भ्रम पैदा करते हैं कि उनमें कौन असली है और कौन नकली? जब तक ये मकडज़ाल नहीं टूटेंगे, तब तक कुंभ सच्चाई की बजाय भ्रम फैलाने वाला मेला बनकर रह गया है. कुंभ में न कोई धार्मिक अनुभव शेष है और न ही विखंडित हिंदू समाज के उत्थान की कोई कारगर योजना बन रही है.

आश्चर्य की बात है कि कुंभ में चहूं ओर बाबाओं के छोटे—बड़े होर्डिंग लगे हैं लेकिन गंगा लगातार प्रदूषित हो रही है. जिन धार्मिक मंचों से गंगा के लिए आवाज उठती है वो इतने राजनीतिक हो गए हैं कि सबकी माता होने के बाद भी गंगा को लेकर कोई सामूहिकता नहीं बन पा रही है. गंगोत्री से गंगासागर की तरफ जाने वाले मार्ग में गंगा की हालत देखी नहीं जाती. हरिद्वार के पहाड़ों के हालात बदतर होते जा रहे हैं. वृक्ष कट गए हैं. वृक्षों की जगह ‘पेड़ बचाओ’ के होर्डिंग उग आए हैं. कुंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर बाबाओं के बोर्ड दूर से दिख जाएंगे पर गंगा निरंतर सूखती जा रही है. कहीं से नहीं लगता है कि प्रयाग में लग रहा कुंभ मेला कोई आध्यात्मिक जगह है बल्कि यह मात्र ‘इवेंट’ होकर रह गया है, जिसमें करोड़ों रुपए फूंके जा चुके हैं.

तीर्थों की सात्विकता को बचाने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं. कुंभ के लिए प्रयाग पहले से ज्यादा कंक्रीट में बदल चुका है. मल्टी लेवल पार्किंग, तरह-तरह के होटल और रंग—बिरंगे आश्रम पहले से ज्यादा बन चुके हैं. इसकी चिंता किसी को नहीं है, न सरकार को और न ही बाबाओं को. तीर्थों को मूल स्वरूप में लौटाने के नारे जरूर लगाये जा रहे हैं लेकिन उन्हें होटल में बदलने को लेकर कोई चिंतित नहीं है. अब तीर्थ जाना वीकेंड मनाने जैसा है. चिंतन और मनन की प्रक्रिया लगभग खत्म हो चुकी है. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कुंभ में आने वाले लोगों की श्रद्धा कम हो गई है. लोग आज भी उतनी ही श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, अपने पुरखों के लिए श्रद्धा—भक्ति से तर्पण—श्राद्ध करते हैं, पूजा करते हैं. पर शास्त्रीय चिंतन और दार्शनिक मनन लगभग बंद है. जबकि वेदों में स्वाध्याय और प्रवचन धर्म के अपरिहार्य हिस्से बताए गए हैं. कुंभ का असली मतलब यही है कि समाज को बेहतर बनाने के लिए लोग चिंतन करें, जिम्मेदारी तय करें। लोगों को बराबरी पर लाने के लिए संघर्ष करें. धार्मिक धरातल पर छोटे—बड़े की खाई को पाटने का प्रयास करें. इसी से तीर्थों के लिए उत्साह दुगना होगा और लोग आपस में प्रेम करने लगेंगे.

प्रयाग के घाटों की सुंदरता यकायक बदसूरत हो रही है. हैरानी है कि धन का प्रभाव, अपराध और धार्मिक आडंबर के बीच भी लोगों का विश्वास कैसे बचा हुआ है? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग धर्म से डरते हैं, ऐसा सोचकर बाबाओं ने आय के स्रोत के लिए मठ, मंदिर और झंडों को व्यापार बना लिया है. कोई धर्म सनातन कैसे बनता है? क्या सिर्फ हजारों सालों से चले आने से या चलते रहने की इस अनंत यात्रा में अपने गुण-दोषों के परिष्कार करने से? कुंभ में जाने वाले सभी लोग क्या गंगा की अविरलता, गाय की दुर्दशा, संस्कृत भाषा के लगातार कम होते जाने और धर्म के नाम पर फैल रहे पाखंड से जरा भी चिंतित हैं? संसाधनहीन हिंदू गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए क्या धन की व्यवस्था को लेकर कोई योजना बन रही है? इन सवालों के उत्तर ‘हां’ या ‘ना’ में नहीं हो सकते हैं. यह एक समस्या है, जिससे कुंभ ने मुंह मोड़ लिया है. वहां आश्रमों और धर्मशालाओं के साथ बाबाओं के अपने-अपने घाट हैं. वीवीआईपी के लिए अलग घाट हैं. आश्रमों के भीतर सनातन सामूहिकता दरक रही है. सांसारिक मोहमाया का भ्रम तोडऩे का जबरदस्त संदेश देने वाले बाबाओं की अपनी भंगिमाएं निराली हैं, जो अध्यात्म की बजाय भौतिकता का सृजन कर रही है. आश्रमों की सज्जा ऐसी है, जैसे वे शहरी मॉल हों. क्या कुंभ की जरूरत इतनी ही रह गई है?

कुंभ मानवता के लिए तभी वरदान होगा, जब वह आध्यात्मिक लोकतंत्र के श्रेष्ठ वातावरण का निर्माता बन सकेगा. जात—पांत और छुआछूत से मुक्त समाज का संदेश दे सकेगा. वैदिक और पौराणिक ज्ञान—विज्ञान के प्रसार का केंद्र बन सकेगा. इसलिए जरूरी है कि भौतिकता के उद्दाम वातावरण को तोडक़र कुंभ शाश्वत ज्ञान के प्रसार में हिस्सेदारी निभाए. खंड-खंड और धाराओं—उपधाराओं में बंटी सनातन परंपरा को फिर से एक ‘अमृत कलश’ चाहिए, जिसे पीने से बराबरी का सनातन संदेश दिया जा सके. किसी धन्वंतरि देवता का फिर से अवतरण चाहिए, जो शोषित और पीडि़त लोगों को ‘अमृत कुंभ’ उपलब्ध करवा पाए.


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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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