सारे दार्शनिकों की ‘अपनी’ है ‘भगवद् गीता’!


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गीता पर लिखे अधिकतर भाष्य या तो दार्शनिक सम्प्रदायों पर केन्द्रित है या वैष्णव ग्रन्थों पर आधारित है, जो ईश्वर के स्वरूप तथा जीव के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में मतभेद रखते हैं।

जिस पुरातन विरासत से भारत का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है, गीता उनमें एक है। गीता महाभारत का हिस्सा है, जिसका इतिहास पांच हजार साल से भी अधिक पुराना है। जो दो ग्रंथ प्राचीन भारत के इतिहास कहे जाते हैं, उनमें रामायण और महाभारत के नाम हैं। रामायण और महाभारत सिर्फ ऐतिहासिक दस्तावेज ही नहीं हैं, बल्कि धर्मग्रंथ भी हैं। ये दोनों ग्रंथ केवल इतिहास ही नहीं बताते बल्कि ये हमारी आत्मा का भी ज्ञान भी कराते हैं। त्रेता और द्वापर में क्या हुआ, ये सिर्फ यह ही नहीं बताते बल्कि प्रत्येक मनुष्य की देह के भीतर क्या चल रहा है, इसकी भी एक तस्वीर खींचते हैं। इन दोनों में देव भाव के प्रतिनिधि श्रीराम और असुर भाव के नायक रावण के बीच हर रोज चलने वाली लड़ाई का लेखा—जोखा है। इसी धारा में कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ संवाद गीता भी है। गीता की शुरूआत पुत्रमोह में पड़े हस्तिापुर के राजा सर्वात्मना अंध धृतराष्ट्र ने की है, जिसमें वे संजय से युद्ध के हालात पूछते हैं। इसमें सारे उपनिषदों का समावेश है। गीता शब्द का मतलब है, प्रेमपूर्वक बोला गया। इस प्रकार गीता का सीधा अर्थ है — श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को प्रेमपूर्वक दिया गया आत्म बोध।

श्रीमद्भगवद्गीता एक पवित्रतम धार्मिक ग्रंथ है, जिस पर विभिन्न विचारों के अनुगामियों द्वारा भाष्य लिखे गए हैं। हरेक ने अपने दार्शनिक सिद्धांत के अनुसार गीता की व्याख्या की है। जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा नौवीं सदी की शुरूआत में लिखा भाष्य गीता पर प्राचीनतम व्याख्यान माना जाता है। शांकर भाष्य में प्राप्त प्रसंगों एवं विवेचनों के आधार पर स्पष्ट है कि शंकराचार्य से पहले भी गीता पर अनेक भाष्य थे, जिनका खंडन आचार्य शंकर ने करना चाहा। शंकर युग के पश्चात् कुछ समय तक गीता पर कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं हुआ। विख्यात वैष्णवाचार्य जगद्गुरु रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन की दृष्टि से गीता पर एक अनुपम भाष्य लिखा। वेदान्ताचार्य वेंकटनाथ ने रामानुज गीता भाष्य पर ‘तात्पर्य-चन्द्रिका’ नामक उप—भाष्य लिखा। रामानुजाचार्य ने अपने परमगुरु श्रीयामुनमुनि द्वारा लिखित संक्षिप्त ‘गीतार्थ-संग्रह’ का अनुसरण किया।

तेरहवीं शताब्दी के पहले तक मध्वाचार्य आनन्दतीर्थ ने गीता भाष्य लिखा, जिस पर जयतीर्थ ने ‘प्रमेय-दीपिका’ टीका लिखी। आचार्य जयतीर्थ ने ‘भगवद्गीता—तात्पर्यनिर्णय’ लिखा, जो गीता के मुख्य अर्थ को बताता है। चौदहवीं शताब्दी के शुरू में मध्वाचार्य के शिष्य कृष्णभट्ट विद्याधिराज ने ‘गीता—टीका’ नामक ग्रन्थ लिखा। सत्रहवीं शताब्दी के सुधीन्द्र यति के शिष्य राघवेन्द्र स्वामी ने ‘गीता—विवृति, गीतार्थसंग्रह और गीतार्थविवरण’ नामक तीन ग्रन्थ लिखे हैं। वल्लभाचार्य, विज्ञानभिक्षु तथा निम्बार्काचार्य मत के केशवभट्ट ने ‘गीता—तत्व—प्रकाशिका’ जैसे ग्रन्थ लिखे। आंजनेय ने हनुमद्भाष्य, कल्याणभट्ट ने रसिकमंजरी, जगद्धर ने भगवद्गीता-प्रदीप, जयराम ने गीतासारार्थ-संग्रह, बलदेव विद्याभूषण ने गीताभूषण—भाष्य, मधुसूदन सरस्वती ने गूढार्थदीपिका, ब्रह्मानन्दगिरि, मथुरानाथ ने भगवद्गीता-प्रकाश, दत्तात्रेय ने प्रबोधचन्द्रिका, रामकृष्ण, मुकुन्ददास, रामनारायण, विश्वेश्वर, शंकरानन्द, शिवदयालु श्रीधर स्वामी ने सुबोधिनी, सदानन्द व्यास ने भावप्रकाश, सूर्य पंडित ने परमार्थप्रपा, नीलकण्ठ ने भाव—दीपिका और शैव दर्शन के दृष्टिकोण से राजानक एवं रामकण्ठ ने सर्वतोभद्र नामक ग्रन्थ लिखे। गीता के सामान्य तात्पर्य पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए। आचार्य अभिनव गुप्त और नृसिंह ठक्कुर द्वारा भगवद्गीतार्थ—संग्रह, गोकुलचन्द्र का भगवद्गीतार्थ—सार, वादिराज का भगवद्गीता-लक्षाभरण, कैवल्यानन्द सरस्वती का भगवद्गीता—सार—संग्रह, नरहरि द्वारा भगवद्गीता—सार—संग्रह, विठ्ठल दीक्षित का भगवद्गीता—हेतु—निर्णय। आधुनिक काल में मिथिला के प्रख्यात विद्वान् पंडित धर्मदत्त झा ने ‘गूढार्थ-दीपिका’ नामक व्याख्या लिखी। इन भाष्यों में अधिकतर भाष्य या तो दार्शनिक सम्प्रदायों पर केन्द्रित है या वैष्णव ग्रन्थों पर आधारित है, जो ईश्वर के स्वरूप तथा जीव के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में मतभेद रखते हैं।

पिछली डेढ़ सहस्राब्दी में भारतीय दर्शन परम्परा के आस्तिक सम्प्रदायों में निर्विवाद रूप से वेदान्त दर्शन का बोलबाला रहा है। आचार्य शंकर से लेकर आचार्य बलदेव उपाध्याय तक ‘प्रस्थानत्रयी’ पर स्वमतानुसार भाष्य लिखकर अपने सम्प्रदाय को मजबूत शास्त्रीय आधार देने की प्रथा रही है। उपनिषदों के साथ महर्षि बादरायण द्वारा रचित ‘ब्रह्मसूत्र’ पर स्वसिद्धान्तपरक भाष्य लिखने के साथ ही यह जरूरी हो गया कि भाष्यकार आचार्य गीता का विवेचन अपनी दार्शनिक विचारधारा में करें। यही दार्शनिक धारा विभिन्न सम्प्रदायों की आधारशिला है, जिस पर उनका वैचारिक प्रासाद टिका है।

गीता के प्रतिपाद्य ज्ञान, कर्म और भक्तियोग हैं। दार्शनिक जगत् में यह धारणा है कि 18 अध्यायों में गुंथी गीता 6—6 अध्यायों में तीन योगों का विवेचन करती है। शंकराचार्य के अनुसार गीता का मुख्य सिद्धान्त है ब्रह्मात्मैक्यवाद। शंकराचार्य का कहना है, मोक्ष यथार्थ ज्ञान से ही संभव है। ज्ञान तथा नित्य—नैमित्तिक कर्मों का एक साथ होना संभव नहीं है। अद्वैतमतानुसार अज्ञानावस्था में ही कर्म करना आवश्यक है, ज्ञानावस्था में नहीं। जिस समय ब्रह्म—तादात्म्य का यथार्थज्ञान उदित होता है तथा अज्ञान का नाश हो जाता है, उस स्थिति में द्वैतभाव नष्ट हो जाते हैं।

विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के महान् आचार्य श्रीयामुन मुनि ने गीता के एक—एक अध्याय का वर्णन किया है, जो उनके ‘गीतार्थ-संग्रह’ ग्रंथ में है। उनका मत है, ‘गीता का उद्देश्य इस बात की पुष्टि करना है कि श्रीमन्नारायण ब्रह्म हैं, वे वैराग्य, यथार्थज्ञान एवं स्वधर्मरूपी साधन सहित भक्ति द्वारा प्राप्य हैं। वे लिखते हैं – स्वधर्मज्ञानवैराग्यसाध्यभक्त्येकगोचर:। नारायण: परं ब्रह्म गीताशास्त्रे समीरित:।। इसका तात्पर्य है कि वर्णाश्रमोचित स्वधर्मपालनरूप कर्मयोग, ज्ञानयोग और वैराग्य से साध्य भक्ति द्वारा प्राप्य परब्रह्म श्रीमन्नारायण ही गीताशास्त्र में सम्यक् प्रकार से प्रतिपादित किए गए हैं। यामुनाचार्य के अनुसार गीता के प्रथम 6 अध्यायों में आत्मज्ञान की प्राप्ति का विवरण है। सातवें से बारह अध्याय तक ज्ञान एवं कर्म द्वारा भक्ति योग की प्राप्ति का वर्णन है। तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक भक्ति, ज्ञान एवं कर्म सहित पुरुषोत्तम, पुरुष एवं प्रकृति के स्वरूप का अन्तर एवं विवरण है।

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जगद्गुरु रामानुजाचार्य ने कर्म योग को ज्ञान योग से बढक़र बताया है। गीताभाष्य में वे लिखते हैं — अनभिसंहितफलेन केवलपरमपुरुषाराधनरूपेण अनुष्ठितेन कर्मणा विध्वस्तमनोमलोऽव्याकुलेन्द्रियो ज्ञाननिष्ठायाम् अधिकरोति। कर्मयोग में आत्मज्ञान होता है। अत: आत्म—ज्ञान भी इसी क्षेत्र के अंतर्गत आता है। केवल ज्ञानयोग हमें कहीं भी ले जाने में समर्थ नहीं है क्योंकि कर्म के बिना शरीर भी जीवित नहीं रह सकता। ज्ञान—योगी के लिए भी नित्य-नैमित्तिक कर्म करना आवश्यक है और इसी कर्म मार्ग के विकास द्वारा आत्म—ज्ञान संभव है। आत्मावलोकन के समय तक कर्ममार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिसके द्वारा मोक्ष प्राप्ति होती है। परंतु मनुष्य का प्रधान कर्तव्य परमभक्ति के साथ ईश्वर में आसक्त रहना ही है।

गीता में दर्शन के अनेक पहलुओं पर सर्वांगीण विचार हैं। सामाजिक दर्शन, जीवन दर्शन, आध्यात्मिक दर्शन, शासकीय दर्शन जैसे समग्र दर्शनों के क्षेत्र पर गीता महत्त्वपूर्ण जानकारी देती है। गीता का कर्म दर्शन आज के दौर में अधिक प्रासंगिक है। जिसे गीता में कर्मयोग नाम से परिभाषित किया गया है, उस कर्म का स्वरूप इतना ही नहीं है कि जितने क्षण तक कर्म अनुष्ठित होता है या जिसके अनुष्ठान से हमें नियत फल प्राप्त होते हैं। वह कर्म तो ऐसा है, जो स्वयं एक संसिद्धि को प्रदान करने वाला उपाय और संसिद्धि को पा लेने के बाद स्वयं सिद्धिरूप हो जाता है — कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:। कोई भी इस संसार में बिना कर्म के रह ही नहीं सकता — न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। परंतु जीवों की यह कर्म परतंत्रता अज्ञानवश ही है। स्थितप्रज्ञ होने पर कर्म का उपयोग नहीं रह जाता। श्रीकृष्ण कहते हैं – यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।। कर्मों के विवेचन से प्रारब्ध गीता अंतिम अष्टादश अध्याय में भी कर्मों के ही स्वरूप को प्रतिपादित करती है। आसक्ति छोडक़र कर्तव्य के रूप में किए गए कर्म संन्यास को सिद्ध कर देते हैं — काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदु:। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा:।।

भगवत्प्राप्ति के साधन बताने के लिए ही सारे वेद एवं शास्त्र ऋषियों द्वारा प्रवर्तित हैं। सनातन परंपरा में अकेली गीता ऐसी है, जिसे स्वयं श्रीभगवान् ने कहा है। इसीलिए योगशास्त्र में पठित धारणा, ध्यान, समाधि हो या मीमांसकों के जटिलता से युक्त यज्ञादि कठोर कृत्य, इन सारे नियमों का सीधा निषेध करते हुए केवल भगवत्—शरणागति को ही भगवत्प्राप्ति में परमोपाय बताया गया है। सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।

जयपुर के सुख्यात वेदविज्ञानवादी पंडित मधुसूदन ओझा ने ज्ञान, कर्म और भक्ति से दूर ‘बुद्धियोग’ को गीता का प्रतिपाद्य विषय माना। ‘गीता-विज्ञानभाष्य’ में लिखते हैं कि कृष्ण स्वयं ही ‘मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय’ कहकर बुद्धियोग स्थापित करते हैं। इसी नाते ‘ददामि बुद्धियोगं ते’ जैसे भगवद्वाक्य गीता शास्त्र में उपलब्ध होते हैं।

गीता की अपनी विशेषताएं हैं, जिनमें युक्ताहार, पान, निद्रा और शरीर की सामान्य गतियों के एक स्वर्णिम मध्यम मार्ग से जुड़ी हुई हैं। गीता एकसाथ सारे शास्त्रों का समावेश है। योग, सांख्य, मीमांसा और वेदान्त के साथ ही प्राणायाम और श्वासोच्छवास के प्रक्रिया भी गीता में है। शरीर, मन और बुद्धि तीनों की कसरत करवाते हुए गीता मोक्षशास्त्र है।

गीता वेदान्त के प्रभाव में आकर लिखी गई या नहीं, इस प्रश्र का उत्तर उस समय तक नहीं दिया जा सकता जब तक वेदान्तिक प्रभाव का ठीक-ठीक अर्थ नहीं समझा जाए। यदि वेदान्तिक प्रभाव का अर्थ उपनिषदों से लिया जाए तो यह सार्वभौम सत्य है कि गीता ने उपनिषदों से स्वतंत्रतापूर्वक सामग्री ली है। पर यदि वेदान्तिक प्रभाव का तात्पर्य आचार्य शंकर और रामानुज द्वारा उपदिष्ट वेदान्त दर्शन से है तो यह निश्चित है कि गीता में प्रतिपादित दर्शन उनसे अत्यधिक भिन्न होते हुए प्राचीनतम है। गीता में ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग महर्षि जैमिनि द्वारा प्रयुक्त ‘धर्म’ शब्द से भिन्न है या नहीं, यह भी एक सवाल है। गीता में ‘यज्ञ’ शब्द का बहुधा प्रयोग है। गीता के अनुसार धर्म शब्द परंपरागत कर्म के प्रति प्रेरित करने के लिए है, जिससे कर्म निरंतर गतिशील बना रह सके। ब्राह्मणों के लिए ज्ञान-विज्ञान, क्षत्रियों के लिए रक्षा तथा वैश्यों के लिए कृषि, गोरक्षा एवं व्यापार आवश्यक है। इसके साथ ही गीता आसक्ति, वासना या किसी प्रकार के स्वार्थ से युक्त कर्म की निंदा करती है। मनुष्य को अपने परंपरागत प्रचलित कर्तव्यों को धर्म मानकर बिना किसी आसक्ति के पालन करना चाहिए। मनुष्य जब फलाशा-रहित होकर अपना कर्तव्य करता है तब वह कर्म उसे बंधन में नहीं बांधता। इस प्रकार गीता कर्तव्य पथ से च्युत हर मानव के भीतर विद्यमान अर्जुन को धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ उसकी दैहिक यात्रा को गतिशील एवं आध्यात्मिक यात्रा को प्रगतिशील बनाती है।

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शास्त्री कोसलेन्द्रदास
लेखक संस्कृत-विज्ञ एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.
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